सत्यं शिवं सुंदरम् — तुलसीदास और रामचरितमानस की दिव्यता की गाथा

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सत्यं शिवं सुंदरम् — तुलसीदास और रामचरितमानस की दिव्यता की गाथा  यह कथा है उस पवित्र ग्रंथ की, जिसे "मानस" कहा गया — अर्थात वह जो मन से निकला, और हृदय से रचा गया। यह कथा है उस अनन्य भक्त तुलसीदास की, जिन्होंने भगवान श्रीराम के जीवनचरित्र को आमजन की भाषा में प्रस्तुत किया, ताकि रामकथा केवल विद्वानों और ब्राह्मणों तक सीमित न रह जाए, बल्कि हर जन तक पहुँचे। और ये उस समय का एक क्रांतिकारी कदम था। गोस्वामी तुलसीदास जी ने जिस रामचरितमानस की रचना की, वह संस्कृत की जगह अवधी भाषा में लिखी गई थी — जो सामान्य जनता की बोली थी। तुलसीदास जी का उद्देश्य था कि श्रीराम की महिमा हर आम जन तक पहुँचे, ना कि केवल विद्वानों और ब्राह्मणों तक सीमित रहे। लेकिन यही बात कुछ विद्वानों और ब्राह्मणों को स्वीकार्य नहीं थी। उनका कहना था: “रामकथा जैसी पवित्र गाथा केवल देवभाषा संस्कृत में ही कही जा सकती है। अवधी जैसी लोकभाषा में इसका वर्णन करना वेदों और पुराणों का अपमान है।” इसलिए काशी के विद्वानों और ब्राह्मणों ने रामचरितमानस को स्वीकार करने से मना कर दिया। उनमें भय था कि यह लोकभाषा में लिखा गया ग्रंथ कहीं धार...

Mahadev Ki Bhasm Aarti Kyo Ki Jati Hai

 Bhasm Aarti Ka Mahatva 


महादेव के पुजन में भस्म का विषेश महत्त्व है, बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक उज्जैन में स्थित श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग प्रतिदिन भस्म आरती होती है।


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भगवान भोलेनाथ अद्भुत, अलौकिक और अविनाशी हैं, भोलेनाथ जितने सरल हैं उतने ही रहस्यमयी भी हैं, भगवान भोलेनाथ का रहन-सहन आवास आदि सब अन्य देवताओं से भिन्न है।

शास्त्रों में एक ओर जहां सभी देवी देवताओं को सुन्दर वस्त्र और आभूषण धारण किए हुए बताया गया है, वहीं दूसरी ओर भोलेनाथ का स्वरूप निराला है।


भोलेनाथ सदैव मृगछाला धारण करते हैं, और भस्म से सुशोभित रहते हैं।

एक तरह से कहा जाए तो भस्म भगवान शिव का सम्पूर्ण वस्त्र है, क्योंकि भगवान् भोलेनाथ अपने पूरे शरीर में भस्म लपेटे रहते हैं।

भस्म सम्पूर्ण सृष्टि का सार है क्योंकि एक दिन सम्पूर्ण सृष्टि इसी तरह भस्म होकर भस्म बन जाएगी।


यूं तो भगवान भोलेनाथ बड़े हो सरल और भोले स्वभाव के हैं लेकिन महाकाल भगवान् शिव का वो स्वरूप है जिसमें आग है, गुस्सा है और इस संसार से पापीयों का सर्वनाश करने की क्षमता है, और जिसमें समाहित है धर्म और सत्य की विजय।

महाकाल जो लिंगम रूप में विराजमान हैं उज्जैन के रूद्रसागर झील के किनारे, श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग जो बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है और दक्षिणमुखी है।


विश्व प्रसिद्ध हिन्दू मन्दिरों में श्री महाकालेश्वर मंदिर को भगवान भोलेनाथ का सबसे पवित्र निवास स्थान माना जाता है।

ये एक मात्र ऐसा शिवलिंग है जिसकी भस्म आरती होती है,


Mahadev Ki Bhasm Aarti Kyo Ki Jati Hai


पुराणों में एक कथा मिलती है जिसके अनुसार उज्जैन की अवंति नगरी में एक वेदप्रिय नामक ब्राह्मण रहते थे, एक दिन वेदप्रिय अपने पुत्रों और धर्मात्माओं के साथ पूजा पाठ में मग्न थे, तभी एक दूषण नामक राक्षस ने उन पर आक्रमण कर दिया।

परन्तु उस राक्षस के आक्रमण से भी वो शिव भक्त ब्राह्मण नहीं डरे, और भगवान भोलेनाथ की आराधना में लीन रहे।

परन्तु जब उस राक्षस को ऐसा प्रतीत हुआ कि उसके आक्रमण से भी वे ब्राह्मण नहीं डर रहे तो उस दैत्य ने गुस्से में आकर अपने शस्त्र उठा लिए।


तभी भोलेनाथ अपने भक्तों की रक्षा हेतु वहां प्रकट हो गए, और भोलेनाथ ने उस राक्षस को वहीं भस्म कर दिया।

और उसकी राख से अपना श्रृंगार किया इसी लिए इस मन्दिर का नाम महाकालेश्वर पड़ा।

तभी से इस शिवलिंग की भस्म आरती की जाने लगी।


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ऐसा माना जाता है कि चारो युग (त्रेतायुग सतयुग द्वापर युग और कलियुग) के पूरा होने के बाद इस सम्पूर्ण सृष्टि का सर्वनाश हो जाता है, और ब्रह्माजी पुनः एक नवीन सृष्टि का निर्माण करते हैं, और यही क्रिया अनवरत चलती रहती है।

भस्म होकर सम्पूर्ण सृष्टि शिवजी में विलीन हो जाती है, इसी लिए भगवान शिव भस्म को सदैव धारण करके रखते हैं।


एक पौराणिक कथा के अनुसार एक बार एक शव यात्रा जा रही थी, सब बोल रहे थे- राम नाम सत्य है, राम नाम सत्य है, भोले बाबा ने राम नाम सुना वो भी सम्मिलित हो गये।

कितने अच्छे लोग हैं राम-राम बोल रहे हैं, साथ में वो भी पहुंचे घाट पर, घाट पर पहुंचे तो देखे सब बंद हो गया कोई नहीं बोल रहा है।

तो भोले नाथ सोचने लगे लगता यहां से सब आगे बढ़ेंगे तब बोलेंगे, वहां जलाया गया, क्रिया-क्रम हुआ सब लोग वापस हुए, तो कोई पूड़ी की बात कर रहा है, कोई कचोड़ी की बात कर रहा है, कोई जलेबी की बात कर रहा है।

रामजी का नाम कोई ले ही नहीं रहा है, भोले बाबा थोड़ी देर पीछे पीछे गए की अब ये लोग रामजी का नाम लेंगे, लेकिन कोई ले ही नहीं रहा है।


भोले नाथ सोचने लगे कि लगता है रामजी जो साथ में आ रहे थे, वो पीछे छूट गया है, इसलिए कोई नाम नहीं ले रहा है।

भोलेनाथ दौड़कर श्मशान में पहुंचे, तो जो पीछे छूटा था वो तो राख बन चुका था।


भोले बाबा सोचे, जो राम नाम साथ में आया था वो इसी में समाहित हुआ है, भोले नाथ ने उस भस्म को उठाया और इतना प्रेम रामजी से की उस भस्म को राम समझकर भोले बाबा अपने शरीर पर लगा लिए।

उसी दिन से शंकर जी को श्मशान का भस्म लगाया जाने लगा


भस्म लगाने के वैज्ञानिक और आध्यात्मिक कारण


भगवान् शिव के भस्म धारण करने के पीछे कुछ वैज्ञानिक और आध्यात्मिक कारण भी हैं, भगवान भोलेनाथ का अपने शरीर पर भस्म लगाने का दार्शनिक अर्थ ये है कि नश्वर शरीर जिस पर हम सबको अभिमान है एक दिन इसी तरह भस्म हो जाएगा।


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वहीं भस्म की एक विशेषता ये भी है कि ये शरीर के रोम छिद्रों को बन्द कर देता है साथ ही इसका एक वैज्ञानिक कारण ये भी है कि यदि कोई व्यक्ति भस्म को अपने शरीर पर धारण करता है तो गर्मी में गर्मी और सर्दी में सर्दी का एहसास नहीं होता।


Bhasm Aarti Ke Dauran Kiye Jane Wale Niyam | भस्म आरती के दौरान किये जाने वाले नियम


महिलाओं को इस आरती में शामिल होने के लिए साड़ी पहनना अनिवार्य है, और भस्म आरती के समय महिलाओं को घूंघट करना पड़ता है।

एसी मान्यता है कि भस्म आरती के समय भगवान शिव निराकार स्वरूप में होते हैं, और महिलाओं को इस स्वरूप का दर्शन करना वर्जित है।

इसलिए भस्म आरती के दौरान महिलाओं को घूंघट में रहना पड़ता है।

पुरूषों को भी भस्म आरती के दौरान कई नियमों का पालन करना होता है, इस आरती में शामिल होने वाले सभी पुरूष केवल धोती पहन सकते हैं और धोती साफ और सूती होनी चाहिए।


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बाहरी पुरुष केवल भस्म आरती को देख सकते हैं आरती करने का अधिकार केवल मंदिर के पुजारियों का है।

उज्जैन के महाकाल मंदिर में दिन में छे बार आरती की जाती है और हर आरती में श्री महाकाल बाबा के अलग-अलग दर्शन होते हैं।



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