सत्यं शिवं सुंदरम् — तुलसीदास और रामचरितमानस की दिव्यता की गाथा
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| गोस्वामी तुलसीदास जी | श्रीरामचरितमानस | श्रीराम लक्ष्मण सीता हनुमान, रावण इत्यादि | गीता प्रेस गोरखपुर | श्री हनुमानप्रसाद पोद्दार | संस्कृत, अवधी | सोरठा, चोपाई, दोहा और छंद | बालकाण्ड |
कामनाएँ, ये जीवन में कभी समाप्त नहीं होतीं, यदि आपने इस पर लगाम नहीं लगाया तो एक कामना पूर्ण होगी चार और खड़ी हो जाएंगी।
श्रीरामचरितमानस जी में एक पात्र केवट जी का है, केवट जी के घर में खाने के लिए दाने दाने आफत थी, घर में भोजन नहीं है केवट जी कहते हैं प्रभु नाव चलेगी तो घर में भोजन जायेगा, नाव चली गई तो मेरा परिवार भूखों मर जाएगा प्रभू।
हमारे पास पैसा भी नहीं है नाथ की नाव चली जाएगी तो हम दूसरी नावका बना लेंगे।
भगवान श्रीराम को गंगा पार कराने के बाद जब श्रीरामजी केवट जी को उतराई देने लगे तो केवट जी कहते हैं-
अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें, प्रभु कुछ नहीं चाहिए तब श्री रामजी कहने लगे अभी तो तुम कह रहे थे कि मेरे पास कुछ नहीं है अब उतराई लेने से मना कर रहे हो, केवट जी ने कहा प्रभु इतना मिल गया मुझे जिसको पाने का मैं अधिकारू नहीं था।
भगवान ने कहा तुमने तो कुछ लिया ही नहीं, केवट जी कहने लगे प्रभु आपके जिन चरणों को देखने के लिए मुनि लोग जीवन भर यत्न करते हैं नाथ, आपने उन चरणों को छुने का अवसर दे दिया मुझे, इससे अधिक जीवन में किसी को और क्या चाहिए, इसलिए मुझे कुछ नहीं चाहिए।
भगवान के दर्शन का परिणाम है कि केवट जी के जीवन से कामनाएँ समाप्त हो गईं यदि उस नाव चलाने वाले की कामनाएँ समाप्त हो सकतीं हैं तो क्या श्रीरामचरितमानस जी की कथा को श्रद्धा से पढ़कर और सुनकर हमारी कामनाएँ नहीं समाप्त हो सकतीं? अवश्य होंगी।
Ram Charit Manas Ki Chaupai
कवि वन्दना
एहि प्रकार बल मनहि देखाई । करिहउॅं रघुपति कथा सुहाई ।।
ब्यास आदि कबि पंगुव नाना । जिन्ह सादर हरि सुजस बखाना ।।
अर्थात
इस प्रकार मनको बल दिखलाकर मैं श्रीरघुनाथजी की सुहावनी कथा की रचना करूॅंगा। व्यास आदि जो अनेकों श्रेष्ठ कवि हो गये हैं, जिन्होंने बड़े आदर से श्रीहरि का सुयश वर्णन किया है ।।१।।
चरन कमल बंदउॅं तिन्ह केरे । पुरवहुॅं सकल मनोरथ मेरे ।।
कलि के कबिन्ह करउॅं परनामा । जिन्ह बरने रघुपति गुन ग्रामा ।।
अर्थात
मैं उन सब (श्रेष्ठ कवियों) के चरण कमलों में प्रणाम करता हूॅं, वे मेरे सब मनोरथों को पूरा करें।
कलियुग के भी उन कवियों को मैं प्रणाम करता हूॅं, जिन्होंने श्रीरघुनाथजी के गुण समूहों का वर्णन किया है ।।२।।
जे प्राकृत कबि परम सयाने । भाषाॅं जिन्ह हरि चरित बखाने ।।
भए जे अहहिं जे होइहहिं आगें । प्रनवऊॅं सबहि कपट सब त्यागें ।।
अर्थात
जो बड़े बुद्धिमान् प्राकृत कवि हैं, जिन्होंने भाषा में हरि चरित्रों का वर्णन किया है, जो ऐसे कवि पहले हो चुके हैं, जो इस समय वर्तमान हैं और जो आगे होंगे, उन सबको मैं सारा कपट त्याग कर प्रणाम करता हूॅं ।।३।।
होहु प्रसन्न देहु बरदानू । साधु समाज भनिति सनमानू ।।
जो प्रबंध बुध नहिं आदरहीं । सो श्रम बादि बाल कबि करहीं ।।
अर्थात
आप सब प्रसन्न होकर यह वरदान दीजिए कि साधु-समाज में मेरी कविता का सम्मान हो; क्योंकि बुद्धिमान् लोग जिस कविता का आदर नहीं करते, मूर्ख कवि ही उसकी रचना का व्यर्थ परिश्रम करते हैं ।।४।।
कीरति भनिति भूति भलि सोई । सुरसरि सम सब कहॅं हित होई ।।
राम सुकीरति भनिति भदेसा । असमंजस अस मोहि अँदेसा ॥५॥
अर्थात
कीर्ति, कविता और सम्पत्ति वही उत्तम है, जो गङ्गाजी की तरह सबका हित करने वाली हो। श्री रामचन्द्रजी की कीर्ति तो बड़ी सुंदर (सबका अनन्त कल्याण करने वाली ही) है, परन्तु मेरी कविता भद्दी है। यह असामंजस्य है (अर्थात् इन दोनों का मेल नहीं मिलता), इसी की मुझे चिन्ता है ॥५।।
तुम्हारी कृपाॅं सुलभ सोउ मोरे । सिअनि सुहावनी टाट पटोरे ।।
अर्थात
परन्तु हे कवियो ! आपकी कृपा से यह बात भी मेरे लिये सुलभ हो सकती है।
रेशम की सिलाई टाट पर भी सुहावनी लगती है ।।६।।
दो०-
सरल कबित कीरति बिमल सोइ आदरहिं सुजान ।
सहज बयर बिसराइ रिपु जो सुनि करहिं बखान ।।१४ (क)।।
अर्थात
चतुर पुरुष उसी कविता का आदर करते हैं, जो सरल हो और जिसमें निर्मल चरित्र का वर्णन हो तथा जिसे भरकर शत्रु भी स्वाभाविक वैर को भूलकर सराहना करने लगें ।।१४ (क)।।
सो न होइ बिनु बिमल मति मोहि मति बल अति थोर ।
करहु कृपा हरि जस कहउॅं पुनि पुनि करउॅं निहोर ।।१४ (ख)।।
अर्थात
ऐसी कविता बिना निर्मल बुद्धि के होती नहीं और मेरे बुद्धि का बल बहुत ही थोड़ा है।
इसलिए बार-बार निहोरा करता हूॅं कि हे कवियो ! आप कृपा करें, जिससे मैं हरि यश का वर्णन कर सकूॅं ।।१४ (ख)।।
कबि कोबिद रघुबर चरित मानस मंजु मराल ।
बालबिनय सुनि सुरुचि लखि मो पर होहु कृपाल ।।१४ (ग)।।
अर्थात
कवि और पण्डित गण ! आप जो राम चरित्र रूपी मान सरोवर के सुन्दर हंस हैं, मुझ बालक की विनती सुनकर और सुन्दर रुचि देखकर मुझ पर कृपा करें ।।१४ (ग)।।
वाल्मीकि, वेद, ब्रह्मा, देवता, शिव, पार्वती आदि की वन्दना
सो०-
बंदउॅं मुनि पद कंजु रामायन जेहिं निरमयउ ।
सखर सुकोमल मंजु दोष रहित दूषन सहित ।।१४ (घ)।।
अर्थात
मैं उन वाल्मीकि मुनि के चरण कमलों की वन्दना करता हूॅं, जिन्होंने रामायण की रचना की है, जो खर (राक्षस) सहित होने पर भी खर (कठोर) से विपरीत बड़ी कोमल और सुन्दर है तथा जो दूषण (राक्षस) सहित होने पर भी दूषण अर्थात् दोष से रहित है ।।१४ (घ)।।
बंदउॅं चारिउ बेद भव बारिधि बोहित सरिस ।
जिन्हहि न सपनेहुॅं खेद बरनत रघुबर बिसद जसु ।।१४ (ङ)।।
अर्थात
मैं चारों वेदों की वन्दना करता हूॅं, जो संसार समुद्र के पार होने के लिये जहाज के समान हैं तथा जिन्हें श्रीरघुनाथजी का निर्मल यश वर्णन करते समय स्वप्न में भी खेद (थकावट) नहीं होता ।।१४ (ङ)।।
बंदउॅं बिधि पद रेनु भव सागर जेहिं कीन्ह जहॅं ।
संत सुधा ससि धेनु प्रगटे खल बिष बारुनी ।।१४ (च)।।
अर्थात
मैं ब्रह्मा जी के चरण-रज की वन्दना करता हूॅं, जिन्होंने भवसागर बनाया है, जहाॅं से एक ओर संत रूपी अमृत, चन्द्रमा और कामधेनु निकले और दूसरी ओर दुष्ट मनुष्य रूपी विष और मदिरा उत्पन्न हुए।।१४ (च)।।
दो०-
बिबुध बिप्र बुध ग्रह चरन बंदि कहउॅं कर जोरि ।
होइ प्रसन्न पुरवहु सकल मंजु मनोरथ मोरि ।। १४ (छ)।।
अर्थात
देवता, ब्राह्मण, पण्डित, ग्रह-इन सबके चरणों की वन्दना करके हाथ जोड़कर कहता हूॅं कि आप प्रसन्न होकर मेरे सारे सुन्दर मनोरथों को पूरा करें ।। (छ)।।
पुनि बंदउॅं सारद सुरसरिता । जुगल पुनीत मनोहर चरिता ।।
मज्जन पान पाप हर एका । कहत सुनत एक हर अबिबेका ।।
अर्थात
फिर मैं सरस्वती जी और देव नदी गङ्गाजी की वन्दना करता हूॅं। दोनों पवित्र और मनोहर चरित्र वाली हैं।
एक (गङ्गाजी) स्नान करने और जल पीने से पापों को हरती हैं और दूसरी (सरस्वतीजी) गुण और यश कहने और सुनने से अज्ञान का नाश कर देती हैं ।।१।।
गुरु पितु मातु महेस भवानी । प्रनवऊॅं दीनबंधु दिन दानी ।।
सेवक स्वामि सखा सिय पी के । हित निरुपधि सब बिधि तुलसी के ।।
अर्थात
श्रीमहेश और पार्वती को मैं प्रणाम करता हूॅं, जो मेरे गुरु और माता-पिता हैं, जो दीनबन्धु और नित्य दान करने वाले हैं, जो सीतापति श्रीरामचन्द्रजी के सेवक, स्वामी और सखा हैं तथा मुझ तुलसीदास का सब प्रकार से कपट रहित (सच्चा) हित करने वाले हैं ।।२।।
कलि बिलोक जग हित हर गिरिजा । साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरिजा ।।
अनमिल आखर अरथ न जापू । प्रगट प्रभाऊ महेस प्रतापू ।।
अर्थात
जिन शिव-पार्वती ने कलियुग को देखकर, जगत् के हित के लिये, शाबर मन्त्र समूह की रचना की, जिन मन्त्रों के अक्षर बेमेल हैं, जिनका न कोई ठीक अर्थ होता है और न जप ही होता है, तथापि श्री शिव जी के प्रताप से जिनका प्रभाव प्रत्यक्ष है ।।३।।
सो उमेस मोहि पर अनुकूला । करिहिं कथा मुद मंगल मूला ।।
सुमिरि सिवा सिव पाइ पसाऊ । बरनउॅं रामचरित चित चाऊ ।।
अर्थात
वे उमापति शिवजी मुझ पर प्रसन्न होकर [ श्रीरामजी की ] इस कथा को आनन्द और मङ्गल की मूल (उत्पन्न करने वाली) बनायेंगे।
इस प्रकार पार्वती जी और शिव जी दोनों का स्मरण करके और उनका प्रसाद पाकर मैं चाव भरे चित्त से श्रीराम चरित्र का वर्णन करता हूॅं ।।४।।
भनिति मोरि सिव कृपाॅं बिभाती । ससि समाज मिलि मनहुॅं सुराती ।।
जे एहि कथहि सनेह समेता । कहिहहिं सुनिहहिं समुझि सचेता ।।
होइहहिं राम चरन अनुरागी । कलि मल रहित सुमंगल भागी ।।
अर्थात
मेरी कविता श्री शिवजी की कृपा से ऐसी सुशोभित होगी, जैसी तारागणों के सहित चन्द्रमा के साथ रात्रि शोभित होती है।
जो इस कथा को प्रेम सहित एवं सावधानी के साथ समझ-बूझकर कहें-सुनेंगे, वे कलियुग के पापों से रहित और सुन्दर कल्याण के भागी होकर श्रीरामचन्द्रजी के चरणों के प्रेमी बन जायॅंगे ।।५-६।।
दो०-
सपनेहुॅं साचेहुॅं मोहि पर जौं हर गौरि पसाउ ।
तौ फुर होउ जो कहेउॅं सब भाषा भनिति प्रभाउ ।।१५।।
अर्थात
यदि मुझ पर श्री शिवजी और पार्वतीजी की स्वप्न में भी सचमुच प्रसन्नता हो, तो मैंने इस भाषा, कविता का जो प्रभाव कहा है, वह सब सच हो ।।१५।।
श्री सीताराम धाम, परिकर वन्दना
बंदउॅं अवध पुरी अति पावनि । सरजू सरि कलि कलुष नसावनि ।।
प्रनवऊॅं पुर नर नारि बहोरी । ममता जिन्ह पर प्रभुहि न थोरी ।।
अर्थात
मैं अति पवित्र श्री अयोध्या पुरी और कलियुग के पापों का नाश करने वाली श्रीसरयू नदी की वन्दना करता हूॅं।
फिर अवध पुरी के उन नर-नारियों को प्रणाम करता हूॅं जिन पर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी की ममता थोड़ी नहीं है (अर्थात बहुत है) ।।१।।
सिय निंदक अघ ओघ नसाए । लोक बिसोक बनाइ बसाए ।।
बंदउॅं कौसल्या दिसि प्राची । कीरति जासु सकल जग माची ।।
अर्थात
उन्होंने [ अपनी पुरी में रहने वाले ] सीताजी की निन्दा करने वाले (धोबी और उसके समर्थक पुर-नर-नारियों) के पाप समूह को नाश कर उनको शोकरहित बनाकर अपने लोक (धाम) में बसा दिया।
मैं कौसल्या रूपी पूर्व दिशा की वन्दना करता हूॅं, जिसकी कीर्ति समस्त संसार में फैल रही है ।।२।।
प्रगटेउ जहॅं रघुपति ससि चारू । बिस्व सुखद खल कमल तुसारू ।।
दसरथ राउ सहित सब रानी । सुकृत सुमंगल मूरति मानी ।।
करउॅं प्रनाम करम मन बानी । करहु कृपा सुत सेवक जानी ।।
जिन्हहि बिरचि बड़ भयउ बिधाता । महिमा अवधि राम पितु माता ।।
अर्थात
जहाॅं (कौसल्या रूपी पूर्व दिशा) से विश्व को सुख देने वाले और दुष्ट रूपी कमलों के लिये पाले के समान श्रीरामचन्द्र रूपी सुन्दर चन्द्रमा प्रकट हुए। सब रानियों सहित राजा दशरथजी को पुण्य और सुन्दर कल्याण की मूर्ति मानकर मैं मन, वचन और कर्म से प्रणाम करता हूॅं।
अपने पुत्र का सेवक जानकर वे मुझपर कृपा करें, जिनको रचकर ब्रह्माजी ने भी बड़ाई पायी तथा जो श्रीरामजी के माता और पिता होने के कारण महिमा की सीमा हैं ।।३-४।।
सो०-
बंदउॅं अवध भुआल सत्य प्रेम जेहि राम पद ।
बिछुरत दीनदयाल प्रिय तनु तृन इव परिहरेउ ।।१६।।
अर्थात
मैं अवध के राजा श्री दशरथजी की वन्दना करता हूॅं, जिनका श्रीरामजी के चरणों में सच्चा प्रेम था, जिन्होंने दीनदयालु प्रभु के बिछुड़ते ही अपने प्यारे शरीर को मामूली तिनके की तरह त्याग दिया ।।१६।।
प्रनवऊॅं परिजन सहित बिदेहू । जाहि राम पद गूढ़ सनेहू ।।
जोग भोग महॅं राखेउ गोई । राम बिलोकत प्रगटेउ सोई ।।
अर्थात
मैं परिवार सहित राजा जनकजी को प्रणाम करता हूॅं, जिनका श्रीरामजी के चरणों में गूढ़ प्रेम था, जिसको उन्होंने योग और भोग में छिपा रखा था, परन्तु श्रीरामचन्द्रजी को देखते ही वह प्रकट हो गया ।।१।।
प्रनवऊॅं प्रथम भरत के चरना । जासु नेम ब्रत जाइ न बरना ।।
राम चरन पंकज मन जासू । लुबुध मधुप इव तजइ न पासू ।।
अर्थात
[ भाइयों में ] सबसे पहले मैं श्रीभरतजी के चरणों को प्रणाम करता हूॅं, जिनका नियम और व्रत वर्णन नहीं किया जा सकता तथा जिनका मन श्रीरामजी के चरण कमलों में भौंरे की तरह लुभाया हुआ है, कभी उनका पास नहीं छोड़ता ।।२।।
बंदउॅं लछिमन पद जलजाता । सीतल सुभग भगत सुखदाता ।।
रघुपति कीरति बिमल पताका । दंड समान भयउ जस जाका ।।
अर्थात
मैं श्रीलक्ष्मणजी के चरण कमलों को प्रणाम करता हूॅं, जो शीतल, सुन्दर और भक्तों को सुख देने वाले हैं।
श्रीरघुनाथजी की कीर्ति रूपी विमल पताका में जिनका (लक्ष्मणजी का) यश [ पताका को ऊॅंचा करके फहराने वाले ] दंड के समान हुआ ।।३।।
सेष सहस्त्रसीस जग कारन । जो अवतरेउ भूमि भय टारन ।।
सदा सो सानुकूल रह मो पर । कृपासिंधु सौमित्र गुनाकर ।।
अर्थात
जो हजार सिर वाले और जगत् के कारण (हजार सिरों पर जगत् को धारण कर रखने वाले) शेषजी हैं, जिन्होंने पृथ्वी का भय दूर करने के लिये अवतार लिया, वे गुणों की खानि कृपा सिंधु सुमित्रानंदन श्रीलक्ष्मणजी मुझ पर सदा प्रसन्न रहें ।।४।।
रिपुसूदन पद कमल नमामी । सूर सुसील भरत अनुगामी ।।
महाबीर बिनवउॅं हनुमाना । राम जासु जस आप बखाना ।।
अर्थात
मैं श्रीशत्रुघ्नजी के चरण कमलों को प्रणाम करता हूॅं, जो बड़े वीर, सुशील और श्रीभरतजी के पीछे चलने वाले हैं।
मैं महावीर श्रीहनुमान् जी की विनती करता हूॅं, जिनके यश का श्रीरामचनद्रजी ने स्वयं (अपने श्रीमुख से) वर्णन किया है ।।५।।
सो०-
प्रनवऊॅं पवनकुमार खल बन पावक ग्यान घन ।
जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर ।।१७।।
अर्थात
मैं पवन कुमार श्री हनुमान जी को प्रणाम करता हूॅं, जो दुष्ट रूपी वन को भस्म करने के लिये अग्नि रूप हैं, जो ज्ञान की घन मूर्ति हैं और जिनके हृदय रूपी भवन में धनुष-बाण धारण किये श्रीरामजी निवास करते हैं ।।१७।।
कपिपति रीछ निसाचर राजा । अंगदादि जे कीस समाजा ।।
बंदउॅं सब के चरन सुहाए । अधम सरीर राम जिन्ह पाए ।।
अर्थात
वानरों के राजा सुग्रीव जी, रीछों के राजा जाम्बवान् जी, राक्षसों के राजा विभीषण जी और अंगद जी आदि जितना वानरों का समाज है, सबके सुन्दर चरणों की मैं वन्दना करता हूॅं, जिन्होंने अधम (पशु और राक्षस आदि) शरीर में भी श्रीरामचन्द्रजी को प्राप्त कर लिया ।।१।।
रघुपति चरन उपासक जेते । खग मृग सुर नर असुर समेते ।।
बंदउॅं पद सरोज सब केरे । जे बिनु काम राम के चेरे ।।
अर्थात
पशु, पक्षी, देवता, मनुष्य, असुर समेत जितने श्रीरामजी के चरणों के उपासक हैं, मैं उन सबके चरण कमलों की वन्दना करता हूॅं, जो श्रीरामजी के निष्काम सेवक हैं।।२।।
सुक सनकादि भगत मुनि नारद । जे मुनिबर बिग्यान बिसारद ।।
प्रनवऊॅं सबहि धरनि धरि सीसा । करहु कृपा जन जानि मुनीसा।।
अर्थात
शुकदेव जी, सनकादि, नारद मुनि आदि जितने भक्त और परम ज्ञानी श्रेष्ठ मुनि हैं, मैं धरती पर सिर टेक कर उन सबको प्रणाम करता हूॅं; हे मुनीश्वरो ! आप सब मुझको अपना दास जानकर कृपा कीजिये ।।३।।
जनकसुता जग जननी जानकी । अतिसय प्रिय करुनानिधान की ।।
ताके जुग पद कमल मनावउॅं । जासु कृपाॅं निरमल मति पावउॅं ।।
अर्थात
राजा जनक की पुत्री, जगत् की माता और करुणानिधान श्रीरामचन्द्रजी की प्रियतमा श्रीजानकी जी के दोनों चरण कमलों को मैं मनाता हूॅं, जिनकी कृपा से निर्मल बुद्धि पाउॅं ।।४।।
पुनि मन बचन कर्म रघुनायक । चरन कमल बंदउॅं सब लायक ।।
राजिवनयन धरें धनु सायक । भगत बिपति भंजन सुखदायक ।।
अर्थात
फिर मैं मन, वचन और कर्म से कमल नयन, धनुष-बाणधारी, भक्तों की विपत्ति का नाश करने और उन्हें सुख देने वाले भगवान् श्रीरघुनाथजी के सर्व प्रथम चरण कमलों की वन्दना करता हूॅं ।।५।।
दो०-
गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न ।
बंदउॅं सीता राम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न ।।१८।।
अर्थात
जो वाणी और उसके अर्थ तथा जल और जल की लहर के समान कहने में अलग-अलग हैं, परन्तु वास्तव में अभिन्न (एक) हैं, उन श्रीसीतारामजी के चरणों की मैं वन्दना करता हूॅं, जिन्हें दीन-दुखि बहुत प्रिय हैं ।।१८।।
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