बंदउॅं नाम राम रघुबर को । हेतु कृसानु भानु हिमकर को ।।
बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो । अगुन अनूपम गुन निधान सो ।।
अर्थात
मैं श्रीरघुनाथजी के नाम 'राम' की वन्दना करता हूॅं, जो कृशानु (अग्नि), भानु (सूर्य) और हिमकर (चन्द्रमा) का हेतु अर्थात् 'र' 'आ' और 'म' रूप से बीज है।
वह 'राम' नाम ब्रह्मा, विष्णु और शिव रूप है।
वह वेदों का प्राण है; निर्गुण, उपमा रहित और गुणों का भण्डार है ।।१।।
महामंत्र जोइ जपत महेसू । कासीं मुकुति हेतु उपदेसू ।।
महिमा जासु जान गनराऊ । प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ ।।
अर्थात
जो महामंत्र है, जिसे महेश्वर श्री शिवजी जपते हैं और उनके द्वारा जिसका उपदेश काशी में मुक्ति का कारण है, तथा जिसकी महिमा को गणेश जी जानते हैं, जो इस 'राम' नाम के प्रभाव से ही सबसे पहले पूजे जाते हैं ।।२।।
जान आदिकबि नाम प्रतापू । भयउ सुद्ध करि उलटा जापू ।।
सहस नाम सम सुनि सिव बानी । जपि जेईं पिय संग भवानी ।।
अर्थात
आदिकवि श्री वाल्मीकि जी राम नाम के प्रताप को जानते हैं, जो उलटा नाम ('मरा', 'मरा') जपकर पवित्र हो गये।
श्री शिवजी के वचन को सुनकर कि एक राम-नाम सहस्त्र नाम के समान है, पार्वती जी सदा अपने पति (श्री शिवजी) के साथ राम नाम का जप करती रहती हैं ।।३।।
हरषे हेतु हेरि हर ही को । किय भूषन तिय भूषन ती को ।।
नाम प्रभाउ जान सिव नीको । कालकूट फलु दीन्ह अमी को ।।
अर्थात
नाम के प्रति पार्वती जी के हृदय की ऐसी प्रीति देखकर श्री शिवजी हर्षित हो गये और उन्होंने स्त्रियों में भूषण रूप (पतिव्रताओं में शिरोमणि) पार्वती जी को अपना भूषण बना लिया (अर्थात उन्हें अपने अङ्ग में धारण करके अर्द्धाङ्गिनी बना लिया)।
नाम के प्रभाव को श्री शिवजी भली-भाॅंति जानते हैं, जिस (प्रभाव) के कारण कालकूट जहर ने उनको अमृत का फल दिया ।।४।।
दो०-
बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास ।
राम नाम बर बरन जुग सावन भादव मास ।।१९।।
अर्थात
श्रीरघुनाथजी की भक्ति वर्षा-ऋतु है, तुलसीदास जी कहते हैं कि उत्तम सेवकगण धान हैं और 'राम' नाम के दो सुन्दर अक्षर सावन-भादों के महीने हैं ।।१९।।
आखर मधुर मनोहर दोऊ । बरन बिलोचन जन जिय जोऊ ।।
सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू । लोक लाहु परलोक निबाहू ।।
अर्थात
दोनों अक्षर मधुर और मनोहर हैं, जो वर्णमाला रूपी शरीर के नेत्र हैं, भक्तों के जीवन हैं तथा स्मरण करने में सबके लिये सुलभ और सुख देने वाले हैं, और जो इस लोक में लाभ और परलोक में निर्वाह करते हैं (अर्थात् भगवान् के दिव्य धाम में दिव्य देह से सदा भगवत्सेवा में नियुक्त रखते हैं) ।।१।।
कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके । राम लखन सम प्रिय तुलसी के ॥
बरनत बरन प्रीति बिलगाती । ब्रह्म जीव सम सहज सँघाती ॥
अर्थात
ये कहने, सुनने और स्मरण करने में बहुत ही अच्छे (सुन्दर और मधुर) हैं ; तुलसीदास को तो श्रीराम-लक्ष्मण के समान प्यारे हैं।
इनका ('र' और 'म' का) अलग-अलग वर्णन करने में प्रीति बिलगाती है (अर्थात् बीज मन्त्र की दृष्टि से इनके उच्चारण, अर्थ और फल में भिन्नता दीख पड़ती है) परन्तु हैं ये जीव और ब्रह्म के समान स्वभाव से ही साथ रहने वाले (सदा एकरूप और एकरस) ॥२॥
नर नारायन सरिस सुभ्राता । जग पालक बिसेषि जन त्राता ॥
भगति सुतिय कल करन बिभूषन । जग हित हेतु बिमल बिधु पूषन ॥
अर्थात
ये दोनों अक्षर नर-नारायण के समान सुन्दर भाई हैं, ये जगत् का पालन और विशेष रूप से भक्तों की रक्षा करने वाले हैं।
ये भक्तिरूपिणी सुन्दर स्त्री के कानों के सुन्दर आभूषण (कर्णफूल) हैं और जगत् के हितके लिये निर्मल चन्द्रमा और सूर्य हैं ॥३॥
स्वाद तोष सम सुगति सुधा के । कमठ सेष सम धर बसुधा के ॥
जन मन मंजु कंज मधुकर से । जीह जसोमति हरि हलधर से ॥
अर्थात
ये सुन्दर गति (मोक्ष) रूपी अमृत के स्वाद और तृप्ति के समान हैं, कच्छप और शेषजी के समान पृथ्वी के धारण करने वाले हैं, भक्तों के मन रूपी सुन्दर कमल में विहार करने वाले भौंरे के समान हैं और जीभ रूपी यशोदाजी के लिये श्रीकृष्ण और बलरामजी के समान (आनन्द देनेवाले) हैं ॥४॥
दो०-
एकु छत्रु एकु मुकुटमनि सब बरननि पर जोउ ।
तुलसी रघुबर नाम के बरन बिराजत दोउ ॥२०॥
अर्थात
तुलसीदासजी कहते हैं- श्रीरघुनाथजी के नाम के दोनों अक्षर बड़ी शोभा देते हैं, जिनमें से एक (रकार) छत्ररूप (रेफ) से और दूसरा (मकार) मुकुटमणि (अनुस्वार ) रूपसे सब अक्षरों के ऊपर हैं ॥२०॥
समुझत सरिस नाम अरु नामी । प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी ॥
नाम रूप दुइ ईस उपाधी । अकथ अनादि सुसामुझि साधी ॥
अर्थात
समझने में नाम और नामी दोनों एक-से हैं, किन्तु दोनों में परस्पर स्वामी और सेवक के समान प्रीति है (अर्थात् नाम और नामी में पूर्ण एकता होने पर भी जैसे स्वामी के पीछे सेवक चलता है, उसी प्रकार नाम के पीछे नामी चलते हैं। प्रभु श्रीरामजी अपने 'राम' नाम का ही अनुगमन करते हैं, नाम लेते ही वहाँ आ जाते हैं)।
नाम और रूप दोनों ईश्वर की उपाधि हैं; ये (भगवान् के नाम और रूप) दोनों अनिर्वचनीय हैं, अनादि हैं और सुन्दर (शुद्ध भक्ति युक्त) बुद्धि से ही इनका [दिव्य अविनाशी] स्वरूप जानने में आता है ॥१॥
को बड़ छोट कहत अपराधू । सुनि गुन भेदु समुझिहहिं साधू ॥
देखिअहिं रूप नाम आधीना । रूप ग्यान नहिं नाम बिहीना ॥
अर्थात
इन (नाम और रूप) में कौन बड़ा है, कौन छोटा, यह कहना तो अपराध है।
इनके गुणों का तारतम्य (कमी-बेशी) सुनकर साधु पुरुष स्वयं ही समझ लेंगे। रूप नाम के अधीन देखे जाते हैं, नाम के बिना रूप का ज्ञान नहीं हो सकता ॥२॥
रूप बिसेष नाम बिनु जानें । करतल गत न परहिं पहिचानें ।।
सुमिरिअ नाम रूप बिनु देखें । आवत हृदयँ सनेह बिसेषें ।।
अर्थात
कोई-सा विशेष रूप बिना उसका नाम जाने हथेली पर रखा हुआ भी पहचाना नहीं जा सकता और रूप के बिना देखे भी नाम का स्मरण किया जाय तो विशेष प्रेम के साथ वह रूप हृदय में आ जाता है ॥३॥
नाम रूप गति अकथ कहानी । समुझत सुखद न परति बखानी ॥
अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी । उभय प्रबोधक चतुर दुभाषी ॥
अर्थात
नाम और रूप की गति की कहानी (विशेषता की कथा) अकथनीय है।
वह समझने में सुखदायक है, परन्तु उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।
निर्गुण और सगुण के बीच में नाम सुन्दर साक्षी है और दोनों का यथार्थ ज्ञान कराने वाला चतुर दुभाषिया है ॥४॥
दो०-
राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार ।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर ॥२१॥
अर्थात
तुलसीदासजी कहते हैं, यदि तू भीतर और बाहर दोनों ओर उजाला चाहता है तो मुख रूपी द्वार की जीभ रूपी देहली पर राम नाम रूपी मणि-दीपक को रख ॥२१॥
नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी । बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी ॥
ब्रह्मसुखहि अनुभवहिं अनूपा । अकथ अनामय नाम न रूपा ॥
अर्थात
ब्रह्मा के बनाये हुए इस प्रपञ्च (दृश्य जगत्) से भली भाँति छूटे हुए वैराग्यवान् मुक्त योगी पुरुष इस नाम को ही जीभ से जपते हुए [तत्त्व ज्ञान रूपी दिन में] जागते हैं और नाम तथा रूप से रहित अनुपम, अनिर्वचनीय, अनामय ब्रह्म सुख का अनुभव करते हैं ॥१॥
जाना चहहिं गूढ़ गति जेऊ । नाम जीहँ जपि जानहिं तेऊ ।।
साधक नाम जपहिं लय लाएँ । होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ ।।
अर्थात
जो परमात्मा के गूढ़ रहस्य को (यथार्थ महिमा को) जानना चाहते हैं, वे (जिज्ञासु) भी नाम को जीभ से जपकर उसे जान लेते हैं।
[लौकिक सिद्धियों के चाहने वाले अर्थार्थी] साधक लौ लगा कर नाम का जप करते हैं और अणिमादि [आठों] सिद्धियों को पाकर सिद्ध हो जाते हैं ॥२॥
जपहिं नामु जन आरत भारी । मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी ॥
राम भगत जग चारि प्रकारा । सुकृती चारिउ अनघ उदारा ॥
अर्थात
[संकट से घबराये हुए] आर्त भक्त नाम जप करते हैं तो उनके बड़े भारी बुरे-बुरे संकट मिट जाते हैं और वे सुखी हो जाते हैं।
जगत् में चार प्रकार के (१-अर्थार्थी-धनादि की चाहसे भजने वाले, २-आर्त-संकट की निवृत्ति के लिये भजने वाले, ३-जिज्ञासु-भगवान् को जानने की इच्छा से भजने वाले, ४-ज्ञानी-भगवान् को तत्त्व से जानकर स्वाभाविक ही प्रेम से भजने वाले) राम भक्त हैं और चारों ही पुण्यात्मा, पाप रहित और उदार हैं ॥३॥
चहू चतुर कहुँ नाम अधारा । ग्यानी प्रभुहि बिसेषि पिआरा ॥
चहुँ जुग चहुँ श्रुति नाम प्रभाऊ । कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ ॥
अर्थात
चारों ही चतुर भक्तों को नाम का ही आधार है; इनमें ज्ञानी भक्त प्रभु को विशेष रूप से प्रिय है।
यों तो चारों युगों में और चारों ही वेदों में नामका प्रभाव है, परन्तु कलियुग में विशेष रूप से है।
इसमें तो [नाम को छोड़कर] दूसरा कोई उपाय ही नहीं है ॥४॥
दो०-
सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन ।
नाम सुप्रेम पियूष ह्रद तिन्हहुँ किए मन मीन ॥२२॥
अर्थात
जो सब प्रकार की (भोग और मोक्ष की भी) कामनाओं से रहित और श्रीराम भक्ति के रस में लीन हैं, उन्होंने भी नाम के सुन्दर प्रेम रूपी अमृत के सरोवर में अपने मन को मछली बना रखा है (अर्थात् वे नाम रूपी सुधा का निरन्तर आस्वादन करते रहते हैं, क्षणभर भी उससे अलग होना नहीं चाहते) ॥२२॥
अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा । अकथ अगाध अनादि अनूपा ॥
मोरें मत बड़ नामु दुहू तें । किए जेहिं जुग निज बस निज बूतें ॥
अर्थात
निर्गुण और सगुण-ब्रह्म के दो स्वरूप हैं। ये दोनों ही अकथनीय, अथाह, अनादि और अनुपम हैं।
मेरी सम्मति में नाम इन दोनों से बड़ा है, जिसने अपने बल से दोनों को अपने वश में कर रखा है ॥१॥
प्रौढ़ि सुजन जनि जानहिं जन की । कहउँ प्रतीति प्रीति रुचि मन की ॥
एकु दारुगत देखिअ एकू । पावक सम जुग ब्रह्म बिबेकू ॥
उभय अगम जुग सुगम नाम तें । कहेउँ नामु बड़ ब्रह्म राम तें ॥
ब्यापकु एकु ब्रह्म अबिनासी । सत चेतन घन आनँद रासी ॥
अर्थात
सज्जन गण इस बात को मुझ दास की ढिठाई या केवल काव्योक्ति न समझें।
मैं अपने मनके विश्वास, प्रेम और रुचि की बात कहता हूँ। [निर्गुण और सगुण] दोनों प्रकार के ब्रह्म का ज्ञान अग्नि के समान है।
निर्गुण उस अप्रकट अग्नि के समान है जो काठ के अंदर है, परन्तु दीखती नहीं; और सगुण उस प्रकट अग्नि के समान है जो प्रत्यक्ष दीखती है।
[तत्त्वतः दोनों एक ही हैं; केवल प्रकट-अप्रकट के भेद से भिन्न मालूम होती हैं। इसी प्रकार निर्गुण और सगुण तत्त्वतः एक ही हैं। इतना होने पर भी] दोनों ही जानने में बड़े कठिन हैं, परन्तु नाम से दोनों सुगम हो जाते हैं। इसी से मैंने नाम को [निर्गुण] ब्रह्म से और [सगुण] राम से बड़ा कहा है, ब्रह्म व्यापक है, एक है, अविनाशी है; सत्ता, चैतन्य और आनन्द की घनराशि है ॥२-३॥
अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी । सकल जीव जग दीन दुखारी ॥
नाम निरूपन नाम जतन तें । सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें ॥
अर्थात
ऐसे विकार रहित प्रभु के हृदय में रहते भी जगत् के सब जीव दीन और दुखी हैं। नाम का निरूपण करके (नाम के यथार्थ स्वरूप, महिमा, रहस्य और प्रभाव को जानकर) नाम का जतन करने से (श्रद्धा पूर्वक नाम जप रूपी साधन करने से) वही ब्रह्म ऐसे प्रकट हो जाता है जैसे रत्न के जानने से उसका मूल्य ॥४॥
दो०-
निरगुन तें एहि भाँति बड़ नाम प्रभाउ अपार ।
कहउँ नामु बड़ राम तें निज बिचार अनुसार ॥२३॥
अर्थात
इस प्रकार निर्गुण से नाम का प्रभाव अत्यन्त बड़ा है। अब अपने विचार के अनुसार कहता हूँ कि नाम [सगुण] राम से भी बड़ा है ॥२३॥
राम भगत हित नर तनु धारी । सहि संकट किए साधु सुखारी ॥
नामु सप्रेम जपत अनयासा । भगत होहिं मुद मंगल बासा ॥
अर्थात
श्रीरामचन्द्रजी ने भक्तों के हित के लिये मनुष्य-शरीर धारण करके स्वयं कष्ट सहकर साधुओं को सुखी किया; परन्तु भक्त गण प्रेम के साथ नाम का जप करते हुए सहज ही में आनन्द और कल्याण के घर हो जाते हैं ॥१॥
राम एक तापस तिय तारी । नाम कोटि खल कुमति सुधारी ॥
रिषि हित राम सुकेतुसुता की । सहित सेन सुत कीन्हि बिबाकी ॥
सहित दोष दुख दास दुरासा । दलइ नामु जिमि रबि निसि नासा ॥
भंजेउ राम आपु भव चापू । भव भय भंजन नाम प्रतापू ॥
अर्थात
श्रीरामजी ने एक तपस्वी की स्त्री (अहल्या) को ही तारा, परन्तु नाम ने करोड़ों दुष्टों की बिगड़ी बुद्धि को सुधार दिया। श्रीरामजी ने ऋषि विश्वामित्र के हित के लिये एक सुकेतु यक्ष की कन्या ताड़का की सेना और पुत्र (सुबाहु) सहित समाप्ति की; परन्तु नाम अपने भक्तों के दोष, दुःख और दुराशाओं का इस तरह नाश कर देता है जैसे सूर्य रात्रि का।
श्रीरामजी ने तो स्वयं शिवजी के धनुष को तोड़ा, परन्तु नाम का प्रताप ही संसार के सब भयों का नाश करने वाला है ॥२-३॥
दंडक बनु प्रभु कीन्ह सुहावन । जन मन अमित नाम किए पावन ॥
निसिचर निकर दले रघुनंदन । नामु सकल कलि कलुष निकंदन ॥
अर्थात
प्रभु श्रीरामजी ने [भयानक] दण्डक वन को सुहावना बनाया, परन्तु नाम ने असंख्य मनुष्यों के मनों को पवित्र कर दिया। श्रीरघुनाथजी ने राक्षसों के समूह को मारा, परन्तु नाम तो कलियुग के सारे पापों की जड़ उखाड़ने वाला है ॥४॥
दो०-
सबरी गीध सुसेवकनि सुगति दीन्हि रघुनाथ ।
नाम उधारे अमित खल बेद बिदित गुन गाथ ॥२४॥
अर्थात
श्रीरघुनाथजी ने तो शबरी, जटायु आदि उत्तम सेवकों को ही मुक्ति दी; परन्तु नाम ने अगनित दुष्टोंका उद्धार किया। नाम के गुणों की कथा वेदों में प्रसिद्ध है ॥२४॥
राम सुकंठ बिभीषन दोऊ । राखे सरन जान सबु कोऊ ॥
नाम गरीब अनेक नेवाजे । लोक बेद बर बिरिद बिराजे ॥
अर्थात
श्रीरामजी ने सुग्रीव और विभीषण दो को ही अपने शरण में रखा, यह सब कोई जानते हैं; परंतु नाम ने अनेक गरीबों पर कृपा की है। नाम का यह सुन्दर विरद लोक और वेद में विशेष रूप से प्रकाशित है ॥१॥
राम भालु कपि कटकु बटोरा । सेतु हेतु श्रमु कीन्ह न थोरा ॥
नाम लेत भवसिंधु सुखाहीं । करहु बिचारु सुजन मन माहीं ॥
अर्थात
श्रीरामजी ने तो भालू और बन्दरों की सेना बटोरी और समुद्र पर पुल बाँधने के लिये थोड़ा परिश्रम नहीं किया; परंतु नाम लेते ही संसार-समुद्र सूख जाता है।
सजनगण ! मनमें विचार कीजिये [कि दोनों में कौन बड़ा है] ॥२॥
राम सकुल रन रावनु मारा । सीय सहित निज पुर पगु धारा ॥
राजा रामु अवध रजधानी । गावत गुन सुर मुनि बर बानी ॥
सेवक सुमिरत नामु सप्रीती । बिनु श्रम प्रबल मोह दलु जीती ॥
फिरत सनेहँ मगन सुख अपनें । नाम प्रसाद सोच नहिं सपनें ।।
अर्थात
श्रीरामचन्द्रजी ने कुटुम्ब सहित रावण को युद्धमें मारा, तब सीता सहित उन्होंने अपने नगर (अयोध्या) में प्रवेश किया। राम राजा हुए, अवध उनकी राजधानी हुई, देवता और मुनि सुन्दर वाणी से जिनके गुण गाते हैं। परंतु सेवक (भक्त) प्रेमपूर्वक नाम के स्मरण मात्र से बिना परिश्रम मोह की प्रबल सेना को जीत कर प्रेम में मग्न हुए अपने ही सुख में विचरते हैं, नाम के प्रसाद से उन्हें सपने में भी कोई चिन्ता नहीं सताती ।।३-४।।
दो०-
ब्रह्म राम तें नामु बड़ बर दायक बर दानि ।
रामचरित सत कोटि महँ लिय महेस जियँ जानि ॥२५॥
अर्थात
इस प्रकार नाम [निर्गुण] ब्रह्म और [सगुण] राम दोनों से बड़ा है।
यह वरदान देने वालों को भी वर देने वाला है। श्रीशिवजी ने अपने हृदय में यह जानकर ही सौ करोड़ रामचरित्र में से इस 'राम' नाम को [सार रूप से चुनकर] ग्रहण किया है ।।२५।।
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