Table 1
रचयिता
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ग्रंथ
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पात्र
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प्रकाशक
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टीकाकार
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भाषा
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शैली
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काण्ड
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| गोस्वामी तुलसीदास जी |
श्रीरामचरितमानस |
श्रीराम लक्ष्मण सीता हनुमान, रावण इत्यादि |
गीता प्रेस गोरखपुर |
श्री हनुमानप्रसाद पोद्दार |
संस्कृत, अवधी |
सोरठा, चोपाई, दोहा और छंद |
बालकाण्ड |
Ramayan Ki Chaupai Hindi Me | रामायण की चौपाई हिंदी में | Ramayan Chaupai Hindi Mein | Ramayan Chaupai Hindi Me
Ram Charit Manas Chaupai In Hindi
श्रीरामचरितमानस है क्या? इसके अन्दर कौन-कौन से आदर्श पात्र हैं? कौन-कौन से आदर्श सिद्धांत है, जिन सिद्धान्तों के कारण ये ग्रंथ इतना महान बन गया, की आज संसार के भक्ति ग्रंथों में सबसे ऊंचा इससे श्रेष्ठ ग्रंथ भक्ति मार्ग में कहीं भी नहीं।
भारत में बड़े ग्रंथ लिखे गए लेकिन तुलसीदास जी के श्रीरामचरितमानस जैसा भक्ति मार्गी ग्रंथ कोई नहीं लिखा गया।
बड़े-बड़े भक्त पैदा हुए इस भारतवर्ष की पावन धरा पर लेकिन गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज जैसा भक्त कोई नहीं हुआ।
श्रीरामचरितमानस जी में सबसे पहली चीज की गोस्वामी जी ने आदिकवि वाल्मीकि जी की तरह अपने ग्रंथ का नाम रामायण नहीं रखा, तुलसीदास जी ने अपने ग्रंथ का नाम रखा श्रीरामचरितमानस।
रामचरितमानस एहि नामा। सुनत श्रवन पाइअ बिश्रामा॥
गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते है रामचरितमानस एहि नामा
इस ग्रंथ का नाम श्रीरामचरितमानस है, सुनत श्रवन पाइअ बिश्रामा जिसको सुनकर कानों को बड़ी शांति मिलती है।
रामचरित अर्थात श्रीरामजी का चरित्र, और मानस मतलब हृदय, रचि महेस निज मानस राखा, अर्थात शिवजी के हृदय से, मन से उत्पन्न हुआ।
श्रीरामगुण और श्रीरामचरित की महिमा
भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ । नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ ॥
सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा । करउँ नाइ रघुनाथहि माथा ॥
अर्थात
अच्छे भाव (प्रेम) से, बुरे भाव (वैर) से, क्रोध से या आलस्य से, किसी तरह से भी नाम जपने से दसों दिशाओं में कल्याण होता है।
उसी (परम कल्याणकारी) राम नाम का स्मरण करके और श्रीरघुनाथजी को मस्तक नवाकर मैं रामजी के गुणों का वर्णन करता हूँ ॥१॥
मोरि सुधारिहि सो सब भाँती । जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती ॥
राम सुस्वामि कुसेवकु मोसो । निज दिसि देखि दयानिधि पोसो॥
अर्थात
वे (श्रीरामजी) मेरी [बिगड़ी] सब तरह से सुधार लेंगे; जिनकी कृपा कृपा करने से नहीं अघाती।
राम-से उत्तम स्वामी और मुझ-सरीखा बुरा सेवक ! इतने पर भी उन दयानिधि ने अपनी ओर देखकर मेरा पालन किया है ॥२॥
लोकहुँ बेद सुसाहिब रीती । बिनय सुनत पहिचानत प्रीती ॥
गनी गरीब ग्राम नर नागर । पंडित मूढ़ मलीन उजागर ॥
अर्थात
लोक और वेद में भी अच्छे स्वामी की यही रीति प्रसिद्ध है कि वह विनय सुनते ही प्रेम को पहचान लेता है।
अमीर-गरीब, गँवार-नगर निवासी, पण्डित-मूर्ख, बदनाम-यशस्वी, ॥३॥
सुकबि कुकबि निज मति अनुहारी । नृपहि सराहत सब नर नारी ॥
साधु सुजान सुसील नृपाला । ईस अंस भव परम कृपाला ॥
अर्थात
सुकवि-कुकवि, सभी नर-नारी अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार राजा की सराहना करते हैं।
और साधु, बुद्धिमान्, सुशील, ईश्वर के अंश से उत्पन्न कृपालु राजा- ॥४॥
सुनि सनमानहिं सबहि सुबानी । भनिति भगति नति गति पहिचानी ॥
यह प्राकृत महिपाल सुभाऊ । जान सिरोमनि कोसलराऊ ॥
अर्थात
सबकी सुनकर और उनकी वाणी, भक्ति, विनय और चाल को पहचानकर सुन्दर (मीठी) वाणी से सबका यथा योग्य सम्मान करते हैं। यह स्वभाव तो संसारी राजाओं का है, कोसलनाथ श्रीरामचन्द्रजी तो चतुर शिरोमणि हैं ॥५॥
रीझत राम सनेह निसोतें । को जग मंद मलिनमति मोतें ॥
अर्थात
श्रीरामजी तो विशुद्ध प्रेम से ही रीझते हैं, पर जगत् में मुझसे बढ़कर मूर्ख और मलिन बुद्धि और कौन होगा? ॥६॥
दो०-
सठ सेवक की प्रीति रुचि रखिहहिं राम कृपालु ।
उपल किए जलजान जेहिं सचिव सुमति कपि भालु ॥२८ (क)॥
अर्थात
तथापि कृपालु श्रीरामचन्द्रजी मुझ दुष्ट सेवक की प्रीति और रुचि को अवश्य रखेंगे, जिन्होंने पत्थरों को जहाज और बन्दर-भालुओं को बुद्धिमान् मन्त्री बना लिया ॥२८ (क)॥
हौंहु कहावत सबु कहत राम सहत उपहास ।
साहिब सीतानाथ सो सेवक तुलसीदास ॥२८ (ख)॥
अर्थात
सब लोग मुझे श्रीरामजी का सेवक कहते हैं और मैं भी [बिना लज्जा-संकोच के] कहलाता हूँ (कहने वालों का विरोध नहीं करता); कृपालु श्रीरामजी इस निन्दा को सहते हैं कि श्रीसीतानाथजी-जैसे स्वामी का तुलसीदास सा सेवक है ॥२८ (ख)॥
अति बड़ि मोरि ढिठाई खोरी । सुनि अघ नरकहुँ नाक सकोरी ॥
समुझि सहम मोहि अपडर अपनें । सो सुधि राम कीन्हि नहिं सपनें ॥
अर्थात
यह मेरी बहुत बड़ी ढिठाई और दोष है, मेरे पाप को सुनकर नरक ने भी नाक सिकोड़ ली (अर्थात् नरक में भी मेरे लिये ठौर नहीं है)।
यह समझकर मुझे अपने ही कल्पित डर से डर हो रहा है, किंतु भगवान् श्रीरामचन्द्रजी ने तो स्वप्न में भी इसपर (मेरी इस ढिठाई और दोष पर) ध्यान नहीं दिया ॥१॥
सुनि अवलोकि सुचित चख चाही । भगति मोरि मति स्वामि सराही ॥
कहत नसाइ होइ हियँ नीकी । रीझत राम जानि जन जी की ॥
अर्थात
वरं मेरे प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने तो इस बात को सुनकर, देखकर और अपने सुचित्त रूपी चक्षु से निरीक्षण कर मेरी भक्ति और बुद्धि की [उलटे] सराहना की।
क्योंकि कहने में चाहे बिगड़ जाय (अर्थात् मैं चाहे अपने को भगवान् का सेवक कहता-कहलाता रहूँ ), परंतु हृदय में अच्छा पन होना चाहिये।
(हृदय तो अपने को उनका सेवक बनने योग्य नहीं मानकर पापी और दीन ही मानता हूँ, यह अच्छा पन है।) श्रीरामचन्द्रजी भी दास के हृदय की [अच्छी] स्थिति जानकर रीझ जाते हैं ॥२॥
रहति न प्रभु चित चूक किए की । करत सुरति सय बार हिए की॥
जेहिं अघ बधेउ ब्याध जिमि बाली । फिरि सुकंठ सोइ कीन्हि कुचाली ॥
अर्थात
प्रभु के चित्त में अपने भक्तों की की हुई भूल-चूक याद नहीं रहती (वे उसे भूल जाते हैं) और उनके हृदय [की अच्छाई-नीकी] को सौ-सौ बार याद करते रहते हैं।
जिस पाप के कारण उन्होंने बालि को व्याध की तरह मारा था, वैसी ही कुचाल फिर सुग्रीव ने चली ॥३॥
सोइ करतूति बिभीषन केरी । सपनेहुँ सो न राम हियँ हेरी ॥
ते भरतहि भेंटत सनमाने । राजसभाँ रघुबीर बखाने ॥
अर्थात
वही करनी विभीषण की थी, परन्तु श्रीरामचन्द्रजी ने स्वप्न में भी उसका मन में विचार नहीं किया।
उलटे भरतजी से मिलने के समय श्रीरघुनाथजी ने उनका सम्मान किया और राजसभा में भी उनके गुणों का बखान किया ॥४॥
दो०-
प्रभु तरु तर कपि डार पर ते किए आपु समान ।
तुलसी कहूँ न राम से साहिब सीलनिधान ॥२९ (क)॥
अर्थात
प्रभु (श्रीरामचन्द्रजी) तो वृक्ष के नीचे और बंदर डाली पर (अर्थात् कहाँ मर्यादापुरुषोत्तम सच्चिदानन्दघन परमात्मा श्रीरामजी और कहाँ पेड़ों की शाखाओं पर कूदने वाले बंदर)।
परन्तु ऐसे बंदरों को भी उन्होंने अपने समान बना लिया। तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्रजी-सरीखे शीलनिधान स्वामी कहीं भी नहीं हैं ।।२९ (क)॥
राम निकाईं रावरी है सबही को नीक ।
जौं यह साँची है सदा तौ नीको तुलसीक ॥२९ (ख)॥
अर्थात
हे श्रीरामजी ! आपकी अच्छाई से सभी का भला है (अर्थात् आपका कल्याणमय स्वभाव सभी का कल्याण करने वाला है)।
यदि यह बात सच है तो तुलसीदास का भी सदा कल्याण ही होगा ॥२९ (ख)॥
एहि बिधि निज गुन दोष कहि सबहि बहुरि सिरु नाइ ।
बरनउँ रघुबर बिसद जसु सुनि कलि कलुष नसाइ ॥२९ (ग)॥
अर्थात
इस प्रकार अपने गुण-दोषों को कहकर और सबको फिर सिर नवाकर मैं श्रीरघुनाथजी का निर्मल यश वर्णन करता हूँ जिसके सुनने से कलियुग के पाप नष्ट हो जाते हैं ॥२९ (ग)॥
जागबलिक जो कथा सुहाई । भरद्वाज मुनिबरहि सुनाई ॥
कहिहउँ सोइ संबाद बखानी । सुनहुँ सकल सज्जन सुखु मानी ॥
अर्थात
मुनि याज्ञवल्क्यजी ने जो सुहावनी कथा मुनिश्रेष्ठ भरद्वाजजी को सुनायी थी, उसी संवाद को मैं बखान कर कहूँगा; सब सज्जन सुख का अनुभव करते हुए उसे सुनें ॥१॥
संभु कीन्ह यह चरित सुहावा । बहुरि कृपा करि उमहि सुनावा ॥
सोइ सिव कागभुसुंडिहि दीन्हा । राम भगत अधिकारी चीन्हा ॥
अर्थात
शिवजी ने पहले इस सुहावने चरित्र को रचा, फिर कृपा करके पार्वतीजी को सुनाया। वही चरित्र शिवजी ने काकभुशुण्डिजी को राम भक्त और अधिकारी पहचानकर दिया ॥२॥
तेहि सन जागबलिक पुनि पावा । तिन्ह पुनि भरद्वाज प्रति गावा ॥
ते श्रोता बकता समसीला । सवॅंदरसी जानहिं हरिलीला ॥
अर्थात
उन काकभुशुण्डिजीसे फिर याज्ञवल्क्यजीने पाया और उन्होंने फिर उसे भरद्वाजजीको गाकर सुनाया। वे दोनों वक्ता और श्रोता (याज्ञवल्क्य और भरद्वाज) समान शीलवाले और समदर्शी हैं और श्रीहरिकी लीलाको जानते हैं ॥३॥
जानहिं तीनि काल निज ग्याना । करतल गत आमलक समाना ॥
औरउ जे हरिभगत सुजाना । कहहिं सुनहिं समुझहिं बिधि नाना ॥
अर्थात
वे अपने ज्ञान से तीनों कालों की बातों को हथेली पर रखे हुए आँवले के समान (प्रत्यक्ष) जानते हैं। और भी जो सुजान (भगवान् की लीलाओं का रहस्य जानने वाले) हरि भक्त हैं, वे इस चरित्र को नाना प्रकार से कहते, सुनते और समझते हैं ॥४॥
दो०-
मैं पुनि निज गुर सन सुनी कथा सो सूकरखेत ।
समुझी नहिं तसि बालपन तब अति रहेउँ अचेत ॥३० (क)॥
अर्थात
फिर वही कथा मैंने वाराह-क्षेत्र में अपने गुरुजी से सुनी; परन्तु उस समय मैं लड़कपन के कारण बहुत बेसमझ था, इससे उसको उस प्रकार (अच्छी तरह) समझा नहीं ॥३० (क)॥
श्रोता बकता ग्याननिधि कथा राम कै गूढ़ ।
किमि समुझौं मैं जीव जड़ कलि मल ग्रसित बिमूढ़ ॥३० (ख)॥
अर्थात
श्रीरामजी की गूढ कथा के वक्ता (कहने वाले) और श्रोता (सुनने वाले) दोनों ज्ञान के खजाने (पूरे ज्ञानी) होते हैं।
मैं कलियुग के पापों से ग्रसा हुआ महामूढ़ जड़ जीव भला उसको कैसे समझ सकता था? ॥३० (ख)॥
तदपि कही गुर बारहिं बारा । समुझि परी कछु मति अनुसारा ॥
भाषाबद्ध करबि मैं सोई । मोरें मन प्रबोध जेहिं होई ॥
अर्थात
तो भी गुरुजी ने जब बार-बार कथा कही, तब बुद्धि के अनुसार कुछ समझ में आयी। वही अब मेरे द्वारा भाषा में रची जायगी, जिससे मेरे मन को सन्तोष हो ॥१॥
जस कछु बुधि बिबेक बल मेरें । तस कहिहउँ हियँ हरि के प्रेरें ।
निज संदेह मोह भ्रम हरनी । करउँ कथा भव सरिता तरनी ॥
अर्थात
जैसा कुछ मुझमें बुद्धि और विवेक का बल है, मैं हृदय में हरि की प्रेरणा से उसी के अनुसार कहूँगा।
मैं अपने सन्देह, अज्ञान और भ्रम को हरने वाली कथा रचता हूँ, जो संसार रूपी नदी के पार करने के लिये नाव है ॥२॥
बुध बिश्राम सकल जन रंजनि । रामकथा कलि कलुष बिभंजनि ॥
रामकथा कलि पंनग भरनी । पुनि बिबेक पावक कहुँ अरनी ॥
अर्थात
रामकथा पण्डितों को विश्राम देने वाली, सब मनुष्यों को प्रसन्न करने वाली और कलियुग के पापों का नाश करने वाली है। रामकथा कलियुग रूपी साँप के लिये मोरनी है और विवेक रूपी अग्नि के प्रकट करने के लिये अरणि (मन्थन की जाने वाली लकड़ी) है, (अर्थात् इस कथा से ज्ञान की प्राप्ति होती है) ॥३॥
रामकथा कलि कामद गाई । सुजन सजीवनि मूरि सुहाई ॥
सोइ बसुधातल सुधा तरंगिनि । भय भंजनि भ्रम भेक भुअंगिनि ॥
अर्थात
राम कथा कलियुग में सब मनोरथों को पूर्ण करने वाली कामधेनु गौ है और सज्जनों के लिये सुन्दर सञ्जीवनी जड़ी है। पृथ्वी पर यही अमृत की नदी है, जन्म-मरण रूपी भयका नाश करने वाली और भ्रम रूपी मेढकों को खाने के लिये सर्पिणी है ॥४॥
असुर सेन सम नरक निकंदिनि । साधु बिबुध कुल हित गिरिनंदिनि ॥
संत समाज पयोधि रमा सी । बिस्व भार भर अचल छमा सी ॥
अर्थात
यह राम कथा असुरों की सेना के समान नरकों का नाश करने वाली और साधु रूप देवताओं के कुल का हित करने वाली पार्वती (दुर्गा) है।
यह संत-समाज रूपी क्षीर समुद्र के लिये लक्ष्मीजी के समान है और सम्पूर्ण विश्व का भार उठाने में अचल पृथ्वी के समान है ॥५॥
जम गन मुहँ मसि जग जमुना सी । जीवन मुकुति हेतु जनु कासी ॥
रामहि प्रिय पावनि तुलसी सी । तुलसिदास हित हियँ हुलसी सी ॥
अर्थात
यमदूतों के मुखपर कालिख लगाने के लिये यह जगत् में यमुनाजी के समान है और जीवों को मुक्ति देने के लिये मानो काशी ही है।
यह श्रीरामजी को पवित्र तुलसी के समान प्रिय है और तुलसीदास के लिये हुलसी (तुलसीदासजी की माता) के समान हृदय से हित करने वाली है ॥६॥
सिवप्रिय मेकल सैल सुता सी । सकल सिद्धि सुख संपति रासी ॥
सदगुन सुरगन अंब अदिति सी । रघुबर भगति प्रेम परमिति सी ॥
अर्थात
यह राम कथा शिवजी को नर्मदाजी के समान प्यारी है, यह सब सिद्धियों की तथा सुख-सम्पत्ति की राशि है।
सद्गुण रूपी देवताओं के उत्पन्न और पालन-पोषण करने के लिये माता अदिति के समान है। श्रीरघुनाथजी की भक्ति और प्रेम की परम सीमा-सी है ॥७॥
दो०-
रामकथा मंदाकिनी चित्रकूट चित चारु ।
तुलसी सुभग सनेह बन सिय रघुबीर बिहारु ॥३१॥
अर्थात
तुलसीदास जी कहते हैं कि राम कथा मन्दाकिनी नदी है, सुन्दर (निर्मल) चित्त चित्रकूट है, और सुन्दर स्नेह ही वन है, जिसमें श्रीसीतारामजी विहार करते हैं ॥३१॥
रामचरित चिंतामनि चारू । संत सुमति तिय सुभग सिंगारू ॥
जग मंगल गुनग्राम राम के । दानि मुकुति धन धरम धाम के ॥
अर्थात
श्रीरामचन्द्रजी का चरित्र सुन्दर चिन्तामणि है और संतों की सुबुद्धि रूपी स्त्री का सुन्दर शृङ्गार है।
श्रीरामचन्द्रजी के गुण समूह जगत् का कल्याण करने वाले और मुक्ति, धन, धर्म और परमधाम के देने वाले हैं ॥१॥
सदगुर ग्यान बिराग जोग के । बिबुध बैद भव भीम रोग के ॥
जननि जनक सिय राम प्रेम के । बीज सकल ब्रत धरम नेम के ॥
अर्थात
ज्ञान, वैराग्य और योग के लिये सद्गुरु हैं और संसार रूपी भयंकर रोग का नाश करने के लिये देवताओं के वैद्य (अश्विनी कुमार) के समान हैं।
ये श्रीसीतारामजी के प्रेम के उत्पन्न करने के लिये माता-पिता हैं और सम्पूर्ण व्रत, धर्म और नियमों के बीज हैं ॥२॥
समन पाप संताप सोक के । प्रिय पालक परलोक लोक के ॥
सचिव सुभट भूपति बिचार के । कुंभज लोभ उदधि अपार के ॥
अर्थात
पाप, सन्ताप और शोक का नाश करने वाले तथा इस लोक और परलोक के प्रिय पालन करने वाले हैं।
विचार (ज्ञान) रूपी राजा के शूरवीर मन्त्री और लोभ रूपी अपार समुद्र के सोखने के लिये अगस्त्य मुनि हैं ॥३॥
काम कोह कलिमल करिगन के । केहरि सावक जन मन बन के ॥
अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद घन दारिद दवारि के ॥
अर्थात
भक्तों के मन रूपी वन में बसने वाले काम, क्रोध और कलियुग के पाप रूपी हाथियों के मारने के लिये सिंह के बच्चे हैं।
शिवजी के पूज्य और प्रियतम अतिथि हैं और दरिद्रता रूपी दावानल के बुझाने के लिये कामना पूर्ण करने वाले मेघ हैं ॥४॥
मंत्र महामनि बिषय ब्याल के । मेटत कठिन कुअंक भाल के ॥
हरन मोह तम दिनकर कर से । सेवक सालि पाल जलधर से ॥
अर्थात
विषय रूपी साँप का जहर उतारने के लिये मन्त्र और महामणि हैं। ये ललाट पर लिखे हुए कठिनता से मिटने वाले बुरे लेखों (मन्द प्रारब्ध) को मिटा देने वाले हैं।
अज्ञान रूपी अन्धकार के हरण करने के लिये सूर्य किरणों के समान और सेवक रूपी धान के पालन करने में मेघ के समान हैं ॥५॥
अभिमत दानि देवतरु बर से । सेवत सुलभ सुखद हरि हर से ॥
सुकबि सरद नभ मन उडगन से । रामभगत जन जीवन धन से ॥
अर्थात
मनोवाञ्छित वस्तु देने में श्रेष्ठ कल्पवृक्ष के समान हैं और सेवा करने में हरि-हर के समान सुलभ और सुख देने वाले हैं।
सुकवि रूपी शरद् ऋतु के मनरूपी आकाश को सुशोभित करने के लिये तारागण के समान और श्रीरामजी के भक्तों के तो जीवन धन ही हैं ॥६॥
सकल सुकृत फल भूरि भोग से । जग हित निरुपधि साधु लोग से ॥
सेवक मन मानस मराल से । पावन गंग तरंग माल से ॥
अर्थात
सम्पूर्ण पुण्यों के फल महान् भोगों के समान हैं। जगत् का छल रहित (यथार्थ) हित करने में साधु-संतों के समान हैं। सेवकों के मनरूपी मानसरोवर के लिये हंस के समान और पवित्र करने में गङ्गाजी की तरङ्ग मालाओं के समान हैं ॥७॥
दो०-
कुपथ कुतरक कुचालि कलि कपट दंभ पाषंड ।
दहन राम गुन ग्राम जिमि इंधन अनल प्रचंड ॥३२ (क)॥
अर्थात
श्रीरामजी के गुणों के समूह कुमार्ग, कुतर्क, कुचाल और कलियुग के कपट, दम्भ और पाखण्ड के जलाने के लिये वैसे ही हैं जैसे ईंधन के लिये प्रचण्ड अग्नि ॥३२ (क)॥
रामचरित राकेस कर सरिस सुखद सब काहु ।
सज्जन कुमुद चकोर चित हित बिसेषि बड़ लाहु ॥३२ (ख)॥
अर्थात
रामचरित्र पूर्णिमा के चन्द्रमा की किरणों के समान सभी को सुख देने वाले हैं, परन्तु सज्जन रूपी कुमुदिनी और चकोर के चित्त के लिये तो विशेष हितकारी और महान् लाभदायक हैं ॥३२ (ख)॥
मानस निर्माण की तिथि
कीन्हि प्रस्न जेहि भाँति भवानी । जेहि बिधि संकर कहा बखानी ॥
सो सब हेतु कहब मैं गाई । कथा प्रबंध बिचित्र बनाई ॥
अर्थात
जिस प्रकार श्रीपार्वतीजी ने श्रीशिवजी से प्रश्न किया और जिस प्रकार से श्रीशिवजी ने विस्तार से उसका उत्तर कहा, वह सब कारण मैं विचित्र कथा की रचना करके गाकर कहूँगा ॥१॥
जेहिं यह कथा सुनी नहिं होई । जनि आचरजु करै सुनि सोई ॥
कथा अलौकिक सुनहिं जे ग्यानी । नहिं आचरजु करहिं अस जानी ॥
रामकथा कै मिति जग नाहीं । असि प्रतीति तिन्ह के मन माहीं ॥
नाना भाँति राम अवतारा । रामायन सत कोटि अपारा ॥
अर्थात
जिसने यह कथा पहले न सुनी हो, वह इसे सुनकर आश्चर्य न करे। जो ज्ञानी इस विचित्र कथा को सुनते हैं, वे यह जानकर आश्चर्य नहीं करते कि संसार में राम कथा की कोई सीमा नहीं है (राम कथा अनन्त है)।
उनके मन में ऐसा विश्वास रहता है। नाना प्रकार से श्रीरामचन्द्रजी के अवतार हुए हैं और सौ करोड़ तथा अपार रामायण हैं ॥२-३॥
कलपभेद हरिचरित सुहाए । भाँति अनेक मुनीसन्ह गाए॥
करिअ न संसय अस उर आनी । सुनिअ कथा सादर रति मानी ॥
अर्थात
कल्पभेद के अनुसार श्रीहरि के सुन्दर चरित्रों को मुनीश्वरों ने अनेकों प्रकार से गाया है। हृदय में ऐसा विचार कर संदेह न कीजिये और आदर सहित प्रेम से इस कथा को सुनिये ॥४॥
दो०-
राम अनंत अनंत गुन अमित कथा बिस्तार ।
सुनि आचरजु न मानिहहिं जिन्ह के बिमल बिचार ॥३३॥
अर्थात
श्रीरामचन्द्रजी अनन्त हैं, उनके गुण भी अनन्त हैं और उनकी कथाओं का विस्तार भी असीम है।
अतएव जिनके विचार निर्मल हैं, वे इस कथा को सुनकर आश्चर्य नहीं मानेंगे ॥३३॥
एहि बिधि सब संसय करि दूरी । सिर धरि गुर पद पंकज धूरी ॥
पुनि सबही बिनवउँ कर जोरी । करत कथा जेहिं लाग न खोरी ॥
अर्थात
इस प्रकार सब संदेहों को दूर करके और श्रीगुरुजी के चरण कमलों की रज को सिर पर धारण करके मैं पुनः हाथ जोड़कर सबकी विनती करता हूँ, जिससे कथा की रचना में कोई दोष स्पर्श न करने पावे ॥१॥
सादर सिवहि नाइ अब माथा । बरनउँ बिसद राम गुन गाथा ॥
संबत सोरह सै एकतीसा । करउँ कथा हरि पद धरि सीसा ॥
अर्थात
अब मैं आदर पूर्वक श्रीशिवजी को सिर नवाकर श्रीरामचन्द्रजी के गुणों की निर्मल कथा कहता हूँ।
श्रीहरि के चरणों पर सिर रखकर संवत् १६३१ में इस कथाका आरम्भ करता हूँ ॥२॥
नौमी भौम बार मधुमासा । अवधपुरीं यह चरित प्रकासा ॥
जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं । तीरथ सकल तहाँ चलि आवहिं ॥
अर्थात
चैत्र मासकी नवमी तिथि मंगलवार को श्रीअयोध्याजी में यह चरित्र प्रकाशित हुआ।
जिस दिन श्रीरामजी का जन्म होता है, वेद कहते हैं कि उस दिन सारे तीर्थ वहाँ (श्रीअयोध्याजी में) चले आते हैं ॥३॥
असुर नाग खग नर मुनि देवा । आइ करहिं रघुनायक सेवा ॥
जन्म महोत्सव रचहिं सुजाना । करहिं राम कल कीरति गाना ॥
अर्थात
असुर, नाग, पक्षी, मनुष्य, मुनि और देवता सब अयोध्याजी में आकर श्रीरघुनाथजी की सेवा करते हैं।
बुद्धिमान् लोग जन्म का महोत्सव मनाते हैं और श्रीरामजी की सुन्दर कीर्ति का गान करते हैं ॥४॥
दो०-
मज्जहिं सज्जन बृंद बहु पावन सरजू नीर ।
जपहिं राम धरि ध्यान उर सुंदर स्याम सरीर ॥३४॥
अर्थात
सज्जनों के बहुत-से समूह उस दिन श्रीसरयूजी के पवित्र जल में स्नान करते हैं और हृदय में सुन्दर श्याम शरीर श्रीरघुनाथजी का ध्यान करके उनके नाम का जप करते हैं ॥३४॥
दरस परस मज्जन अरु पाना । हरइ पाप कह बेद पुराना ॥
नदी पुनीत अमित महिमा अति । कहि न सकइ सारदा बिमल मति ॥
अर्थात
वेद-पुराण कहते हैं कि श्रीसरयूजी का दर्शन, स्पर्श, स्नान और जलपान पापों को हरता है। यह नदी बड़ी ही पवित्र है, इसकी महिमा अनन्त है, जिसे विमल बुद्धि वाली सरस्वतीजी भी नहीं कह सकतीं ॥१॥
राम धामदा पुरी सुहावनि । लोक समस्त बिदित अति पावनि ॥
चारि खानि जग जीव अपारा । अवध तजें तनु नहिं संसारा ॥
अर्थात
यह शोभायमान अयोध्या पुरी श्रीरामचन्द्रजी के परमधाम की देने वाली है, सब लोकों में प्रसिद्ध है और अत्यन्त पवित्र है।
जगत् में [अण्डज, स्वेदज, उद्भिज और जरायुज] चार खानि (प्रकार) के अनन्त जीव हैं, इनमें से जो कोई भी अयोध्याजी में शरीर छोड़ते हैं वे फिर संसार में नहीं आते (जन्म-मृत्यु के चक्कर से छूटकर भगवान् के परमधाम में निवास करते हैं) ॥२॥
सब बिधि पुरी मनोहर जानी । सकल सिद्धिप्रद मंगल खानी ॥
बिमल कथा कर कीन्ह अरंभा । सुनत नसाहिं काम मद दंभा ॥
अर्थात
इस अयोध्यापुरी को सब प्रकार से मनोहर, सब सिद्धियों की देने वाली और कल्याण की खान समझकर मैंने इस निर्मल कथा का आरम्भ किया, जिसके सुनने से काम, मद और दम्भ नष्ट हो जाते हैं ॥३॥
रामचरितमानस एहि नामा । सुनत श्रवन पाइअ बिश्रामा ॥
मन करि बिषय अनल बन जरई । होइ सुखी जौं एहिं सर परई ॥
अर्थात
इसका नाम रामचरितमानस है, जिसके कानों से सुनते ही शान्ति मिलती है। मन रूपी हाथी विषय रूपी दावानल में जल रहा है, वह यदि इस रामचरितमानस रूपी सरोवर में आ पड़े तो सुखी हो जाय ॥४॥
रामचरितमानस मुनि भावन । बिरचेउ संभु सुहावन पावन ॥
त्रिबिध दोष दुख दारिद दावन । कलि कुचालि कुलि कलुष नसावन ॥
अर्थात
यह रामचरितमानस मुनियों का प्रिय है, इस सुहावने और पवित्र मानस की शिवजी ने रचना की। यह तीनों प्रकार के दोषों, दुःखों और दरिद्रता को तथा कलियुग की कुचालों और सब पापों का नाश करने वाला है ॥५॥
रचि महेस निज मानस राखा । पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा ॥
तातें रामचरितमानस बर । धरेउ नाम हियँ हेरि हरषि हर ॥
अर्थात
श्रीमहादेवजी ने इसको रचकर अपने मन में रखा था और सुअवसर पाकर पार्वतीजी से कहा।
इसी से शिवजी ने इसको अपने हृदय में देखकर और प्रसन्न होकर इसका सुन्दर 'रामचरितमानस' नाम रखा ॥६॥
कहउँ कथा सोइ सुखद सुहाई । सादर सुनहु सुजन मन लाई ॥
अर्थात
मैं उसी सुख देने वाली सुहावनी राम कथा को कहता हूँ, हे सज्जनो ! आदर पूर्वक मन लगाकर इसे सुनिये ॥७॥
दो०-
जस मानस जेहि बिधि भयउ जग प्रचार जेहि हेतु ।
अब सोइ कहउँ प्रसंग सब सुमिरि उमा बृषकेतु ॥३५॥
अर्थात
यह रामचरितमानस जैसा है, जिस प्रकार बना है और जिस हेतु से जगत् में इसका प्रचार हुआ, अब वही सब कथा मैं श्री उमा-महेश्वर का स्मरण करके कहता हूँ ॥३५॥
संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी । रामचरितमानस कबि तुलसी ॥
करइ मनोहर मति अनुहारी । सुजन सुचित सुनि लेहु सुधारी ॥
अर्थात
श्रीशिवजी की कृपा से उसके हृदय में सुन्दर बुद्धि का विकास हुआ, जिससे यह तुलसीदास श्रीरामचरितमानस का कवि हुआ।
अपनी बुद्धि के अनुसार तो वह इसे मनोहर ही बनाता है। किंतु फिर भी हे सज्जनो ! सुन्दर चित्त से सुनकर इसे आप सुधार लीजिये ॥१॥
सुमति भूमि थल हृदय अगाधू । बेद पुरान उदधि घन साधू ॥
बरषहिं राम सुजस बर बारी । मधुर मनोहर मंगलकारी ॥
अर्थात
सुन्दर (सात्त्विकी) बुद्धि भूमि है, हृदय ही उसमें गहरा स्थान है, वेद-पुराण समुद्र हैं और साधु-संत मेघ हैं।
वे (साधु रूपी मेघ) श्रीरामजी के सुयश रूपी सुन्दर, मधुर, मनोहर और स मङ्गल कारी जल की वर्षा करते हैं ॥२॥
लीला सगुन जो कहहिं बखानी । सोइ स्वच्छता करइ मल हानी ॥
प्रेम भगति जो बरनि न जाई । सोइ मधुरता सुसीतलताई ॥
अर्थात
सगुण लीला का जो विस्तार से वर्णन करते हैं, वही राम-सुयश रूपी जल की निर्मलता है, जो मल का नाश करती है; और जिस प्रेमा भक्ति का वर्णन नहीं किया जा सकता, वही इस जल की मधुरता और सुन्दर शीतलता है ॥३॥
सो जल सुकृत सालि हित होई । राम भगत जन जीवन सोई ॥
मेधा महि गत सो जल पावन । सकिलि श्रवन मग चलेउ सुहावन ॥
भरेउ सुमानस सुथल थिराना । सुखद सीत रुचि चारु चिराना ॥
अर्थात
वह (राम-सुयश रूपी) जल सत्कर्म रूपी धान के लिये हितकर है और श्रीरामजी के भक्तों का तो जीवन ही है।
वह पवित्र जल बुद्धि रूपी पृथ्वी पर गिरा और सिमटकर सुहावने कान रूपी मार्ग से चला और मानस (हृदय) रूपी श्रेष्ठ स्थान में भरकर वहीं स्थिर हो गया।
वही पुराना होकर सुन्दर, रुचिकर, शीतल और सुखदायी हो गया ॥ ४-५॥
दो०-
सुठि सुंदर संबाद बर बिरचे बुद्धि बिचारि ।
तेइ एहि पावन सुभग सर घाट मनोहर चारि ॥३६॥
अर्थात
इस कथा में बुद्धि से विचारकर जो चार अत्यन्त सुन्दर और उत्तम संवाद (भुशुण्डि-गरुड़, शिवपार्वती, याज्ञवल्क्य-भरद्वाज और तुलसीदास और संत) रचे हैं, वही इस पवित्र और सुन्दर सरोवरके चार मनोहर घाट हैं ॥३६॥
सप्त प्रबंध सुभग सोपाना । ग्यान नयन निरखत मन माना ॥
रघुपति महिमा अगुन अबाधा । बरनब सोइ बर बारि अगाधा ॥
अर्थात
सात काण्ड ही इस मानस-सरोवर की सुन्दर सात सीढ़ियाँ हैं, जिनको ज्ञान रूपी नेत्रों से देखते ही मन प्रसन्न हो जाता है।
श्रीरघुनाथजी की निर्गुण (प्राकृतिक गुणों से अतीत) और निर्बाध (एकरस) महिमा का जो वर्णन किया जायगा, वही इस सुन्दर जलकी अथाह गहराई है ॥१॥
राम सीय जस सलिल सुधासम । उपमा बीचि बिलास मनोरम ॥
पुरइनि सघन चारु चौपाई । जुगुति मंजु मनि सीप सुहाई ॥
अर्थात
श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी का यश अमृत के समान जल है। इसमें जो उपमाएँ दी गयी हैं वही तरङ्गों का मनोहर विलास है।
सुन्दर चौपाइयाँ ही इसमें घनी फैली हुई पुरइन (कमलिनी) हैं और कविता की युक्तियाँ सुन्दर मणि (मोती) उत्पन्न करने वाली सुहावनी सीपियाँ हैं ॥२॥
छंद सोरठा सुंदर सुंदर दोहा । सोइ बहुरंग कमल कुल सोहा ॥
अरथ अनूप सुभाव सुभासा । सोइ पराग मकरंद सुबासा ॥
अर्थात
जो सुन्दर छन्द, सोरठे और दोहे हैं, वही इसमें बहुरंगे कमलों के समूह सुशोभित हैं। अनुपम अर्थ, ऊँचे भाव और सुन्दर भाषा ही पराग (पुष्परज), मकरन्द (पुष्परस) और सुगन्ध हैं ॥३॥
सुकृत पुंज मंजुल अलि माला । ग्यान बिराग बिचार मराला ॥
धुनि अवरेब कबित गुन जाती । मीन मनोहर ते बहुभाँती ॥
अर्थात
सत्कर्मों (पुण्यों) के पुञ्ज भौंरों की सुन्दर पंक्तियाँ हैं, ज्ञान, वैराग्य और विचार हंस हैं। कविता की ध्वनि वक्रोक्ति, गुण और जाति ही अनेकों प्रकार की मनोहर मछलियाँ हैं ॥४॥
अरथ धरम कामादिक चारी । कहब ग्यान बिग्यान बिचारी ॥
नव रस जप तप जोग बिरागा । ते सब जलचर चारु तड़ागा ॥
अर्थात
अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष-ये चारों, ज्ञान-विज्ञान का विचार के कहना, काव्य के नौ रस, जप, तप, योग और वैराग्य के प्रसंग-ये सब इस सरोवर के सुन्दर जलचर जीव हैं ॥५॥
सुकृती साधु नाम गुन गाना । ते बिचित्र जलबिहग समाना ॥
संतसभा चहुँ दिसि अवराई । श्रद्धा रितु बसंत सम गाई ॥
अर्थात
सुकृती (पुण्यात्मा) जनों के, साधुओं के और श्रीरामनाम के गुणों का गान ही विचित्र जल पक्षियों के समान है।
संतों की सभा ही इस सरोवर के चारों ओर की अमराई (आम की बगीचियाँ) हैं और श्रद्धा वसन्त ऋतु के समान कही गयी है ॥६॥
भगति निरूपन बिबिध बिधाना । छमा दया दम लता बिताना ॥
सम जम नियम फूल फल ग्याना । हरि पद रति रस बेद बखाना ॥
अर्थात
नाना प्रकार से भक्ति का निरूपण और क्षमा, दया तथा दम (इन्द्रिय निग्रह) लताओं के मण्डप हैं।
मनका निग्रह, यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह), नियम (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान) ही उनके फूल हैं, ज्ञान फल है और श्रीहरि के चरणों में प्रेम ही इस ज्ञान रूपी फल का रस है।
ऐसा वेदोंने कहा है ॥७॥
औरउ कथा अनेक प्रसंगा । तेइ सुक पिक बहुबरन बिहंगा ॥
अर्थात
इस (रामचरितमानस) में और भी जो अनेक प्रसङ्गों की कथाएँ हैं, वे ही इसमें तोते, कोयल आदि रंग-बिरंगे पक्षी हैं ॥८॥
दो०-
पुलक बाटिका बाग बन सुख सुबिहंग बिहारु ।
माली सुमन सनेह जल सींचत लोचन चारु ॥३७॥
अर्थात
कथा में जो रोमाञ्च होता है वही वाटिका, बाग और वन हैं; और जो सुख होता है, वही सुन्दर पक्षियों का विहार है। निर्मल मन ही माली है जो प्रेम रूपी जल से सुन्दर नेत्रों द्वारा उनको सींचता है ॥३७॥
जे गावहिं यह चरित सँभारे । तेइ एहि ताल चतुर रखवारे ॥
सदा सुनहिं सादर नर नारी । तेइ सुरबर मानस अधिकारी ॥
अर्थात
जो लोग इस चरित्र को सावधानी से गाते हैं, वे ही इस तालाब के चतुर रखवाले हैं और जो स्त्री-पुरुष सदा आदर पूर्वक इसे सुनते हैं, वे ही इस सुन्दर मानस के अधिकारी उत्तम देवता हैं ॥१॥
अति खल जे बिषई बग कागा । एहि सर निकट न जाहिं अभागा ॥
संबुक भेक सेवार समाना। इहाँ न बिषय कथा रस नाना ॥
अर्थात
जो अति दुष्ट और विषयी हैं वे अभागे बगुले और कौवे हैं, जो इस सरोवर के समीप नहीं जाते। क्योंकि यहाँ (इस मानस-सरोवर में) घोंघे, मेढक और सेवार के समान विषय-रस की नाना कथाएँ नहीं हैं ॥२॥
तेहि कारन आवत हियँ हारे । कामी काक बलाक बिचारे ॥
आवत एहिं सर अति कठिनाई । राम कृपा बिनु आइ न जाई ॥
अर्थात
इसी कारण बेचारे कौवे और बगुले रूपी विषयी लोग यहाँ आते हुए हृदय में हार मान जाते हैं। क्योंकि इस सरोवर तक आने में कठिनाइयाँ बहुत हैं। श्रीरामजी की कृपा बिना यहाँ नहीं आया जाता ॥३॥
कठिन कुसंग कुपंथ कराला । तिन्ह के बचन बाघ हरि ब्याला ॥
गृह कारज नाना जंजाला । ते अति दुर्गम सैल बिसाला ॥
अर्थात
घोर कुसंग ही भयानक बुरा रास्ता है; उन कुसंगियों के वचन ही बाघ, सिंह और साँप हैं। घर के काम-काज और गृहस्थी के भाँति-भाँति के जंजाल ही अत्यन्त दुर्गम बड़े-बड़े पहाड़ हैं ॥४॥
बन बहु बिषम मोह मद माना । नदी कुतर्क भयंकर नाना ॥
अर्थात
मोह, मद और मान ही बहुत-से बीहड़ वन हैं और नाना प्रकार के कुतर्क ही भयानक नदियाँ हैं ॥५॥
दो०-
जे श्रद्धा संबल रहित नहिं संतन्ह कर साथ ।
तिन्ह कहुँ मानस अगम अति जिन्हहि न प्रिय रघुनाथ ॥३८॥
अर्थात
जिनके पास श्रद्धा रूपी राह-खर्च नहीं है और संतों का साथ नहीं है और जिनको श्रीरघुनाथजी प्रिय नहीं हैं, उनके लिये यह मानस अत्यन्त ही अगम है। (अर्थात् श्रद्धा, सत्संग और भगवत्प्रेम के बिना कोई इसको नहीं पा सकता) ॥३८॥
जौं करि कष्ट जाइ पुनि कोई । जातहिं नीद जुड़ाई होई ॥
जड़ता जाड़ बिषम उर लागा । गएहुँ न मज्जन पाव अभागा ॥
अर्थात
यदि कोई मनुष्य कष्ट उठाकर वहाँ तक पहुँच भी जाय, तो वहाँ जाते ही उसे नींद रूपी जूड़ी आ जाती है। हृदय में मूर्खता रूपी बड़ा कड़ा जाड़ा लगने लगता है, जिससे वहाँ जाकर भी वह अभागा स्नान नहीं कर पाता ॥१॥
करि न जाइ सर मज्जन पाना । फिरि आवइ समेत अभिमाना ॥
जौं बहोरि कोउ पूछन आवा । सर निंदा करि ताहि बुझावा ॥
अर्थात
उससे उस सरोवर में स्नान और उसका जलपान तो किया नहीं जाता, वह अभिमान सहित लौट आता है। फिर यदि कोई उससे [वहाँ का हाल] पूछने आता है, तो वह [अपने अभाग्य की बात न कहकर] सरोवर की निन्दा करके उसे समझाता है ॥२॥
सकल बिघ्न ब्यापहिं नहिं तेही । राम सुकृपाँ बिलोकहिं जेही ॥
सोइ सादर सर मज्जनु करई । महा घोर त्रयताप न जरई ॥
अर्थात
ये सारे विघ्न उसको नहीं व्यापते (बाधा नहीं देते) जिसे श्रीरामचन्द्रजी सुन्दर कृपा की दृष्टि से देखते हैं।
वही आदर पूर्वक इस सरोवर में स्नान करता है और महान् भयानक त्रिताप से (आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक तापों से) नहीं जलता ॥३॥
ते नर यह सर तजहिं न काऊ । जिन्ह के राम चरन भल भाऊ ॥
जो नहाइ चह एहिं सर भाई । सो सतसंग करउ मन लाई ॥
अर्थात
जिनके मन में श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में सुन्दर प्रेम है, वे इस सरोवर को कभी नहीं छोड़ते। हे भाई ! जो इस सरोवर में स्नान करना चाहे वह मन लगाकर सत्संग करे ॥४॥
अस मानस मानस चख चाही । भइ कबि बुद्धि बिमल अवगाही ॥
भयउ हृदयँ आनंद उछाहू । उमगेउ प्रेम प्रमोद प्रबाहू ॥
अर्थात
ऐसे मानस-सरोवर को हृदय के नेत्रों से देखकर और उसमें गोता लगाकर कवि की बुद्धि निर्मल हो गयी, हृदय में आनन्द और उत्साह भर गया और प्रेम तथा आनन्द का प्रवाह उमड़ आया ॥५॥
चली सुभग कबिता सरिता सो । राम बिमल जस जल भरिता सो ॥
सरजू नाम सुमंगल मूला । लोक बेद मत मंजुल कूला ॥
अर्थात
उससे वह सुन्दर कविता रूपी नदी बह निकली, जिसमें श्रीरामजी का निर्मल यश रूपी जल भरा है।
इस (कवितारूपिणी नदी) का नाम सरयू है, जो सम्पूर्ण सुन्दर मङ्गलों की जड़ है।
लोकमत और वेदमत इसके दो सुन्दर किनारे हैं ॥६॥
नदी पुनीत सुमानस नंदिनि । कलिमल तृन तरु मूल निकंदिनि ॥
अर्थात
यह सुन्दर मानस-सरोवर की कन्या सरयू नदी बड़ी पवित्र है और कलियुग के [छोटे-बड़े] पाप रूपी तिनकों और वृक्षों को जड़से उखाड़ फेंकने वाली है ॥७॥
दो०-
श्रोता त्रिबिध समाज पुर ग्राम नगर दुहुँ कूल ।
संतसभा अनुपम अवध सकल सुमंगल मूल ॥३९॥
अर्थात
तीनों प्रकार के श्रोताओं का समाज ही इस नदी के दोनों किनारों पर बसे हुए पुरवे, गाँव और नगर हैं; और संतों की सभा ही सब सुन्दर मङ्गलों की जड़ अनुपम अयोध्याजी है ॥३९॥
रामभगति सुरसरितहि जाई । मिली सुकीरति सरजु सुहाई ॥
सानुज राम समर जसु पावन । मिलेउ महानदु सोन सुहावन ॥
अर्थात
सुन्दर कीर्तिरूपी सुहावनी सरयूजी रामभक्तिरूपी गङ्गाजीमें जा मिलीं। छोटे भाई लक्ष्मणसहित श्रीरामजीके युद्धका पवित्र यशरूपी सुहावना महानद सोन उसमें आ मिला॥१॥
जुग बिच भगति देवधुनि धारा । सोहति सहित सुबिरति बिचारा ॥
त्रिबिध ताप त्रासक तिमुहानी । राम सरूप सिंधु समुहानी ॥
अर्थात
दोनों के बीच में भक्ति रूपी गङ्गाजी की धारा ज्ञान और वैराग्य के सहित शोभित हो रही है। ऐसी तीनों तापों को डराने वाली यह तिमुहानी नदी राम स्वरूप रूपी समुद्र की ओर जा रही है ॥२॥
मानस मूल मिली सुरसरिही । सुनत सुजन मन पावन करिही ॥
बिच बिच कथा बिचित्र बिभागा । जनु सरि तीर तीर बन बागा ॥
अर्थात
इस (कीर्ति रूपी सरयू) का मूल मानस (श्रीरामचरित) है और यह [राम भक्ति रूपी] गङ्गाजी में मिली है, इसलिये यह सुनने वाले सज्जनों के मन को पवित्र कर देगी।
इसके बीच-बीच में जो भिन्न-भिन्न प्रकार की विचित्र कथाएँ हैं वे ही मानो नदी तट के आस-पास के वन और बाग हैं ॥३॥
उमा महेस बिबाह बराती । ते जलचर अगनित बहुभाँती॥
रघुबर जनम अनंद बधाई । भवॅंर तरंग मनोहरताई ॥
अर्थात
श्रीपार्वतीजी और शिवजी के विवाह के बराती इस नदी में बहुत प्रकार के असंख्य जलचर जीव हैं। श्रीरघुनाथजी के जन्म की आनन्द-बधाइयाँ ही इस नदी के भँवर और तरंगों की मनोहरता है ॥४॥
दो०-
बालचरित चहु बंधु के बनज बिपुल बहुरंग ।
नृप रानी परिजन सुकृत मधुकर बारि बिहंग ॥४०॥
अर्थात
चारों भाइयों के जो बालचरित हैं, वे ही इसमें खिले हुए रंग-बिरंगे बहुत-से कमल हैं। महाराज श्रीदशरथजी तथा उनकी रानियों और कुटुम्बियों के सत्कर्म (पुण्य) ही भ्रमर और जलपक्षी हैं ॥४०॥
सीय स्वयंबर कथा सुहाई । सरित सुहावनि सो छबि छाई ॥
नदी नाव पटु प्रस्न अनेका । केवट कुसल उतर सबिबेका ॥
अर्थात
श्रीसीताजी के स्वयंवर की जो सुन्दर कथा है, वही इस नदी में सुहावनी छबि छा रही है। अनेकों सुन्दर विचार पूर्ण प्रश्न ही इस नदी की नावें हैं और उनके विवेक युक्त उत्तर ही चतुर केवट हैं ॥१॥
सुनि अनुकथन परस्पर होई । पथिक समाज सोह सरि सोई ॥
घोर धार भृगुनाथ रिसानी । घाट सुबद्ध राम बर बानी ॥
अर्थात
इस कथा को सुनकर पीछे जो आपस में चर्चा होती है, वही इस नदी के सहारे-सहारे चलने वाले यात्रियों का समाज शोभा पा रहा है। परशुरामजी का क्रोध इस नदी की भयानक धारा है और श्रीरामचन्द्रजी के श्रेष्ठ वचन ही सुन्दर बँधे हुए घाट हैं ॥२॥
सानुज राम बिबाह उछाहू । सो सुभ उमग सुखद सब काहू ॥
कहत सुनत हरषहिं पुलकाहीं । ते सुकृती मन मुदित नहाहीं ॥
अर्थात
भाइयों सहित श्रीरामचन्द्रजी के विवाह का उत्साह ही इस कथा-नदी की कल्याण कारिणी बाढ़ है, जो सभी को सुख देने वाली है।
इसके कहने-सुनने में जो हर्षित और पुलकित होते हैं, वे ही पुण्यात्मा पुरुष हैं, जो प्रसन्न मन से इस नदी में नहाते हैं ॥३॥
राम तिलक हित मंगल साजा । परब जोग जनु जुरे समाजा ॥
काई कुमति केकई केरी । परी जासु फल बिपति घनेरी ॥
अर्थात
श्रीरामचन्द्रजी के राजतिलक के लिये जो मङ्गल-साज सजाया गया, वही मानो पर्व के समय इस नदी पर यात्रियों के समूह इकट्ठे हुए हैं।
कैकेयी की कुबुद्धि ही इस नदी में काई है, जिसके फल स्वरूप बड़ी भारी विपत्ति आ पड़ी ॥४॥
दो०-
समन अमित उतपात सब भरतचरित जपजाग ।
कलि अघ खल अवगुन कथन ते जलमल बग काग ॥४१॥
अर्थात
सम्पूर्ण अनगिनत उत्पातों को शान्त करने वाला भरतजी का चरित्र नदी-तट पर किया जाने वाला जपयज्ञ है। कलियुग के पापों और दुष्टों के अवगुणों के जो वर्णन हैं वे ही इस नदी के जल का कीचड़ और बगुले-कौए हैं ॥४१॥
कीरति सरित छहूँ रितु रूरी । समय सुहावनि पावनि भूरी ॥
हिम हिमसैलसुता सिव ब्याहू । सिसिर सुखद प्रभु जनम उछाहू ॥
अर्थात
यह कीर्तिरूपिणी नदी छहों ऋतुओं में सुन्दर है। सभी समय यह परम सुहावनी और अत्यन्त पवित्र है। इसमें शिव-पार्वती का विवाह हेमन्त ऋतु है।
श्रीरामचन्द्रजी के जन्म का उत्सव सुखदायी शिशिर ऋतु है ॥१॥
बरनब राम बिबाह समाजू । सो मुद मंगलमय रितुराजू ॥
ग्रीषम दुसह राम बनगवनू । पंथकथा खर आतप पवनू ॥
अर्थात
श्रीरामचन्द्रजी के विवाह-समाज का वर्णन ही आनन्द-मङ्गलमय ऋतुराज वसंत है। श्रीरामजी का वनगमन दुःसह ग्रीष्म-ऋतु है और मार्ग की कथा ही कड़ी धूप और लू है ॥२॥
बरषा घोर निसाचर रारी । सुरकुल सालि सुमंगलकारी ॥
राम राज सुख बिनय बड़ाई । बिसद सुखद सोइ सरद सुहाई ॥
अर्थात
राक्षसों के साथ घोर युद्ध ही वर्षा-ऋतु है, जो देवकुल रूपी धान के लिये सुन्दर कल्याण करने वाली है। रामचन्द्रजी के राज्य काल का जो सुख, विनम्रता और बड़ाई है वही निर्मल सुख देने वाली सुहावनी शरद्-ऋतु है ॥३॥
सती सिरोमनि सिय गुन गाथा । सोइ गुन अमल अनूपम पाथा ॥
भरत सुभाउ सुसीतलताई। सदा एकरस बरनि न जाई ॥
अर्थात
सती-शिरोमणि श्रीसीताजी के गुणों की जो कथा है, वही इस जल का निर्मल और अनुपम गुण है। श्रीभरतजी का स्वभाव इस नदी की सुन्दर शीतलता है, जो सदा एक-सी रहती है और जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥४॥
दो०-
अवलोकनि बोलनि मिलनि प्रीति परसपर हास ।
भायप भलि चहु बंधु की जल माधुरी सुबास ॥४२॥
अर्थात
चारों भाइयों का परस्पर देखना, बोलना, मिलना, एक-दूसरे से प्रेम करना, हँसना और सुन्दर भाईपन इस जल की मधुरता और सुगन्ध हैं ॥४२॥
आरति बिनय दीनता मोरी । लघुता ललित सुबारि न थोरी ॥
अदभुत सलिल सुनत गुनकारी । आस पिआस मनोमल हारी ॥
अर्थात
मेरा आर्तभाव, विनय और दीनता इस सुन्दर और निर्मल जल का कम हलकापन नहीं है (अर्थात् अत्यन्त हलकापन है)।
यह जल बड़ा ही अनोखा है, जो सुनने से ही गुण करता है और आशा रूपी प्यास को और मन के मैल को दूर कर देता है ॥१॥
राम सुप्रेमहि पोषत पानी । हरत सकल कलि कलुष गलानी ॥
भव श्रम सोषक तोषक तोषा । समन दुरित दुख दारिद दोषा ॥
अर्थात
यह जल श्रीरामचन्द्रजी के सुन्दर प्रेम को पुष्ट करता है, कलियुग के समस्त पापों और उनसे होने वाली ग्लानि को हर लेता है।
संसार के (जन्म-मृत्यु रूप) श्रम को सोख लेता है, सन्तोष को भी सन्तुष्ट करता है और पाप, ताप, दरिद्रता और दोषों को नष्ट कर देता है ॥२॥
काम कोह मद मोह नसावन । बिमल बिबेक बिराग बढ़ावन ॥
सादर मज्जन पान किए तें । मिटहिं पाप परिताप हिए तें ॥
अर्थात
यह जल काम, क्रोध, मद और मोह का नाश करने वाला और निर्मल ज्ञान और वैराग्य का बढ़ाने वाला है।
इसमें आदर पूर्वक स्नान करने से और इसे पीने से हृदय में रहने वाले सब पाप-ताप मिट जाते हैं ॥३॥
जिन्ह एहिं बारि न मानस धोए । ते कायर कलिकाल बिगोए॥
तृषित निरखि रबि कर भव बारी । फिरिहहिं मृग जिमि जीव दुखारी ॥
अर्थात
जिन्होंने इस (राम-सुयश रूपी) जल से अपने हृदय को नहीं धोया, वे कायर कलिकाल के द्वारा ठगे गये।
जैसे प्यासा हिरन सूर्य की किरणों के रेत पर पड़ने से उत्पन्न हुए जल के भ्रम को वास्तविक जल समझकर पीने को दौड़ता है और जल न पाकर दुखी होता है, वैसे ही वे (कलियुग से ठगे हुए) जीव भी [विषयों के पीछे भटक कर] दुःखी होंगे ॥४॥
दो०-
मति अनुहारि सुबारि गुन गन गनि मन अन्हवाइ ।
सुमिरि भवानी संकरहि कह कबि कथा सुहाइ ॥४३ (क)॥
अर्थात
अपनी बुद्धि के अनुसार इस सुन्दर जल के गुणों को विचार कर, उसमें अपने मन को स्नान करा कर और श्रीभवानी-शङ्कर को स्मरण करके कवि (तुलसीदास) सुन्दर कथा कहता है ॥४३ (क)॥
अब रघुपति पद पंकरुह हियँ धरि पाइ प्रसाद ।
कहउँ जुगल मुनिबर्य कर मिलन सुभग संबाद ॥४३ (ख)॥
अर्थात
मैं अब श्रीरघुनाथजी के चरण कमलों को हृदय में धारण कर और उनका प्रसाद पाकर दोनों श्रेष्ठ मुनियों के मिलन का सुन्दर संवाद वर्णन करता हूँ ॥४३ (ख)॥
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