सत्यं शिवं सुंदरम् — तुलसीदास और रामचरितमानस की दिव्यता की गाथा

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सत्यं शिवं सुंदरम् — तुलसीदास और रामचरितमानस की दिव्यता की गाथा  यह कथा है उस पवित्र ग्रंथ की, जिसे "मानस" कहा गया — अर्थात वह जो मन से निकला, और हृदय से रचा गया। यह कथा है उस अनन्य भक्त तुलसीदास की, जिन्होंने भगवान श्रीराम के जीवनचरित्र को आमजन की भाषा में प्रस्तुत किया, ताकि रामकथा केवल विद्वानों और ब्राह्मणों तक सीमित न रह जाए, बल्कि हर जन तक पहुँचे। और ये उस समय का एक क्रांतिकारी कदम था। गोस्वामी तुलसीदास जी ने जिस रामचरितमानस की रचना की, वह संस्कृत की जगह अवधी भाषा में लिखी गई थी — जो सामान्य जनता की बोली थी। तुलसीदास जी का उद्देश्य था कि श्रीराम की महिमा हर आम जन तक पहुँचे, ना कि केवल विद्वानों और ब्राह्मणों तक सीमित रहे। लेकिन यही बात कुछ विद्वानों और ब्राह्मणों को स्वीकार्य नहीं थी। उनका कहना था: “रामकथा जैसी पवित्र गाथा केवल देवभाषा संस्कृत में ही कही जा सकती है। अवधी जैसी लोकभाषा में इसका वर्णन करना वेदों और पुराणों का अपमान है।” इसलिए काशी के विद्वानों और ब्राह्मणों ने रामचरितमानस को स्वीकार करने से मना कर दिया। उनमें भय था कि यह लोकभाषा में लिखा गया ग्रंथ कहीं धार...

Sant Ki Mahima | Sant Ka Swaroop

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 संत का कोई स्वरूप नहीं होता, संत का कोई वेष नहीं होता, तिलक लगा लेने से, चुटिया बढ़ा लेने से, माला पहन लेने से या फिर भगवा एवं सफेद वस्त्र धारण कर लेने से कोई संत हो जाएगा, ये जरूरी नहीं है।

चार-पांच माह बाल मत कटवाइए, इसके बाद मुण्डन करवा लिजिए आपकी भी एकदम चकाचक चुटिया हो जाएगी।

बाजार से लाल-पीली चन्दन, माला और वस्त्र खरीद कर पहेन लिजिए, संत हो गये? नहीं।


संत का स्वरूप नहीं होता, संत का स्वभाव होता है, जिसके स्वाभाव में संतत्व नहीं आया, जिसके स्वाभाव में साधुता नहीं आयी वो संत नहीं हो सकता।

Sant Ki Mahima

संत कौन?

पर उपकार बचन मन काया। संत सहज सुभाउ खगराया ।।

ये काकभुशुण्डि जी ने गरूड़ जी को संत का स्वभाव बताया है उत्तरकांकाण्ड में।

गरूड़ जी ने काकभुशुण्डि जी से संत का स्वभाव पूछा तो काकभुशुण्डि जी संत का स्वभाव बताते हैं, पर उपकार, यानी परोपकार यानी जो न आपको जानता है, न आप उसे जानते हों, जिससे आपका जीवन में कोई सम्बंध नहीं है, जो जीवन में आपको एक बार मिला है।

ऐसे किसी व्यक्ति का आप हित कर रहे हैं, इसका नाम है परोपकार

जिससे आपका कोई रक्त का सम्बंध नहीं है, ऐसे किसी व्यक्ति का हित करना, ये परोपकार है।

Sant Ka Swaroop

संत का स्वभाव क्या है?

संत स्वाभाव का अर्थ होता है, न किसी से राग, न किसी से द्वेष जो समान दृष्टि रखता है वो संत होता है।

उसका न कोई मान होता है, न सम्मान होता और न ही अपमान होता, जो सुख और दुःख दोनों अवस्थाओं में समान रहे वो संत है।

गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा- सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ

जो जय में, पराजय में, सुख में, दुःख में, लाभ में हानि में सब में समान रहता है उसे संत कहते हैं।

संत के लक्षण में सबसे सुंदर बात जो सहन करने में सक्षम हो वो संत है।

काकभुशुण्डि जी कहते हैं, पर उपकार कैसे बचन मन काया, जो मन से, कर्म से और अपनी वाणी से परोपकार में लगा है, हे पक्षीराज गरुड़ जी, संत सहज सुभाउ खगराया, हे गरुड़ जी यही संत का स्वभाव है।


इस प्रकार का संत कोई भी हो सकता है एक छोटा बालक भी हो सकता है, एक वृद्ध भी हो सकता है।

नदी को, वृक्ष को, पर्वतों को इन सबको संत की श्रेणी में रखा गया है।


संत बिटप सरिता गिरि धरनी। पर हित हेतु सबन्ह कै करनी।।

संत, बिटप, सरिता, गिरि और धरनी, ये पांचों एक श्रेणी में आते हैं,

संत- संत दूसरे के लिए जीता है।

बिटप- वृक्ष अपने लिए फल नहीं लगता दूसरे के लिए लगाता है।

सरिता- नदी का जल उसके उपयोग में नहीं आता दूसरे के उपयोग में आता है।

गिरि- पर्वतों पर पाये जाने वाले रत्न पर्वत के काम में नहीं आते हैं हमारे आपके काम में आते हैं।

धरनी- धरती में जन्म लेने वाला अन्न धरती के काम में नहीं आता दूसरे के काम में आता है।

जिसका जीवन दूसरों के लिए समर्पित है वो संत कहलाता है।



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