तहँ पुनि संभु समुझि पन आपन। बैठे बट तर करि कमलासन॥
संकर सहज सरूपु सम्हारा। लागि समाधि अखंड अपारा॥
भगवान शंकर माता सती को लेकर कैलाश पहुंचे और जाकर संकर सहज सरूपु सम्हारा। भगवान शंकर अपने सहज स्वरूप में प्रवेश कर गए।
परिणाम लागि समाधि अखंड अपारा भगवान भोलेनाथ कमल हसन लगाकर कैलाश पर्वत पर एक वट वृक्ष के नीचे बैठ गए।
भगवान शंकर कमलासन लगाकर बैठे और ध्यान करते करते भगवान शंकर अखंड समाधि में पहुंच गए, भगवान शंकर सत्तासी हजार वर्ष तक समाधि में रहे।
सत्तासी हजार वर्ष बाद बाबा समाधि से बाहर आए और राम राम का स्मरण किया और सती मैया जान ले बाबा समाधि से जाग गए हैं।
जाइ संभु पद बंदनु कीन्हा और फिर भोलेनाथ ने माता सती को सनमुख संकर आसनु दीन्हा, जैसे ही माता सती ने बाबा को प्रणाम किया बाबा ने देवी सती को अपने सामने बिठाया।
माता सती को सम्मुख बिठाकर भगवान भोलेनाथ लगे कहन हरि कथा रसाला श्री राम जी की कथा सुनाने लगे ठीक उसी समय माता सती के पिता प्रजापति दक्ष (दक्षा ऐसे अभागे हैं, कि वह अपने दामाद भगवान शंकर का सम्मान नहीं करते।
जब प्रजापति दक्ष प्रजापतियों के नायक बने, तो इन के सम्मान में देवताओं ने एक सभा बिठाई ब्रह्मा जी के यहां, तो जिसका सम्मान होना होता है वो बाद में आता है।
सभी देवता पहले से आ चुके थे दक्ष बाद में आए सभी देवताओं ने खड़े होकर उनका अभिवादन किया ब्रह्मा जी, विष्णु जी और शंकर जी को छोड़कर, दक्ष ने देखा ब्रह्मा, विष्णु और महेश यानी शंकर जी खड़े नहीं हुए।
दक्ष को क्रोध उत्पन्न हो गया दक्ष सोचने लगे ब्रह्मा जी पिता हैं कोई बात नहीं, विष्णु जी हमारे आराध्य हैं कोई बात नहीं लेकिन शंकर तो मेरा दामाद है, इतना बड़ा हो गया कि अपने ससुर के आने पर खड़े होकर उनका सम्मान नहीं किया।
दक्ष ने उसी की सभा में भगवान शंकर को बहुत भला बुरा सुनाया, लेकिन बाबा तो राम-राम जप रहे थे, उनको कोई फर्क नहीं पड़ा, उसी दिन से प्रजापति दक्ष दें भगवान शंकर को अपना शत्रु मान लिया।)
प्रजापति दक्ष को जैसे ही बड़ा अधिकार मिला भगवान शंकर का अपमान करने के लिए हरिद्वार के कनखल में एक यज्ञ की रचना की, कैसी रचना की तुलसीदास जी महाराज कहते हैं-
दोहा :
दच्छ लिए मुनि बोलि सब करन लगे बड़ जाग।
नेवते सादर सकल सुर जे पावत मख भाग॥ 60॥
दक्ष ने मुनियों को बुलाया और कहा यज्ञ की रचना कीजिए, मुनि लोग यज्ञ की तैयारी करने लगे, दक्ष ने सभी देवताओं को आदर पूर्वक निमंत्रण भेजा।
सभी देवता अपने विमान में बैठकर अपने परिवार के साथ कैलाश के ऊपर से दक्ष के यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए जाने लगे।
सती माता को भगवान शंकर कथा सुना रहे थे सती माता ने जब देवताओं को कैलाश के ऊपर से जाते हुए देखा तो बाबा से पूछा, प्रभु ये सब देवता लोग कहां जा रहे हैं?
भगवान भोलेनाथ ने कहा आपके पिताजी (दक्ष)एक यज्ञ कर रहे हैं, ये सब देवता उसी में भाग लेने के लिए जा रहे हैं, माता सती ने कहा प्रभु हम भी चलें?
भोलेनाथ ने कहा देवी विचार तो आपके बहुत उत्तम हैं, लेकिन आपके पिताजी ने हम लोगों को निमंत्रण नहीं दिया है, यद्यपि पिता के घर, गुरु के घर, स्वामी के घर और मित्र के घर, चार स्थानों पर बिना निमंत्रण के जाना चाहिए, परन्तु यदि जानबूझकर अपमानित करने के लिए नहीं बुलाया गया है तो वहां जाने पर कल्याण होने वाला नहीं है।
भगवान शंकर ने माता सती को बार-बार समझाया लेकिन देवी सती नहीं मानी, जब माता सती नहीं मानी तो अंत में भगवान शंकर ने-
दोहा :
कहि देखा हर जतन बहु रहइ न दच्छकुमारि।
दिए मुख्य गन संग तब बिदा कीन्ह त्रिपुरारि॥62॥
अंत में अपने मुख्य गणों को देकर भगवान शंकर ने माता सती को विदा किया।
जैसे सती जी अपने पिता के घर पहुंची, गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं-
पिता भवन जब गईं भवानी। दच्छ त्रास काहुँ न सनमानी॥
सादर भलेहिं मिली एक माता। भगिनीं मिलीं बहुत मुसुकाता॥
देवी सती अपने पिता के घर गईं लेकिन किसी ने उनसे बात तक नहीं की, सिवाय उनकी माता को छोड़कर।
प्रसूति मैया आदर के साथ देवी सती से मिलीं, मिलीं तो उनकी बहनें भी लेकिन उनके मिलने में अलग व्यवहार था।
भगिनीं मिलीं बहुत मुसुकाता, मुस्कुराना तो ठीक है परन्तु बहुत मुस्कुराना एक व्यंग हो जाता है, लेकिन देवी सती को इससे फर्क नहीं पड़ा।
देवी सती ने अपनी माता से कहा मां मैं यज्ञ मंडप की परिक्रमा लगाना चाहती हूॅं, देवी सती ने जाकर परिक्रमा लगाई और देखा यज्ञ मंडप में सभी देवताओं के लिए स्थान बना है और मेरे पति के लिए कोई स्थान नहीं, जिस यज्ञ में रूद्र का स्थान नहीं वो यज्ञ कभी पूर्ण नहीं हो सकता।
देवी सती आवेश मैं आ गईं-
जद्यपि जग दारुन दुख नाना। सब तें कठिन जाति अवमाना।।
यद्यपि जगत में अनेक प्रकार के दारुण दुःख हैं, तथापि, जाति अपमान सबसे बढ़कर कठिन है, आप समाज में निकलें कोई आपको जानता नहीं, वो आपको नहीं देखता आपको फर्क नहीं पड़ता, लेकिन आपके अपने आपको बिना देखे चले जाएं, तो फिर जीवन में कुछ बचता नहीं है।
माता सती का शरीर क्रोधाग्नि में जलने लगा।
माता सती ने कहा हे देवगणं, हे ऋषिगणं जितने देवता, ऋषि, मुनि इस यज्ञ मंडप में आकर बैठे हैं अपने-अपने कानों को खोलकर सुन लो, आज जिस-जिस ने भी यहां बैठकर मेरे पति का अपमान किया है निन्दा की है अथवा जिसने अपने कानों से सुना भी है, आप सबको दंड मिलेगा।
मर्यादा कहती है जिस सभा में संत की शंभू की या श्री हरि विष्णुजी की निन्दा हो रही है, यदि अपने भीतर सामर्थ्य है तो निन्दा करने वाले की जिह्वा को काट लो, और यदि शक्ति नहीं है तो कान बंद करके तुरंत उस सभा का त्याग कर दो।
मेरे पति केवल मेरे पति मात्र नहीं हैं, जगत् के पिता हैं, और आज इस मंदमति मेरे पिता ने, मेरे पति का अपमान किया है, आज के बाद मैं दक्ष की बेटी के रूप में जीवित नहीं रहूॅंगी।
इतना कहकर देवी सती ने अपने दाहिने पांव के अंगुष्ठ से योगाग्नि को प्रज्वलित कराया और स्वयं को सभा के मध्य में जलाकर भस्म कर दिया।
अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। भयउ सकल मख हाहाकारा॥
माता सती का शरीर योगाग्नि में जलने लगा, चारों तरफ हाहाकार मच गया, भगवान शंकर के गंण यज्ञ को विध्वंश करना प्रारंभ कर दिए।
भगवान शंकर को पता चला, बाबा को क्रोध आ गया, अपनी जटा से एक केश निकाल कर धरती पर पटका, वीरभद्र प्रकट भए, शंकर भगवान ने वीरभद्र को कुपित करके भेजा।
वीरभद्र ने वहाँ जाकर यज्ञ विध्वंस कर डाला और सब देवताओं को यथोचित फल (दंड) दिया, दक्ष के सर को धड़ से अलग करके यज्ञ कुंड में भगवान शंकर के नाम की आहुति दे डाली।
।।ॐ नमः शिवाय।।
बाद में भगवान शंकर को बुलाकर यज्ञ की रक्षा करायी गई, और प्रजापति दक्ष को बकरे का सर लगाकर भगवान् शंकर ने उन्हें पुनर्जीवित किया।
।।ॐ नमः शिवाय।।
।।श्री शिवाय नमस्तुभयम।।
चोपाई:-
तहँ पुनि संभु समुझि पन आपन । बैठे बटतर करि कमलासन ॥
संकर सहज सरूपु सम्हारा । लागि समाधि अखंड अपारा ॥
अर्थात
वहाँ फिर शिवजी अपनी प्रतिज्ञा को याद करके बड़ के पेड़ के नीचे पद्मासन लगाकर बैठ गये। शिवजी ने अपना स्वाभाविक रूप सँभाला। उनकी अखण्ड और अपार समाधि लग गयी ॥४॥
दो०-
सती बसहिं कैलास तब अधिक सोचु मन माहिं ।
मरमु न कोऊ जान कछु जुग सम दिवस सिराहिं ॥५८॥
अर्थात
तब सतीजी कैलास पर रहने लगीं। उनके मनमें बड़ा दुःख था। इस रहस्य को कोई कुछ भी नहीं जानता था। उनका एक-एक दिन युग के समान बीत रहा था ॥५८॥
नित नव सोचु सती उर भारा । कब जैहउँ दुख सागर पारा ॥
मैं जो कीन्ह रघुपति अपमाना । पुनि पतिबचनु मृषा करि जाना ॥
अर्थात
सतीजी के हृदय में नित्य नया और भारी सोच हो रहा था कि मैं इस दु:ख-समुद्र के पार कब जाऊँगी। मैंने जो श्रीरघुनाथजी का अपमान किया और फिर पति के वचनों को झूठ जाना— ॥१॥
सो फलु मोहि बिधाताँ दीन्हा । जो कछु उचित रहा सोइ कीन्हा ॥
अब बिधि अस बूझिअ नहिं तोही । संकर बिमुख जिआवसि मोही ॥
अर्थात
उसका फल विधाता ने मुझको दिया, जो उचित था वही किया; परन्तु हे विधाता! अब तुझे यह उचित नहीं है जो शङ्कर से विमुख होने पर भी मुझे जिला रहा है ॥२॥
कहि न जाइ कछु हृदय गलानी । मन महुँ रामहि सुमिर सयानी ॥
जौं प्रभु दीनदयालु कहावा । आरति हरन बेद जसु गावा ॥
अर्थात
सतीजी के हृदय की ग्लानि कुछ कही नहीं जाती। बुद्धिमती सतीजी ने मन में श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण किया और कहा-हे प्रभो! यदि आप दीनदयालु कहलाते हैं और वेदों ने आपका यह यश गाया है कि आप दुःख को हरने वाले हैं, ॥३॥
तौ मैं बिनय करउँ कर जोरी । छूटउ बेगि देह यह मोरी ॥
जौं मोरें सिव चरन सनेहू । मन क्रम बचन सत्य ब्रतु एहू ॥
अर्थात
तो मैं हाथ जोड़कर विनती करती हूँ कि मेरी यह देह जल्दी छूट जाय। यदि मेरा शिवजी के चरणों में प्रेम है और मेरा यह [प्रेमका] व्रत मन, वचन और कर्म (आचरण) से सत्य है, ॥४॥
दो०-
तौ सबदरसी सुनिअ प्रभु करउ सो बेगि उपाइ ।
होइ मरनु जेहिं बिनहिं श्रम दुसह बिपत्ति बिहाइ ॥५९॥
अर्थात
तो हे सर्वदर्शी प्रभो ! सुनिये और शीघ्र वह उपाय कीजिये जिससे मेरा मरण हो और बिना ही परिश्रम यह [पति-परित्याग रूपी] असह्य विपत्ति दूर हो जाय ॥५९॥
एहि बिधि दुखित प्रजेसकुमारी । अकथनीय दारुन दुखु भारी ॥
बीतें संबत सहस सतासी । तजी समाधि संभु अबिनासी ॥
अर्थात
दक्षसुता सतीजी इस प्रकार बहुत दुःखित थीं, उनको इतना दारुण दुःख था कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। सत्तासी हजार वर्ष बीत जाने पर अविनाशी शिवजी ने समाधि खोली ॥१॥
राम नाम सिव सुमिरन लागे । जानेउ सती जगतपति जागे ॥
जाइ संभु पद बंदनु कीन्हा । सनमुख संकर आसनु दीन्हा ॥
अर्थात
शिवजी रामनाम का स्मरण करने लगे, तब सतीजी ने जाना कि अब जगत् के स्वामी (शिवजी) जागे। उन्होंने जाकर शिवजी के चरणों में प्रणाम किया। शिवजी ने उनको बैठने के लिये सामने आसन दिया ॥२॥
लगे कहन हरिकथा रसाला । दच्छ प्रजेस भए तेहि काला ॥
देखा बिधि बिचारि सब लायक । दच्छहि कीन्ह प्रजापति नायक ॥
अर्थात
शिवजी भगवान् हरि की रसमयी कथाएँ कहने लगे। उसी समय दक्ष प्रजापति हुए। ब्रह्माजी ने सब प्रकार से योग्य देख-समझकर दक्ष को प्रजापतियों का नायक बना दिया ॥३॥
बड़ अधिकार दच्छ जब पावा । अति अभिमानु हृदयँ तब आवा ॥
नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं । प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं ॥
अर्थात
जब दक्ष ने इतना बड़ा अधिकार पाया तब उनके हृदय में अत्यन्त अभिमान आ गया। जगत् में ऐसा कोई नहीं पैदा हुआ जिसको प्रभुता पाकर मद न हो ॥४॥
दो०-
दच्छ लिए मुनि बोलि सब करन लगे बड़ जाग ।
नेवते सादर सकल सुर जे पावत मख भाग ॥६०॥
अर्थात
दक्ष ने सब मुनियों को बुला लिया और वे बड़ा यज्ञ करने लगे। जो देवता यज्ञ का भाग पाते हैं, दक्षने उन सबको आदर सहित निमन्त्रित किया ॥६०॥
किंनर नाग सिद्ध गंधर्बा । बधुन्ह समेत चले सुर सर्बा ॥
बिष्नु बिरंचि महेसु बिहाई । चले सकल सुर जान बनाई ॥
अर्थात
[दक्षका निमन्त्रण पाकर] किन्नर, नाग, सिद्ध, गन्धर्व और सब देवता अपनी-अपनी स्त्रियों सहित चले। विष्णु, ब्रह्मा और महादेवजी को छोड़कर सभी देवता अपना-अपना विमान सजाकर चले ॥१॥
सती बिलोके ब्योम बिमाना । जात चले सुंदर बिधि नाना ॥
सुर सुंदरी करहिं कल गाना । सुनत श्रवन छूटहिं मुनि ध्याना ॥
अर्थात
सतीजी ने देखा अनेकों प्रकार के सुन्दर विमान आकाश में चले जा रहे हैं। देव-सुन्दरियाँ मधुर गान कर रही हैं, जिन्हें सुनकर मुनियों का ध्यान छूट जाता है ॥२॥
पूछेउ तब सिवँ कहेउ बखानी । पिता जग्य सुनि कछु हरषानी ॥
जौं महेसु मोहि आयसु देहीं । कछु दिन जाइ रहौं मिस एहीं ॥
अर्थात
सतीजी ने [विमानों में देवताओं के जाने का कारण] पूछा, तब शिवजी ने सब बातें बतलायीं। पिता के यज्ञ की बात सुनकर सती कुछ प्रसन्न हुईं और सोचने लगी कि यदि महादेव जी मुझे आज्ञा दें, तो इसी बहाने कुछ दिन पिता के घर जाकर रहूँ ॥३॥
पति परित्याग हृदयँ दुखु भारी । कहइ न निज अपराध बिचारी ॥
बोली सती मनोहर बानी । भय संकोच प्रेम रस सानी ॥
अर्थात
क्योंकि उनके हृदय में पति द्वारा त्यागी जाने का बड़ा भारी दुःख था, पर अपना अपराध , समझकर वे कुछ कहती न थीं। आखिर सतीजी भय, संकोच और प्रेम रस में सनी हुई मनोहर वाणी से बोलीं- ॥४॥
दो०-
पिता भवन उत्सव परम जौं प्रभु आयसु होइ ।
तो मैं जाउँ कृपायतन सादर देखन सोइ ॥६१॥
अर्थात
हे प्रभो ! मेरे पिता के घर बहुत बड़ा उत्सव है। यदि आपकी आज्ञा हो तो हे कृपाधाम! मैं आदर सहित उसे देखने जाऊँ ॥६१॥
कहेहु नीक मोरेहुँ मन भावा । यह अनुचित नहिं नेवत पठावा ॥
दच्छ सकल निज सुता बोलाईं । हमरें बयर तुम्हउ बिसराईं ॥
अर्थात
शिवजी ने कहा-तुमने बात तो अच्छी कही, यह मेरे मन को भी पसंद आयी। पर उन्होंने न्योता नहीं भेजा, यह अनुचित है। दक्ष ने अपनी सब लड़कियों को बुलाया है; किन्तु हमारे वैर के कारण उन्होंने तुमको भी भुला दिया ॥१॥
ब्रह्मसभाँ हम सन दुखु माना । तेहि तें अजहुँ करहिं अपमाना ॥
जौं बिनु बोलें जाहु भवानी । रहइ न सीलु सनेहु न कानी ॥
अर्थात
एक बार ब्रह्माकी सभामें हमसे अप्रसन्न हो गये थे, उसीसे वे अब भी हमारा अपमान करते हैं। हे भवानी ! जो तुम बिना बुलाये जाओगी तो न शील-स्नेह ही रहेगा और न मान-मर्यादा ही रहेगी ॥२॥
जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा । जाइअ बिनु बोलेहुँ न सँदेहा ॥
तदपि बिरोध मान जहँ कोई । तहाँ गएँ कल्यानु न होई ॥
अर्थात
यद्यपि इसमें सन्देह नहीं कि मित्र, स्वामी, पिता और गुरु के घर बिना बुलाये भी जाना चाहिये तो भी जहाँ कोई विरोध मानता हो, उसके घर जाने से कल्याण नहीं होता ॥३॥
भाँति अनेक संभु समुझावा । भावी बस न ग्यानु उर आवा ॥
कह प्रभु जाहु जो बिनहिं बोलाएँ । नहिं भलि बात हमारे भाएँ ॥
अर्थात
शिवजी ने बहुत प्रकार से समझाया, पर होनहार वश सती के हृदय में बोध नहीं हुआ। फिर शिवजी ने कहा कि यदि बिना बुलाये जाओगी, तो हमारी समझ में अच्छी बात न होगी ॥४॥
सती का दक्ष यज्ञ में जाना
दो०-
कहि देखा हर जतन बहु रहइ न दच्छकुमारि ।
दिए मुख्य गन संग तब बिदा कीन्ह त्रिपुरारि ॥६२॥
अर्थात
तब शिवजी ने बहुत प्रकार से कहकर देख लिया, किन्तु जब सती किसी प्रकार भी नहीं रुकी, त्रिपुरारि महादेव जी ने अपने मुख्य गणों को साथ देकर उनको विदा कर दिया ॥६२॥
पिता भवन जब गईं भवानी । दच्छ त्रास काहुँ न सनमानी ॥
सादर भलेहिं मिली एक माता । भगिनीं मिलीं बहुत मुसुकाता ॥१॥
अर्थात
भवानी जब पिता (दक्ष) के घर पहुँची, तब दक्ष के डर के मारे किसी ने उनकी आवभगत नहीं की, केवल एक माता भले ही आदर से मिली। बहिनें बहुत मुस्कुराती हुई मिलीं ॥१॥
दच्छ न कछु पूछी कुसलाता । सतिहि बिलोकी जरे सब गाता ॥
सतीं जाइ देखेउ तब जागा । कतहूँ न दीख संभु कर भागा॥२॥
अर्थात
दक्ष ने तो उनकी कुछ कुशल तक नहीं पूछी, सतीजी को देखकर उलटे उनके सारे अंग जल उठे। तब सती ने जाकर यज्ञ देखा तो वहाँ कहीं शिवजी का भाग दिखाई नहीं दिया ॥२॥
तब चित चढ़ेउ जो संकर कहेऊ। प्रभु अपमानु समुझि उर दहेऊ ॥
पाछिल दुखु न हृदयँ अस ब्यापा । जस यह भयउ महा परितापा ॥३॥
अर्थात
तब शिवजी ने जो कहा था, वह उनकी समझ में आया। स्वामी का अपमान समझकर सती का हृदय जल उठा। पिछला (पति परित्याग का) दुःख उनके हृदय में उतना नहीं व्यापा था, जितना महान् दुःख इस समय (पति अपमान के कारण) हुआ ॥३॥
जद्यपि जग दारुन दुख नाना । सब तें कठिन जाति अवमाना॥
समुझि सो सतिहि भयउ अति क्रोधा । बहु बिधि जननीं कीन्ह प्रबोधा ॥४॥
अर्थात
यद्यपि जगत में अनेक प्रकार के दारुण दुःख हैं, तथापि, जाति अपमान सबसे बढ़कर कठिन है। यह समझकर सतीजी को बड़ा क्रोध हो आया। माता ने उन्हें बहुत प्रकार से समझाया-बुझाया ॥४॥
पति के अपमान से दुःखी होकर सती का योगाग्नि से जल जाना, दक्ष यज्ञ विध्वंस
दो०-
सिव अपमानु न जाइ सहि हृदयँ न होइ प्रबोध ।
सकल सभहि हठि हटकि तब बोलीं बचन सक्रोध ॥६३॥
अर्थात
परन्तु उनसे शिवजी का अपमान सहा नहीं गया, इससे उनके हृदय में कुछ भी प्रबोध नहीं हुआ। तब वे सारी सभा को हठपूर्वक डाँटकर क्रोधभरे वचन बोलीं-॥६३॥
सुनहु सभासद सकल मुनिंदा । कही सुनी जिन्ह संकर निंदा ॥
सो फलु तुरत लहब सब काहूँ । भली भाँति पछिताब पिताहूँ ॥१॥
अर्थात
हे सभासदों और सब मुनीश्वरो! सुनो। जिन लोगों ने यहाँ शिवजी की निंदा की या सुनी है, उन सबको उसका फल तुरंत ही मिलेगा और मेरे पिता दक्ष भी भलीभाँति पछताएँगे ॥१॥
संत संभु श्रीपति अपबादा । सुनिअ जहाँ तहँ असि मरजादा ॥
काटिअ तासु जीभ जो बसाई । श्रवन मूदि न त चलिअ पराई ॥२॥
अर्थात
जहाँ संत, शिवजी और लक्ष्मीपति श्री विष्णु भगवान की निंदा सुनी जाए, वहाँ ऐसी मर्यादा है कि यदि अपना वश चले तो उस (निंदा करने वाले) की जीभ काट लें और नहीं तो कान मूँदकर वहाँ से भाग जाएँ ॥२॥
जगदातमा महेसु पुरारी । जगत जनक सब के हितकारी ॥
पिता मंदमति निंदत तेही । दच्छ सुक्र संभव यह देही ॥३॥
अर्थात
त्रिपुर दैत्य को मारने वाले भगवान महेश्वर सम्पूर्ण जगत की आत्मा हैं, वे जगत्पिता और सबका हित करने वाले हैं। मेरा मंदबुद्धि पिता उनकी निंदा करता है और मेरा यह शरीर दक्ष ही के वीर्य से उत्पन्न है॥३॥
तजिहउँ तुरत देह तेहि हेतू । उर धरि चंद्रमौलि बृषकेतू ॥
अस कहि जोग अगिनि तनु जारा । भयउ सकल मख हाहाकारा ॥४॥
अर्थात
इसलिए चन्द्रमा को ललाट पर धारण करने वाले वृषकेतु शिवजी को हृदय में धारण करके मैं इस शरीर को तुरंत ही त्याग दूँगी। ऐसा कहकर सतीजी ने योगाग्नि में अपना शरीर भस्म कर डाला। सारी यज्ञशाला में हाहाकार मच गया ॥४॥
दो०-
सती मरनु सुनि संभु गन लगे करन मख खीस ।
जग्य बिधंस बिलोकि भृगु रच्छा कीन्हि मुनीस ॥६४॥
अर्थात
सती का मरण सुनकर शिवजी के गण यज्ञ विध्वंस करने लगे। यज्ञ विध्वंस होते देखकर मुनीश्वर भृगुजी ने उसकी रक्षा की ॥६४॥
समाचार सब संकर पाए । बीरभद्रु करि कोप पठाए ॥
जग्य बिधंस जाइ तिन्ह कीन्हा । सकल सुरन्ह बिधिवत फलु दीन्हा ॥१॥
अर्थात
ये सब समाचार शिवजी को मिले, तब उन्होंने क्रोध करके वीरभद्र को भेजा। उन्होंने वहाँ जाकर यज्ञ विध्वंस कर डाला और सब देवताओं को यथोचित फल (दंड) दिया ॥१॥
भै जगबिदित दच्छ गति सोई । जसि कछु संभु बिमुख कै होई ॥
यह इतिहास सकल जग जानी । ताते मैं संछेप बखानी ॥२॥
अर्थात
दक्ष की जगत्प्रसिद्ध वही गति हुई, जो शिवद्रोही की हुआ करती है। यह इतिहास सारा संसार जानता है, इसलिए मैंने संक्षेप में वर्णन किया ॥२॥
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