सत्यं शिवं सुंदरम् — तुलसीदास और रामचरितमानस की दिव्यता की गाथा

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सत्यं शिवं सुंदरम् — तुलसीदास और रामचरितमानस की दिव्यता की गाथा  यह कथा है उस पवित्र ग्रंथ की, जिसे "मानस" कहा गया — अर्थात वह जो मन से निकला, और हृदय से रचा गया। यह कथा है उस अनन्य भक्त तुलसीदास की, जिन्होंने भगवान श्रीराम के जीवनचरित्र को आमजन की भाषा में प्रस्तुत किया, ताकि रामकथा केवल विद्वानों और ब्राह्मणों तक सीमित न रह जाए, बल्कि हर जन तक पहुँचे। और ये उस समय का एक क्रांतिकारी कदम था। गोस्वामी तुलसीदास जी ने जिस रामचरितमानस की रचना की, वह संस्कृत की जगह अवधी भाषा में लिखी गई थी — जो सामान्य जनता की बोली थी। तुलसीदास जी का उद्देश्य था कि श्रीराम की महिमा हर आम जन तक पहुँचे, ना कि केवल विद्वानों और ब्राह्मणों तक सीमित रहे। लेकिन यही बात कुछ विद्वानों और ब्राह्मणों को स्वीकार्य नहीं थी। उनका कहना था: “रामकथा जैसी पवित्र गाथा केवल देवभाषा संस्कृत में ही कही जा सकती है। अवधी जैसी लोकभाषा में इसका वर्णन करना वेदों और पुराणों का अपमान है।” इसलिए काशी के विद्वानों और ब्राह्मणों ने रामचरितमानस को स्वीकार करने से मना कर दिया। उनमें भय था कि यह लोकभाषा में लिखा गया ग्रंथ कहीं धार...

Mata Sati Ka Mata Parvati Ke Roop Me Punarjanm

 

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Table 1
रचयिता
ग्रंथ 
पात्र
प्रकाशक
टीकाकार
भाषा
शैली
काण्ड
 गोस्वामी तुलसीदास जी  श्रीरामचरितमानस  श्रीराम लक्ष्मण सीता हनुमान, रावण इत्यादि गीता प्रेस गोरखपुर   श्री हनुमानप्रसाद पोद्दार  संस्कृत, अवधी  सोरठा, चोपाई, दोहा और छंद  बालकाण्ड

Mata Sati Ka Mata Parvati Ke Roop Me Punarjanm

सतीं मरत हरि सन बरु मागा। जनम जनम सिव पद अनुरागा॥
तेहि कारन हिमगिरि गृह जाई। जनमीं पारबती तनु पाई॥

सती माता ने स्वयं को जलाकर भस्म करने से पहले श्री रामजी से वरदान मांगा प्रभु जन्मजन्मांतर मैं भगवान शंकर के ही चरणों की दासी बनूं, मेरी आपसे यही प्रार्थना है, रामजी ने वरदान दिया।

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इसी वरदान के कारण सती माता का अगला जन्म हिमांचल महाराज के यहां पार्वती माता के रूप में हुआ है।

माता पार्वती का जन्म हुआ, नारद जी हिमांचल जी के यहां पहुंचते हैं, हिमांचल जी यथावत नारद जी का पूजन, आदर सत्कार करते हैं पूरे भवन में चरणामृत को छिड़काया और उन्हें उत्तम आसान पर विराजमान किया।

फिर अपनी स्त्री सहित मुनि के चरणों में सिर नवाया, पार्वती जी को बुलाकर प्रणाम कराया और कहा नारद जी आप त्रिकालदर्शी हैं, सर्बत्र आपकी गति है अतः आप हृदय में विचार कर कन्या के दोष-गुण हमें बताइए।
नारद जी पार्वती जी का हाथ देखकर बोले, महाराज आपकी कन्या सब गुणों की खान है।
यह स्वभाव से ही सुंदर, सुशील और समझदार है, उमा, अम्बिका और भवानी इसके नाम हैं।
संसार में आपको आपकी बेटी के कारण ही यश की प्राप्ति होगी, ये पतिव्रता शिरोमणि होंगी।
संसार में स्त्रियाँ इसका नाम स्मरण करके पतिव्रता रूपी तलवार की धार पर चढ़ जाएँगी, इनका सौभाग्य सदैव अखंड बना रहेगा।

सैल सुलच्छन सुता तुम्हारी। सुनहु जे अब अवगुन दुइ चारी॥
अगुन अमान मातु पितु हीना। उदासीन सब संसय छीना॥

हे पर्वतराज! तुम्हारी कन्या सुलच्छनी है, इसमें कोई दोष नहीं है लेकिन जो इस कन्या का वर होगा उसमें कुछ दोष हैं उन्हें भी सुन लो, अगुन होगा नारद जी कहना चाहते हैं सत् रज् तम् तीनों गुणों से परे होगा, त्रिगुणातित होगा हिमांचल जी समझ गये उसमें कोई गुंण नहीं होगा अगुन होगा।
नारद जी कहते हैं अमान होगा, यानी मान सम्मान से परे होगा, हिमांचल जी समझ गये उसका कोई सम्मान नहीं करेगा, नारद जी आगे बताते हैं उसके माता-पिता नहीं हैं उदासीन रहता है।
दो०-
जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल बेष।
अस स्वामी एहि कहँ मिलिहि परी हस्त असि रेख॥67॥

जोगी होगा उसकी विशाल विकराल जटाएं होंगी, नग्न रहेगा कुछ नहीं पहनेगा, अमंगल स्वरूप बनाकर घूमेगा ऐसा पति आपकी बिटिया को प्राप्त होगा, आपकी बेटी की हाथ की रेखाएं बता रहीं हैं।

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जैसे-जैसे नारद जी ने वर के स्वरूप का बखान किया नारद मुनि की वाणी सुनकर और उसको हृदय में सत्य जानकर पति-पत्नी (हिमवान् और मैना) रोने लगे और पार्वती जी भी रोने लगीं।
गोस्वामी जी कहते हैं- दसा एक समुझब बिलगाना हिमवान् और मैनावती इसलिए रोने लगे, इतनी सुन्दर बिटिया के लिए ब्रह्मा जी ने ऐसा बावला वर बना दिया, और पार्वती जी इसलिए रोने लगीं की जो-जो नारदजी बता रहे हैं वो सब मेरे भोलेनाथ में विद्यमान हैं।
लगता है रामजी से जो वरदान मांगा था वही प्राप्त होने वाला है माॅं पार्वती प्रसन्न होकर रोने लगीं और हिमांचल और मैना जी निराश होकर रोने लगे।
हिमांचल जी नारदजी से बोले कोई उपाय है? नारदजी बोले किस बात का हिमांचल जी ने कहा वर बदलने का नारदजी बोले वर तो नहीं बदला जा सकता लेकिन जिसको आप दुर्गुण समझ रहे हैं वो सारे लक्षण शिवजी में विद्यमान हैं।

यदि आपकी पुत्री का विवाह शिवजी से हो जाए तो आपकी पुत्री का कल्याण हो जाएगा, हिमांचल जी बोले कैसे होगा?
जौं तपु करै कुमारि तुम्हारी। भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी॥
नारदजी ने कहा आपकी पुत्री यदि तपस्या करेगी तो शिवजी अवश्य प्राप्त होंगे, माॅं पार्वती सुनीं माता-पिता को प्रणाम करके देवी पार्वती ने वन में जाकर हजारों वर्षों तक कठोर तपस्या की।
कछु दिन भोजनु बारि बतासा। किए कठिन कछु दिन उपबासा॥
बेल पाती महि परइ सुखाई। तीनि सहस संबत सोइ खाई॥

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कुछ दिन जल और वायु का भोजन किया और फिर कुछ दिन कठोर उपवास किए, जो बेल पत्र सूखकर पृथ्वी पर गिरते थे, तीन हजार वर्ष तक उन्हीं को खाया कठोर से कठोर तपस्या की और माता पार्वती की इस कठोर तपस्या का परिणाम एक दिन आकाशवाणी ने कहा-
अस तपु काहुँ न कीन्ह भवानी। भए अनेक धीर मुनि ग्यानी॥

आकाशवाणी ने कहा हे भवानी आपने जैसी कठोर तपस्या की आज तक अनेक धीर, मुनि, ज्ञानी हुए, पर ऐसी कठोर तपस्या किसी ने नहीं की जाइए हम आपको आशिर्वाद देते हैं कि आपकी मनोकामना पूर्ण हुई।

जब आपके पिताजी आपको बुलाने आएं तो उनके साथ घर जाइएगा, सप्तर्षि आपको मिलें तो आप हमारे वचनों को सत्य समझिएगा।

इधर जब से माता सती ने जाकर शरीर त्याग किया, तब से शिवजी के मन में वैराग्य हो गया, बाबा कैलाश से निकल पड़े थे, जहां तहां घूमते रहते थे एक दिन भोलेनाथ को रामजी ने दर्शन दिया और बोले बाबा यदि आप सत्य में मुझे प्रेम करते हैं तो मैं आपसे कुछ माॅंगूॅंगा तो आप मुझे देंगे?
शंकर जी ने प्रभु आप जो आज्ञा कीजिए, तो रामजी ने कहा-
दो०-
अब बिनती मम सुनहु सिव जौं मो पर निज नेहु।
जाइ बिबाहहु सैलजहि यह मोहि मागें देहु॥76॥
यदि मुझ पर आपका स्नेह है, तो अब आप मेरी विनती सुनिए, और जाकर पार्वती जी के साथ विवाह कर लिजिए।

पहले तो शिवजी ने कहा- यद्यपि ऐसा उचित नहीं है, परन्तु स्वामी की बात भी मेटी नहीं जा सकती आप कुछ कह रहे हैं तो जरूर इसका कोई विशेष कारण होगा।

मातु पिता गुर प्रभु कै बानी। बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी॥
तुम्ह सब भाँति परम हितकारी। अग्या सिर पर नाथ तुम्हारी॥
माता, पिता, गुरु और स्वामी की बात को बिना ही विचारे शुभ समझकर करना (मानना) चाहिए।
फिर आप तो सब प्रकार से मेरे परम हितकारी हैं। हे नाथ! आपकी आज्ञा मेरे सिर पर है आप जैसे कहेंगे मैं वैसा ही करूॅंगा।

इसके बाद शिवजी ने सप्तर्षियों को भेजा पार्वती जी के प्रेम का परीक्षण करने के लिए, सप्तर्षियों ने माता पार्वती के प्रेम का परीक्षण किया विकल्प दिखाकर, बोले आप शंकर जी की तपस्या कर रहीं हैं उनकी पहली पत्नी सती जी थी उन्होंने अपने आप को जलाकर भस्म कर लिया स्वयं भिक्षा मांगकर खाते हैं।
दो०-
अब सुख सोवत सोचु नहिं भीख मागि भव खाहिं।
सहज एकाकिन्ह के भवन कबहुँ कि नारि खटाहिं॥79॥

अब शिव को कोई चिन्ता नहीं रही, भीख माँगकर खा लेते हैं और सुख से सोते हैं।
रहने के लिए घर भी नहीं है ऐसे स्वभाव से ही अकेले रहने वालों के घर भी भला क्या कभी स्त्रियाँ टिक सकती हैं?
पहाड़ के ऊपर बर्फ़ में रहते हैं कैसे रहिएगा उनके साथ, हम आपके लिए बहुत सुंदर वर लाए हैं।

दूषन रहित सकल गुन रासी। श्रीपति पुर बैकुंठ निवासी॥
उनके भीतर कोई विकार नहीं है बहुत सुन्दर हैं और विवाह के लिए तैयार भी हैं, लक्ष्मीजी के पति जो वैकुण्ठपुरी में रहते हैं, समस्त सुखों और सद्गुणों के भण्डार हैं श्री हरि विष्णुजी।
वो तैयार हैं अब अगर आप कहें तो हम उनसे विवाह की चर्चा करें, तब देवी पार्वती ने कहा मुनियों आपने कहा-
दो०-
महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम।
जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम॥80॥

आपके अनुसार भगवान शंकर अवगुण के घर हैं और विष्णु जी सद्गुण के घर हैं, लेकिन मुझे इससे क्या मतलब, मुनियों जिसका मन जिसमें लग जाए उसकी दृष्टि में उससे सुन्दर दूसरा और कोई नहीं होता है और मेरी दृष्टि में तो भोलेनाथ पहले से बसे हुए हैं।
आप तो क्या यदि शंकर जी भी सौ बार मुझसे कहेंगे तो भी मैं उनका त्याग करने वाली नहीं हूॅं, माता पार्वती की निष्ठा को जानकर सप्तर्षियों ने उनका जय जयकार किया और जाकर भगवान शंकर को उनकी निष्ठा के बारे में बताया, पार्वती जी के प्रेम को सुनते ही शिवजी आनन्दमग्न होकर दोबारा समाधि में लीन हो गए।

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Mata Sati Ka Mata Parvati Ke Roop Me Punarjanm | माता सती का पुनर्जन्म

सतीं मरत हरि सन बरु मागा । जनम जनम सिव पद अनुरागा ॥
तेहि कारन हिमगिरि गृह जाई । जनमीं पारबती तनु पाई ॥
अर्थात
सती ने मरते समय भगवान हरि से यह वर माँगा कि मेरा जन्म-जन्म में शिवजी के चरणों में अनुराग रहे। इसी कारण उन्होंने हिमाचल के घर जाकर पार्वती के शरीर से जन्म लिया ॥३॥


पार्वती का जन्म और तपस्या

जब तें उमा सैल गृह जाईं । सकल सिद्धि संपति तहँ छाईं ॥
जहँ तहँ मुनिन्ह सुआश्रम कीन्हे । उचित बास हिम भूधर दीन्हे ॥
अर्थात
जब से उमाजी हिमाचल के घर जन्मीं, तबसे वहाँ सारी सिद्धियाँ और सम्पत्तियाँ छा गईं। मुनियों ने जहाँ-तहाँ सुंदर आश्रम बना लिए और हिमाचल ने उनको उचित स्थान दिए ॥४॥

दो०-
सदा सुमन फल सहित सब द्रुम नव नाना जाति ।
प्रगटीं सुंदर सैल पर मनि आकर बहु भाँति ॥६५॥ 
अर्थात
उस सुंदर पर्वत पर बहुत प्रकार के सब नए-नए वृक्ष सदा पुष्प-फलयुक्त हो गए और वहाँ बहुत तरह की मणियों की खानें प्रकट हो गईं ॥६५॥

सरिता सब पुनीत जलु बहहीं । खग मृग मधुप सुखी सब रहहीं ॥
सहज बयरु सब जीवन्ह त्यागा । गिरि पर सकल करहिं अनुरागा ॥
अर्थात
सारी नदियों में पवित्र जल बहता है और पक्षी, पशु, भ्रमर सभी सुखी रहते हैं। सब जीवों ने अपना स्वाभाविक बैर छोड़ दिया और पर्वत पर सभी परस्पर प्रेम करते हैं ॥१॥

सोह सैल गिरिजा गृह आएँ । जिमि जनु रामभगति के पाएँ ॥
नित नूतन मंगल गृह तासू । ब्रह्मादिक गावहिं जसु जासू ॥
अर्थात
पार्वतीजी के घर आ जाने से पर्वत ऐसा शोभायमान हो रहा है जैसा रामभक्ति को पाकर भक्त शोभायमान होता है। उस (पर्वतराज) के घर नित्य नए-नए मंगलोत्सव होते हैं, जिसका ब्रह्मादि यश गाते हैं ॥२॥

नारद समाचार सब पाए । कोतुकहीं गिरि गेह सिधाए ॥
सैलराज बड़ आदर कीन्हा । पद पखारि बर आसनु दीन्हा ॥
अर्थात
जब नारदजी ने ये सब समाचार सुने तो वे कौतुक ही से हिमाचल के घर पधारे। पर्वतराज ने उनका बड़ा आदर किया और चरण धोकर उनको उत्तम आसन दिया ॥३॥

नारि सहित मुनि पद सिरु नावा । चरन सलिल सबु भवनु सिंचावा ॥
निज सौभाग्य बहुत गिरि बरना । सुता बोलि मेली मुनि चरना ॥
अर्थात
फिर अपनी स्त्री सहित मुनि के चरणों में सिर नवाया और उनके चरणोदक को सारे घर में छिड़काया। हिमाचल ने अपने सौभाग्य का बहुत बखान किया और पुत्री को बुलाकर मुनि के चरणों पर डाल दिया ॥४॥

दो०-
त्रिकालग्य सर्बग्य तुम्ह गति सर्बत्र तुम्हारि ।
कहहु सुता के दोष गुन मुनिबर हृदयँ बिचारि ॥६६॥
अर्थात
(और कहा-) हे मुनिवर! आप त्रिकालज्ञ और सर्वज्ञ हैं, आपकी सर्वत्र पहुँच है। अतः आप हृदय में विचार कर कन्या के दोष-गुण कहिए ॥६६॥

कह मुनि बिहसि गूढ़ मृदु बानी । सुता तुम्हारि सकल गुन खानी ॥
सुंदर सहज सुसील सयानी । नाम उमा अंबिका भवानी ॥
अर्थात
नारद मुनि ने हँसकर रहस्ययुक्त कोमल वाणी से कहा- तुम्हारी कन्या सब गुणों की खान है। यह स्वभाव से ही सुंदर, सुशील और समझदार है। उमा, अम्बिका और भवानी इसके नाम हैं ॥१॥

सब लच्छन संपन्न कुमारी । होइहि संतत पियहि पिआरी ॥
सदा अचल एहि कर अहिवाता । एहि तें जसु पैहहिं पितु माता ॥
अर्थात
कन्या सब सुलक्षणों से सम्पन्न है, यह अपने पति को सदा प्यारी होगी। इसका सुहाग सदा अचल रहेगा और इससे इसके माता-पिता यश पावेंगे ॥२॥

होइहि पूज्य सकल जग माहीं । एहि सेवत कछु दुर्लभ नाहीं ॥
एहि कर नामु सुमिरि संसारा । त्रिय चढ़िहहिं पतिब्रत असिधारा ॥
अर्थात
यह सारे जगत में पूज्य होगी और इसकी सेवा करने से कुछ भी दुर्लभ न होगा। संसार में स्त्रियाँ इसका नाम स्मरण करके पतिव्रता रूपी तलवार की धार पर चढ़ जाएँगी ॥३॥

सैल सुलच्छन सुता तुम्हारी । सुनहु जे अब अवगुन दुइ चारी ॥
अगुन अमान मातु पितु हीना । उदासीन सब संसय छीना ॥
अर्थात
हे पर्वतराज! तुम्हारी कन्या सुलच्छनी है। अब इसमें जो दो-चार अवगुण हैं, उन्हें भी सुन लो। गुणहीन, मानहीन, माता-पिताविहीन, उदासीन, संशयहीन (लापरवाह) ॥४॥

दो०-
जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल बेष ।
अस स्वामी एहि कहँ मिलिहि परी हस्त असि रेख ॥६७॥
अर्थात
योगी, जटाधारी, निष्काम हृदय, नंगा और अमंगल वेष वाला, ऐसा पति इसको मिलेगा। इसके हाथ में ऐसी ही रेखा पड़ी है ॥६७॥

सुनि मुनि गिरा सत्य जियँ जानी । दुख दंपतिहि उमा हरषानी ॥
नारदहूँ यह भेदु न जाना । दसा एक समुझब बिलगाना ॥
अर्थात
नारद मुनि की वाणी सुनकर और उसको हृदय में सत्य जानकर पति-पत्नी (हिमवान्‌ और मैना) को दुःख हुआ और पार्वतीजी प्रसन्न हुईं। नारदजी ने भी इस रहस्य को नहीं जाना, क्योंकि सबकी बाहरी दशा एक सी होने पर भी भीतरी समझ भिन्न-भिन्न थी ॥
सकल सखीं गिरिजा गिरि मैना । पुलक सरीर भरे जल नैना ॥
होइ न मृषा देवरिषि भाषा । उमा सो बचनु हृदयँ धरि राखा ॥
अर्थात
सारी सखियाँ, पार्वती, पर्वतराज हिमवान्‌ और मैना सभी के शरीर पुलकित थे और सभी के नेत्रों में जल भरा था। देवर्षि के वचन असत्य नहीं हो सकते, (यह विचारकर) पार्वती ने उन वचनों को हृदय में धारण कर लिया ॥२॥
उपजेउ सिव पद कमल सनेहू । मिलन कठिन मन भा संदेहू ॥
जानि कुअवसरु प्रीति दुराई । सखी उछँग बैठी पुनि जाई ॥
अर्थात
उन्हें शिवजी के चरण कमलों में स्नेह उत्पन्न हो आया, परन्तु मन में यह संदेह हुआ कि उनका मिलना कठिन है। अवसर ठीक न जानकर उमा ने अपने प्रेम को छिपा लिया और फिर वे सखी की गोद में जाकर बैठ गईं ॥
झूठि न होइ देवरिषि बानी । सोचहिं दंपति सखीं सयानी ॥
उर धरि धीर कहइ गिरिराऊ । कहहु नाथ का करिअ उपाऊ ॥
अर्थात
देवर्षि की वाणी झूठी न होगी, यह विचार कर हिमवान्‌, मैना और सारी चतुर सखियाँ चिन्ता करने लगीं। फिर हृदय में धीरज धरकर पर्वतराज ने कहा- हे नाथ! कहिए, अब क्या उपाय किया जाए? ॥४॥
दो०-
कह मुनीस हिमवंत सुनु जो बिधि लिखा लिलार ।
देव दनुज नर नाग मुनि कोउ न मेटनिहार ॥६८॥
अर्थात
मुनीश्वर ने कहा- हे हिमवान्‌! सुनो, विधाता ने ललाट पर जो कुछ लिख दिया है, उसको देवता, दानव, मनुष्य, नाग और मुनि कोई भी नहीं मिटा सकते ॥६८॥
तदपि एक मैं कहउँ उपाई । होइ करै जौं दैउ सहाई ॥
जस बरु मैं बरनेउँ तुम्ह पाहीं । मिलिहि उमहि तस संसय नाहीं ॥
अर्थात
तो भी एक उपाय मैं बताता हूँ। यदि दैव सहायता करें तो वह सिद्ध हो सकता है। उमा को वर तो निःसंदेह वैसा ही मिलेगा, जैसा मैंने तुम्हारे सामने वर्णन किया है ॥
जे जे बर के दोष बखाने । ते सब सिव पहिं मैं अनुमाने ॥
जौं बिबाहु संकर सन होई । दोषउ गुन सम कह सबु कोई ॥
अर्थात
परन्तु मैंने वर के जो-जो दोष बतलाए हैं, मेरे अनुमान से वे सभी शिवजी में हैं। यदि शिवजी के साथ विवाह हो जाए तो दोषों को भी सब लोग गुणों के समान ही कहेंगे ॥२॥
जौं अहि सेज सयन हरि करहीं । बुध कछु तिन्ह कर दोषु न धरहीं ॥
भानु कृसानु सर्ब रस खाहीं । तिन्ह कहँ मंद कहत कोउ नाहीं ॥
अर्थात
जैसे विष्णु भगवान शेषनाग की शय्या पर सोते हैं, तो भी पण्डित लोग उनको कोई दोष नहीं लगाते। सूर्य और अग्निदेव अच्छे-बुरे सभी रसों का भक्षण करते हैं, परन्तु उनको कोई बुरा नहीं कहता ॥
सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई । सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई ॥
समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं । रबि पावक सुरसरि की नाईं ॥
अर्थात
गंगाजी में शुभ और अशुभ सभी जल बहता है, पर कोई उन्हें अपवित्र नहीं कहता। सूर्य, अग्नि और गंगाजी की भाँति समर्थ को कुछ दोष नहीं लगता ॥४॥
दो०-
जौं अस हिसिषा करहिं नर जड़ बिबेक अभिमान ।
परहिं कलप भरि नरक महुँ जीव कि ईस समान ॥६९॥
अर्थात
यदि मूर्ख मनुष्य ज्ञान के अभिमान से इस प्रकार होड़ करते हैं, तो वे कल्पभर के लिए नरक में पड़ते हैं। भला कहीं जीव भी ईश्वर के समान (सर्वथा स्वतंत्र) हो सकता है? ॥६९॥
सुरसरि जल कृत बारुनि जाना । कबहुँ न संत करहिं तेहि पाना ॥
सुरसरि मिलें सो पावन जैसें । ईस अनीसहि अंतरु तैसें ॥
अर्थात
गंगा जल से भी बनाई हुई मदिरा को जानकर संत लोग कभी उसका पान नहीं करते। पर वही गंगाजी में मिल जाने पर जैसे पवित्र हो जाती है, ईश्वर और जीव में भी वैसा ही भेद है ॥
संभु सहज समरथ भगवाना । एहि बिबाहँ सब बिधि कल्याना ॥
दुराराध्य पै अहहिं महेसू । आसुतोष पुनि किएँ कलेसू ॥
अर्थात
शिवजी सहज ही समर्थ हैं, क्योंकि वे भगवान हैं, इसलिए इस विवाह में सब प्रकार कल्याण है, परन्तु महादेवजी की आराधना बड़ी कठिन है, फिर भी क्लेश (तप) करने से वे बहुत जल्द संतुष्ट हो जाते हैं ॥२॥
जौं तपु करै कुमारि तुम्हारी । भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी ॥
जद्यपि बर अनेक जग माहीं । एहि कहँ सिव तजि दूसर नाहीं ॥
अर्थात
यदि तुम्हारी कन्या तप करे, तो त्रिपुरारि महादेवजी होनहार को मिटा सकते हैं। यद्यपि संसार में वर अनेक हैं, पर इसके लिए शिवजी को छोड़कर दूसरा वर नहीं है ॥
बर दायक प्रनतारति भंजन । कृपासिंधु सेवक मन रंजन ॥
इच्छित फल बिनु सिव अवराधें । लहिअ न कोटि जोग जप साधें ॥
अर्थात
शिवजी वर देने वाले, शरणागतों के दुःखों का नाश करने वाले, कृपा के समुद्र और सेवकों के मन को प्रसन्न करने वाले हैं। शिवजी की आराधना किए बिना करोड़ों योग और जप करने पर भी वांछित फल नहीं मिलता ॥४॥
दो०-
अस कहि नारद सुमिरि हरि गिरिजहि दीन्हि असीस ।
होइहि यह कल्यान अब संसय तजहु गिरीस ॥७०॥
अर्थात
ऐसा कहकर भगवान का स्मरण करके नारदजी ने पार्वती को आशीर्वाद दिया। (और कहा कि-) हे पर्वतराज! तुम संदेह का त्याग कर दो, अब यह कल्याण ही होगा ॥७०॥
कहि अस ब्रह्मभवन मुनि गयऊ । आगिल चरित सुनहु जस भयऊ ॥
पतिहि एकांत पाइ कह मैना । नाथ न मैं समुझे मुनि बैना ॥
अर्थात
यों कहकर नारद मुनि ब्रह्मलोक को चले गए। अब आगे जो चरित्र हुआ उसे सुनो। पति को एकान्त में पाकर मैना ने कहा- हे नाथ! मैंने मुनि के वचनों का अर्थ नहीं समझा ॥
जौं घरु बरु कुलु होइ अनूपा । करिअ बिबाहु सुता अनुरूपा ॥
न त कन्या बरु रहउ कुआरी । कंत उमा मम प्रानपिआरी ॥
अर्थात
जो हमारी कन्या के अनुकूल घर, वर और कुल उत्तम हो तो विवाह कीजिए। नहीं तो लड़की चाहे कुमारी ही रहे (मैं अयोग्य वर के साथ उसका विवाह नहीं करना चाहती), क्योंकि हे स्वामिन्‌! पार्वती मुझको प्राणों के समान प्यारी है ॥२॥
जौं न मिलिहि बरु गिरिजहि जोगू । गिरि जड़ सहज कहिहि सबु लोगू ॥
सोइ बिचारि पति करेहु बिबाहू । जेहिं न बहोरि होइ उर दाहू ॥
अर्थात
यदि पार्वती के योग्य वर न मिला तो सब लोग कहेंगे कि पर्वत स्वभाव से ही जड़ (मूर्ख) होते हैं। हे स्वामी! इस बात को विचारकर ही विवाह कीजिएगा, जिसमें फिर पीछे हृदय में सन्ताप न हो ॥
अस कहि परी चरन धरि सीसा । बोले सहित सनेह गिरीसा ॥
बरु पावक प्रगटै ससि माहीं । नारद बचनु अन्यथा नाहीं ॥
अर्थात
इस प्रकार कहकर मैना पति के चरणों पर मस्तक रखकर गिर पड़ीं। तब हिमवान्‌ ने प्रेम से कहा- चाहे चन्द्रमा में अग्नि प्रकट हो जाए, पर नारदजी के वचन झूठे नहीं हो सकते ॥४॥
दो०-
प्रिया सोचु परिहरहु सबु सुमिरहु श्रीभगवान ।
पारबतिहि निरमयउ जेहिं सोइ करिहि कल्यान ॥७१॥
अर्थात
हे प्रिये! सब सोच छोड़कर श्री भगवान का स्मरण करो, जिन्होंने पार्वती को रचा है, वे ही कल्याण करेंगे ॥७१॥

अब जौं तुम्हहि सुता पर नेहू । तौ अस जाइ सिखावनु देहू ॥
करै सो तपु जेहिं मिलहिं महेसू । आन उपायँ न मिटिहि कलेसू ॥
अर्थात
अब यदि तुम्हें कन्या पर प्रेम है, तो जाकर उसे यह शिक्षा दो कि वह ऐसा तप करे, जिससे शिवजी मिल जाएँ। दूसरे उपाय से यह क्लेश नहीं मिटेगा ॥
नारद बचन सगर्भ सहेतू । सुंदर सब गुन निधि बृषकेतू ॥
अस बिचारि तुम्ह तजहु असंका । सबहि भाँति संकरु अकलंका ॥
अर्थात
नारदजी के वचन रहस्य से युक्त और सकारण हैं और शिवजी समस्त सुंदर गुणों के भण्डार हैं। यह विचारकर तुम (मिथ्या) संदेह को छोड़ दो। शिवजी सभी तरह से निष्कलंक हैं ॥२॥
सुनि पति बचन हरषि मन माहीं । गई तुरत उठि गिरिजा पाहीं ॥
उमहि बिलोकि नयन भरे बारी । सहित सनेह गोद बैठारी ॥
अर्थात
पति के वचन सुन मन में प्रसन्न होकर मैना उठकर तुरंत पार्वती के पास गईं। पार्वती को देखकर उनकी आँखों में आँसू भर आए। उसे स्नेह के साथ गोद में बैठा लिया ॥
बारहिं बार लेति उर लाई । गदगद कंठ न कछु कहि जाई ॥
जगत मातु सर्बग्य भवानी । मातु सुखद बोलीं मृदु बानी ॥
अर्थात
फिर बार-बार उसे हृदय से लगाने लगीं। प्रेम से मैना का गला भर आया, कुछ कहा नहीं जाता। जगज्जननी भवानीजी तो सर्वज्ञ ठहरीं। (माता के मन की दशा को जानकर) वे माता को सुख देने वाली कोमल वाणी से बोलीं- ॥४॥
दो०-
सुनहि मातु मैं दीख अस सपन सुनावउँ तोहि ।
सुंदर गौर सुबिप्रबर अस उपदेसेउ मोहि ॥७२॥
अर्थात
माँ ! सुन, मैं तुझे सुनाती हूँ, मैंने ऐसा स्वप्न देखा है कि मुझे एक सुंदर गौरवर्ण श्रेष्ठ ब्राह्मण ने ऐसा उपदेश दिया है- ॥७२॥
करहि जाइ तपु सैलकुमारी । नारद कहा सो सत्य बिचारी ॥
मातु पितहि पुनि यह मत भावा । तपु सुखप्रद दुख दोष नसावा ॥
अर्थात
हे पार्वती ! नारदजी ने जो कहा है, उसे सत्य समझकर तू जाकर तप कर। फिर यह बात तेरे माता-पिता को भी अच्छी लगी है। तप सुख देने वाला और दुःख-दोष का नाश करने वाला है ॥
तपबल रचइ प्रपंचु बिधाता । तपबल बिष्नु सकल जग त्राता ॥
तपबल संभु करहिं संघारा । तपबल सेषु धरइ महिभारा ॥
अर्थात
तप के बल से ही ब्रह्मा संसार को रचते हैं और तप के बल से ही बिष्णु सारे जगत का पालन करते हैं। तप के बल से ही शम्भु (रुद्र रूप से) जगत का संहार करते हैं और तप के बल से ही शेषजी पृथ्वी का भार धारण करते हैं ॥२॥
तप अधार सब सृष्टि भवानी । करहि जाइ तपु अस जियँ जानी ॥
सुनत बचन बिसमित महतारी । सपन सुनायउ गिरिहि हँकारी ॥
अर्थात
हे भवानी ! सारी सृष्टि तप के ही आधार पर है। ऐसा जी में जानकर तू जाकर तप कर। यह बात सुनकर माता को बड़ा अचरज हुआ और उसने हिमवान्‌ को बुलाकर वह स्वप्न सुनाया ॥
मातु पितहि बहुबिधि समुझाई । चलीं उमा तप हित हरषाई ॥
प्रिय परिवार पिता अरु माता । भए बिकल मुख आव न बाता ॥
अर्थात
माता-पिता को बहुत तरह से समझाकर बड़े हर्ष के साथ पार्वतीजी तप करने के लिए चलीं। प्यारे कुटुम्बी, पिता और माता सब व्याकुल हो गए। किसी के मुँह से बात नहीं निकलती ॥४॥
दो०-
बेदसिरा मुनि आइ तब सबहि कहा समुझाइ ।
पारबती महिमा सुनत रहे प्रबोधहि पाइ ॥७३
अर्थात
तब वेदशिरा मुनि ने आकर सबको समझाकर कहा। पार्वतीजी की महिमा सुनकर सबको समाधान हो गया ॥७३॥
उर धरि उमा प्रानपति चरना । जाइ बिपिन लागीं तपु करना ॥
अति सुकुमार न तनु तप जोगू । पति पद सुमिरि तजेउ सबु भोगू ॥
अर्थात
प्राणपति (शिवजी) के चरणों को हृदय में धारण करके पार्वतीजी वन में जाकर तप करने लगीं। पार्वतीजी का अत्यन्त सुकुमार शरीर तप के योग्य नहीं था, तो भी पति के चरणों का स्मरण करके उन्होंने सब भोगों को तज दिया ॥
नित नव चरन उपज अनुरागा । बिसरी देह तपहिं मनु लागा ॥
संबत सहस मूल फल खाए । सागु खाइ सत बरष गवाँए ॥
अर्थात
स्वामी के चरणों में नित्य नया अनुराग उत्पन्न होने लगा और तप में ऐसा मन लगा कि शरीर की सारी सुध बिसर गई। एक हजार वर्ष तक उन्होंने मूल और फल खाए, फिर सौ वर्ष साग खाकर बिताए ॥२॥

कछु दिन भोजनु बारि बतासा । किए कठिन कछु दिन उपबासा ॥
बेल पाती महि परइ सुखाई । तीनि सहस संबत सोइ खाई ॥
अर्थात
कुछ दिन जल और वायु का भोजन किया और फिर कुछ दिन कठोर उपवास किए, जो बेल पत्र सूखकर पृथ्वी पर गिरते थे, तीन हजार वर्ष तक उन्हीं को खाया ॥3॥
पुनि परिहरे सुखानेउ परना । उमहि नामु तब भयउ अपरना ॥
देखि उमहि तप खीन सरीरा । ब्रह्मगिरा भै गगन गभीरा ॥
अर्थात
फिर सूखे पर्ण (पत्ते) भी छोड़ दिए, तभी पार्वती का नाम 'अपर्णा' हुआ। तप से उमा का शरीर क्षीण देखकर आकाश से गंभीर ब्रह्मवाणी हुई- ॥४॥
दो०-
भयउ मनोरथ सुफल तव सुनु गिरिराजकुमारि ।
परिहरु दुसह कलेस सब अब मिलिहहिं त्रिपुरारि ॥७४॥
अर्थात
हे पर्वतराज की कुमारी! सुन, तेरा मनोरथ सफल हुआ। तू अब सारे असह्य क्लेशों को (कठिन तप को) त्याग दे। अब तुझे शिवजी मिलेंगे ॥७४॥
अस तपु काहुँ न कीन्ह भवानी । भए अनेक धीर मुनि ग्यानी ॥
अब उर धरहु ब्रह्म बर बानी । सत्य सदा संतत सुचि जानी ॥
अर्थात
हे भवानी ! धीर, मुनि और ज्ञानी बहुत हुए हैं, पर ऐसा (कठोर) तप किसी ने नहीं किया। अब तू इस श्रेष्ठ ब्रह्मा की वाणी को सदा सत्य और निरंतर पवित्र जानकर अपने हृदय में धारण कर ॥
आवै पिता बोलावन जबहीं । हठ परिहरि घर जाएहु तबहीं ॥
मिलहिं तुम्हहि जब सप्त रिषीसा । जानेहु तब प्रमान बागीसा ॥
अर्थात
जब तेरे पिता बुलाने को आवें, तब हठ छोड़कर घर चली जाना और जब तुम्हें सप्तर्षि मिलें तब इस वाणी को ठीक समझना ॥२॥
सुनत गिरा बिधि गगन बखानी । पुलक गात गिरिजा हरषानी ॥
उमा चरित सुंदर मैं गावा । सुनहु संभु कर चरित सुहावा ॥
अर्थात
(इस प्रकार) आकाश से कही हुई ब्रह्मा की वाणी को सुनते ही पार्वतीजी प्रसन्न हो गईं और (हर्ष के मारे) उनका शरीर पुलकित हो गया। (याज्ञवल्क्यजी भरद्वाजजी से बोले कि-) मैंने पार्वती का सुंदर चरित्र सुनाया, अब शिवजी का सुहावना चरित्र सुनो ॥
जब तें सतीं जाइ तनु त्यागा । तब तें सिव मन भयउ बिरागा ॥
जपहिं सदा रघुनायक नामा । जहँ तहँ सुनहिं राम गुन ग्रामा ॥
अर्थात
जब से सती ने जाकर शरीर त्याग किया, तब से शिवजी के मन में वैराग्य हो गया। वे सदा श्री रघुनाथजी का नाम जपने लगे और जहाँ-तहाँ श्री रामचन्द्रजी के गुणों की कथाएँ सुनने लगे ॥४॥
दो०-
चिदानंद सुखधाम सिव बिगत मोह मद काम ।
बिचरहिं महि धरि हृदयँ हरि सकल लोक अभिराम ॥७५॥
अर्थात
चिदानन्द, सुख के धाम, मोह, मद और काम से रहित शिवजी सम्पूर्ण लोकों को आनंद देने वाले भगवान श्री हरि (श्री रामचन्द्रजी) को हृदय में धारण कर (भगवान के ध्यान में मस्त हुए) पृथ्वी पर विचरने लगे ॥७५॥

कतहुँ मुनिन्ह उपदेसहिं ग्याना । कतहुँ राम गुन करहिं बखाना ॥
जदपि अकाम तदपि भगवाना । भगत बिरह दुख दुखित सुजाना ॥
अर्थात
वे कहीं मुनियों को ज्ञान का उपदेश करते और कहीं श्री रामचन्द्रजी के गुणों का वर्णन करते थे। यद्यपि सुजान शिवजी निष्काम हैं, तो भी वे भगवान अपने भक्त (सती) के वियोग के दुःख से दुःखी हैं ॥
एहि बिधि गयउ कालु बहु बीती । नित नै होइ राम पद प्रीती ॥
नेमु प्रेमु संकर कर देखा । अबिचल हृदयँ भगति कै रेखा ॥
अर्थात
इस प्रकार बहुत समय बीत गया। श्री रामचन्द्रजी के चरणों में नित नई प्रीति हो रही है। शिवजी के (कठोर) नियम, (अनन्य) प्रेम और उनके हृदय में भक्ति की अटल टेक को (जब श्री रामचन्द्रजी ने) देखा ॥२॥
प्रगटे रामु कृतग्य कृपाला । रूप सील निधि तेज बिसाला ॥
बहु प्रकार संकरहि सराहा । तुम्ह बिनु अस ब्रतु को निरबाहा ॥
अर्थात
तब कृतज्ञ (उपकार मानने वाले), कृपालु, रूप और शील के भण्डार, महान्‌ तेजपुंज भगवान श्री रामचन्द्रजी प्रकट हुए। उन्होंने बहुत तरह से शिवजी की सराहना की और कहा कि आपके बिना ऐसा (कठिन) व्रत कौन निबाह सकता है ॥
बहुबिधि राम सिवहि समुझावा । पारबती कर जन्मु सुनावा ॥
अति पुनीत गिरिजा कै करनी । बिस्तर सहित कृपानिधि बरनी ॥
अर्थात
श्री रामचन्द्रजी ने बहुत प्रकार से शिवजी को समझाया और पार्वतीजी का जन्म सुनाया। कृपानिधान श्री रामचन्द्रजी ने विस्तारपूर्वक पार्वतीजी की अत्यन्त पवित्र करनी का वर्णन किया ॥४॥

श्रीरामजी का शिवजी से विवाह के लिए अनुरोध

दो०-

अब बिनती मम सुनहु सिव जौं मो पर निज नेहु ।

जाइ बिबाहहु सैलजहि यह मोहि मागें देहु ॥७६

अर्थात

(फिर उन्होंने शिवजी से कहा-) हे शिवजी! यदि मुझ पर आपका स्नेह है, तो अब आप मेरी विनती सुनिए। मुझे यह माँगें दीजिए कि आप जाकर पार्वती के साथ विवाह कर लें ॥७६॥


कह सिव जदपि उचित अस नाहीं । नाथ बचन पुनि मेटि न जाहीं ॥

सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा । परम धरमु यह नाथ हमारा ॥

अर्थात

शिवजी ने कहा- यद्यपि ऐसा उचित नहीं है, परन्तु स्वामी की बात भी मेटी नहीं जा सकती। हे नाथ! मेरा यही परम धर्म है कि मैं आपकी आज्ञा को सिर पर रखकर उसका पालन करूँ ॥

मातु पिता गुर प्रभु कै बानी । बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी ॥

तुम्ह सब भाँति परम हितकारी । अग्या सिर पर नाथ तुम्हारी ॥

अर्थात

माता, पिता, गुरु और स्वामी की बात को बिना ही विचारे शुभ समझकर करना (मानना) चाहिए। फिर आप तो सब प्रकार से मेरे परम हितकारी हैं। हे नाथ! आपकी आज्ञा मेरे सिर पर है ॥२॥

प्रभु तोषेउ सुनि संकर बचना । भक्ति बिबेक धर्म जुत रचना ॥

कह प्रभु हर तुम्हार पन रहेऊ । अब उर राखेहु जो हम कहेऊ ॥

अर्थात

शिवजी की भक्ति, ज्ञान और धर्म से युक्त वचन रचना सुनकर प्रभु रामचन्द्रजी संतुष्ट हो गए। प्रभु ने कहा- हे हर! आपकी प्रतिज्ञा पूरी हो गई। अब हमने जो कहा है, उसे हृदय में रखना ॥

अंतरधान भए अस भाषी । संकर सोइ मूरति उर राखी ॥

तबहिं सप्तरिषि सिव पहिं आए । बोले प्रभु अति बचन सुहाए ॥

अर्थात

इस प्रकार कहकर श्री रामचन्द्रजी अन्तर्धान हो गए। शिवजी ने उनकी वह मूर्ति अपने हृदय में रख ली। उसी समय सप्तर्षि शिवजी के पास आए। प्रभु महादेवजी ने उनसे अत्यन्त सुहावने वचन कहे- ॥४॥


दो०-

पारबती पहिं जाइ तुम्ह प्रेम परिच्छा लेहु ।

गिरिहि प्रेरि पठएहु भवन दूरि करेहु संदेहु ॥७७

अर्थात

आप लोग पार्वती के पास जाकर उनके प्रेम की परीक्षा लीजिए और हिमाचल को कहकर (उन्हें पार्वती को लिवा लाने के लिए भेजिए तथा) पार्वती को घर भिजवाइए और उनके संदेह को दूर कीजिए ॥७७॥


सप्तर्षियों की परीक्षा में पार्वती जी का महत्व

 

रिषिन्ह गौरि देखी तहँ कैसी । मूरतिमंत तपस्या जैसी ॥

बोले मुनि सुनु सैलकुमारी । करहु कवन कारन तपु भारी ॥

अर्थात

ऋषियों ने [वहाँ जाकर] पार्वती को कैसी देखा, मानो मूर्तिमान् तपस्या ही हो। मुनि बोले हे शैलकुमारी ! सुनो, तुम किसलिये इतना कठोर तप कर रही हो? ॥१॥


केहि अवराधहु का तुम्ह चहहू । हम सन सत्य मरमु किन कहहू ॥

कहत बचन मनु अति सकुचाई । हँसिहहु सुनि हमारि जड़ताई ॥

अर्थात

तुम किसकी आराधना करती हो और क्या चाहती हो? हमसे अपना सच्चा भेद क्यों नहीं कहतीं? [पार्वती ने कहा-] बात कहते मन बहुत सकुचाता है। आप लोग मेरी मूर्खता सुनकर हँसेंगे ॥२॥


मनु हठ परा न सुनइ सिखावा । चहत बारि पर भीति उठावा ॥

नारद कहा सत्य सोइ जाना । बिनु पंखन्ह हम चहहिं उड़ाना ॥

अर्थात

मन ने हठ पकड़ लिया है, वह उपदेश नहीं सुनता और जलपर दीवाल उठाना चाहता है। नारदजी ने जो कह दिया उसे सत्य जानकर मैं बिना ही पाँख के उड़ना चाहती हूँ ॥३॥


देखहु मुनि अबिबेकु हमारा । चाहिअ सदा सिवहि भरतारा ॥

अर्थात

हे मुनियो ! आप मेरा अज्ञान तो देखिये कि मैं सदा शिवजी को ही पति बनाना चाहती हूँ ॥४॥


दो०-

सुनत बचन बिहसे रिषय गिरिसंभव तव देह ।

नारद कर उपदेसु सुनि कहहु बसेउ किसु गेह ॥७८॥

अर्थात

पार्वतीजी की बात सुनते ही ऋषि लोग हँस पड़े और बोले-तुम्हारा शरीर पर्वत से ही तो उत्पन्न हुआ है ! भला, कहो तो नारद का उपदेश सुनकर आज तक किसका घर बसा है ? ॥७८॥


दच्छसुतन्ह उपदेसेन्हि जाई । तिन्ह फिरि भवनु न देखा आई ॥

चित्रकेतु कर घरु उन घाला । कनककसिपु कर पुनि अस हाला ॥

अर्थात

उन्होंने जाकर दक्ष के पुत्रों को उपदेश दिया था, जिससे उन्होंने फिर लौटकर घर का मुंह भी नहीं देखा। चित्रकेतु के घर को नारद ने ही चौपट किया। फिर यही हाल हिरण्यकशिपु का हुआ ॥१॥


नारद सिख जे सुनहिं नर नारी । अवसि होहिं तजि भवनु भिखारी ॥

मन कपटी तन सजन चीन्हा । आपु सरिस सबही चह कीन्हा ॥

अर्थात

जो स्त्री-पुरुष नारद की सीख सुनते हैं, वे घर-बार छोड़कर अवश्य ही भिखारी हो जाते हैं। उनका मन तो कपटी है, शरीर पर सज्जनों के चिह्न हैं। वे सभी को अपने समान बनाना चाहते हैं ॥२॥


तेहि के बचन मानि बिस्वासा। तुम्ह चाहहु पति सहज उदासा ॥

निर्गुन निलज कुबेष कपाली। अकुल अगेह दिगंबर ब्याली ॥

अर्थात

उनके वचनों पर विश्वास मानकर तुम ऐसा पति चाहती हो जो स्वभाव से ही उदासीन, गुणहीन, निर्लज, बुरे वेष वाला, नर-कपालों की माला पहनने वाला, कुलहीन, बिना घर-बार का, नंगा और शरीर पर साँपों को लपेटे रखने वाला है ॥३॥


कहहु कवन सुखु अस बरु पाएँ । भल भूलिहु ठग के बौराएँ ॥

पंच कहें सिवॅं सती बिबाही । पुनि अवडेरि मराएन्हि ताही ॥

अर्थात

ऐसे वर के मिलने से कहो, तुम्हें क्या सुख होगा? तुम उस ठग (नारद) के बहकावे में आकर खूब भूलीं। पहले पंचों के कहने से शिव ने सती से विवाह किया था, परन्तु फिर उसे त्याग कर मरवा डाला ॥४॥


दो०-

अब सुख सोवत सोचु नहिं भीख मागि भव खाहिं ।

सहज एकाकिन्ह के भवन कबहुँ कि नारि खटाहिं ॥७९॥

अर्थात

अब शिव को कोई चिन्ता नहीं रही, भीख माँगकर खा लेते हैं और सुख से सोते हैं। ऐसे स्वभाव से ही अकेले रहने वालों के घर भी भला क्या कभी स्त्रियाँ टिक सकती हैं? ॥७९॥


अजहूँ मानहु कहा हमारा । हम तुम्ह कहुँ बरु नीक बिचारा ॥

अति सुंदर सुचि सुखद सुसीला । गावहिं बेद जासु जस लीला ॥

अर्थात

अब भी हमारा कहा मानो, हमने तुम्हारे लिये अच्छा वर विचारा है। वह बहुत ही सुन्दर, पवित्र, सुखदायक और सुशील है, जिसका यश और लीला वेद गाते हैं ॥१॥


दूषन रहित सकल गुन रासी । श्रीपति पुर बैकुंठ निवासी ॥

अस बरु तुम्हहि मिलाउब आनी। सुनत बिहसि कह बचन भवानी ॥

अर्थात

वह दोषों से रहित, सारे सद्गुणों की राशि, लक्ष्मी का स्वामी और वैकुण्ठपुरी का रहने वाला है। हम ऐसे वर को लाकर तुमसे मिला देंगे। यह सुनते ही पार्वती जी हँसकर बोलीं- ॥२॥


सत्य कहेहु गिरिभव तनु एहा । हठ न छूट छूटै बरु देहा ॥

कनकउ पुनि पषान तें होई । जारेहुँ सहजु न परिहर सोई ॥

अर्थात

आपने यह सत्य ही कहा कि मेरा यह शरीर पर्वत से उत्पन्न हुआ है। इसलिये हठ नहीं छूटेगा, शरीर भले ही छूट जाय। सोना भी पत्थर से ही उत्पन्न होता है, सो वह जलाये जाने पर भी अपने स्वभाव (सुवर्णत्व) को नहीं छोड़ता ॥३॥


नारद बचन न मैं परिहरऊँ । बसउ भवनु उजरउ नहिं डरऊँ ॥

गुर के बचन प्रतीति न जेही । सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही ॥

अर्थात

अतः मैं नारदजी के वचनों को नहीं छोडूंगी; चाहे घर बसे या उजड़े, इससे मैं नहीं डरती। जिसको गुरु के वचनों में विश्वास नहीं है, उसको सुख और सिद्धि स्वप्नमें भी सुगम नहीं होती ॥४॥


दो०-

महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम ।

जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम ॥८०॥

अर्थात

माना कि महादेव जी अवगुणों के भवन हैं और विष्णु समस्त सद्गुणों के धाम हैं; पर जिसका मन जिसमें रम गया, उसको तो उसी से काम है ॥८०॥


जौं तुम्ह मिलतेहु प्रथम मुनीसा । सुनतिउँ सिख तुम्हारि धरि सीसा ॥

अब मैं जन्मु संभु हित हारा । को गुन दूषन करै बिचारा ॥

अर्थात

हे मुनीश्वरो ! यदि आप पहले मिलते, तो मैं आपका उपदेश सिर-माथे रखकर सुनती। परंतु अब तो मैं अपना जन्म शिवजी के लिये हार चुकी। फिर गुण-दोषों का विचार कौन करे? ॥१॥


जौं तुम्हरे हठ हृदयँ बिसेषी । रहि न जाइ बिनु किएँ बरेषी ॥

तौ कौतुकिअन्ह आलसु नाहीं । बर कन्या अनेक जग माहीं ॥

अर्थात

यदि आपके हृदय में बहुत ही हठ है और विवाह की बातचीत (बरेखी) किये बिना आपसे रहा ही नहीं जाता, तो संसार में वर-कन्या बहुत हैं। खिलवाड़ करने वालों को आलस्य तो होता नहीं [और कहीं जाकर कीजिये] ॥२॥


जन्म कोटि लगि रगर हमारी । बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी ॥

तजउँ न नारद कर उपदेसू । आपु कहहिं सत बार महेसू ॥

अर्थात

मेरा तो करोड़ जन्मों तक यही हठ रहेगा कि या तो शिवजी को वरूँगी, नहीं तो कुमारी ही रहूँगी। स्वयं शिवजी सौ बार कहें, तो भी नारदजी के उपदेश को न छोडूंगी ॥३॥


मैं पा परउँ कहइ जगदंबा । तुम्ह गृह गवनहु भयउ बिलंबा ॥

देखि प्रेमु बोले मुनि ग्यानी । जय जय जगदंबिके भवानी ॥

अर्थात

जगज्जननी पार्वती जी ने फिर कहा कि मैं आपके पैरों पड़ती हूँ। आप अपने घर जाइये, बहुत देर हो गयी। [शिवजी में पार्वती जी का ऐसा] प्रेम देखकर ज्ञानी मुनि बोले-हे जगज्जननी ! हे भवानी ! आपकी जय हो ! जय हो !! ॥ ४॥


दो०-

तुम्ह माया भगवान सिव सकल जगत पितु मातु ।

नाइ चरन सिर मुनि चले पुनि पुनि हरषत गातु ॥८१॥

अर्थात

आप माया हैं और शिवजी भगवान् हैं। आप दोनों समस्त जगत् के माता-पिता हैं। [यह कहकर] मुनि पार्वती जी के चरणों में सिर नवाकर चल दिये। उनके शरीर बार-बार पुलकित हो रहे थे ॥८१॥


जाइ मुनिन्ह हिमवंतु पठाए । करि बिनती गिरजहिं गृह ल्याए ॥

बहुरि सप्तरिषि सिव पहिं जाई । कथा उमा कै सकल सुनाई ॥

अर्थात

मुनियों ने जाकर हिमवान् को पार्वती जी के पास भेजा और वे विनती करके उनको घर ले आये; फिर सप्तर्षियों ने शिवजी के पास जाकर उनको पार्वती जी की सारी कथा सुनायी ॥१॥


भए मगन सिव सुनत सनेहा । हरषि सप्तरिषि गवने गेहा ॥

मनु थिर करि तब संभु सुजाना । लगे करन रघुनायक ध्याना ॥

अर्थात

पार्वती जी का प्रेम सुनते ही शिवजी आनन्दमग्न हो गये। सप्तर्षि प्रसन्न होकर अपने घर (ब्रह्मलोक)को चले गये। तब सुजान शिवजी मन को स्थिर कर के श्रीरघुनाथजी का ध्यान करने लगे ॥२॥

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