सत्यं शिवं सुंदरम् — तुलसीदास और रामचरितमानस की दिव्यता की गाथा

चित्र
सत्यं शिवं सुंदरम् — तुलसीदास और रामचरितमानस की दिव्यता की गाथा  यह कथा है उस पवित्र ग्रंथ की, जिसे "मानस" कहा गया — अर्थात वह जो मन से निकला, और हृदय से रचा गया। यह कथा है उस अनन्य भक्त तुलसीदास की, जिन्होंने भगवान श्रीराम के जीवनचरित्र को आमजन की भाषा में प्रस्तुत किया, ताकि रामकथा केवल विद्वानों और ब्राह्मणों तक सीमित न रह जाए, बल्कि हर जन तक पहुँचे। और ये उस समय का एक क्रांतिकारी कदम था। गोस्वामी तुलसीदास जी ने जिस रामचरितमानस की रचना की, वह संस्कृत की जगह अवधी भाषा में लिखी गई थी — जो सामान्य जनता की बोली थी। तुलसीदास जी का उद्देश्य था कि श्रीराम की महिमा हर आम जन तक पहुँचे, ना कि केवल विद्वानों और ब्राह्मणों तक सीमित रहे। लेकिन यही बात कुछ विद्वानों और ब्राह्मणों को स्वीकार्य नहीं थी। उनका कहना था: “रामकथा जैसी पवित्र गाथा केवल देवभाषा संस्कृत में ही कही जा सकती है। अवधी जैसी लोकभाषा में इसका वर्णन करना वेदों और पुराणों का अपमान है।” इसलिए काशी के विद्वानों और ब्राह्मणों ने रामचरितमानस को स्वीकार करने से मना कर दिया। उनमें भय था कि यह लोकभाषा में लिखा गया ग्रंथ कहीं धार...

Hindi Me Ramayan Chaupai

 

hindi-me-ramayan-chaupai
Image Source - Google | Image by - Gita Press 



Table 1
रचयिता
ग्रंथ 
पात्र
प्रकाशक
टीकाकार
भाषा
शैली
काण्ड
 गोस्वामी तुलसीदास जी  श्रीरामचरितमानस  श्रीराम लक्ष्मण सीता हनुमान, रावण इत्यादि गीता प्रेस गोरखपुर   श्री हनुमानप्रसाद पोद्दार  संस्कृत, अवधी  सोरठा, चोपाई, दोहा और छंद  बालकाण्ड


Ramayan Ki Chaupai Hindi Me रामायण की चौपाई हिंदी में | Ramayan Chaupai Hindi Mein |  Ramayan Chaupai Hindi Me


Hindi Me Ramayan Chaupai

श्रीरामचरितमानस जी में श्रीरामजी की कथा क्या करती है?
पहला काम मंगल करनि श्रीरामचरितमानस जी  की कथा जीव का मंगल करती है, मंगल करेगी तो अमंगल को भगाना नहीं पड़ेगा, अमंगल अपने आप समाप्त हो जायेगा।
कैसे समाप्त होगा?-
  कलिमल हरनि तुलसी कथा रघुनाथ की,

पूज्यपाद तुलसीदास जी महाराज कहते हैं रघुनाथ जी की कथा जीव का मंगल करती है और जीवन के कलिमल (कलिमश) का हरण करती है।

मल, यानी विकार ये विकार क्या हैं? काम, क्रोध, लोभ,

काम, क्रोध और लोभ की जननी है।

यदि आपकी कामना पूर्ण हो गई तो लोभ बढे़गा और कामना पूर्ण न हुई तो क्रोध बढे़गा।
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर (ईर्ष्या) ये विकार हैं।

जो श्रीरामजी की कथा के आश्रय में आ जाता है, ये मानस जी की कथा धीरे-धीरे उस जीव के इस विकार का हरण कर लेती है।

मंगल करनि कलिमल हरनि तुलसी कथा रघुनाथ की। 


गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज कहते हैं मैं कवि नहीं हूॅं, कविता लिखने का मेरे भीतर एक भी गुंण नहीं है मुझे कविता लिखने का ढंग नहीं आता है।

जिस प्रकार गंगा जी की धारा टेढ़ी-मेढ़ी होकर निकली है उसी प्रकार मेरी ये कविता भी टेढ़ी-मेढ़ी है, मुझे लिखने का ढंग नहीं आता।
 कितने भी मोड़ आने पर जिस प्रकार गंगा अपवित्र नहीं हुई उसी प्रकार मुझे लिखने का ढंग भले न हो ये मेरी कविता अपवित्र नहीं हो सकती, ये परम पुनीत कविता है।

गति कूर कबिता सरित की ज्यों सरित पावन पाथ की

जिस प्रकार परम पुनीत सरिता यानी गंगा टेढ़ी-मेढ़ी है उसी प्रकार मेरी ये कविता भी टेढ़ी-मेढ़ी है, लेकिन ये परम पुनीत है।
परम पुनीत क्यों है?

एहि महँ रघुपति नाम उदारा। अति पावन पुरान श्रुति सारा॥
मंगल भवन अमंगल हारी। उमा सहित जेहि जपत पुरारी॥

एहि महँ यानी इसके अंदर रघुपति नाम उदारा और कैसा नाम अति पावन पुरान श्रुति सारा

गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज कहते हैं इसके प्रत्येक चोपाई में भगवान का नाम राम समाहित है।
मानस के प्रत्येक चोपाई में आपको राम (र, आ की मात्रा और म) मिलेगा केवल एक चौपाई में राम नहीं है-
झूठइ लेना झूठइ देना । झूठइ भोजन झूठ चबेना।

जहां झूठ समाहित है वहां राम जी नहीं मिलेंगे आपको।


Ramayan Chaupai Hindi Me

hindi-me-ramayan-chaupai
Image Source - Google | Image by - Gita Press 



रामरूप से जीव मात्र की वन्दना

दो०-
ग्रह भेषज जल पवन पट पाइ कुजोग सुजोग ।
होहिं कुबस्तु सुबस्तु जग लखहिं सुलच्छन लोग ।।७ (क)।।
अर्थात
ग्रह, ओषधि,जल, वायु और वस्त्र-ये सब भी कुसंग और सुसंग पाकर संसार में बुरे और भले पदार्थ हो जाते हैं।
चतुर एवं विचारशील पुरुष ही इस बात को जान पाते हैं ।।७ (क)।।

सम प्रकास तम पाख दुहुॅं नाम भेद बिधि कीन्ह ।
ससि सोषक पोषक समुझि जग जस अपजस दीन्ह ।।७ (ख)।।
अर्थात
महीने के दोनों पखवाड़े में उजियाल और अँधेरा समान ही रहता है, परन्तु विधाता ने इनके नाम में भेद कर दिया है (एक का नाम शुक्ल पक्ष और दूसरे का नाम कृष्ण पक्ष रख दिया)।
एक को चन्द्रमा का बढ़ाने वाला और दूसरे को उसका घटने वाला समझकर जगत् ने एक को सुयश और दूसरे को अपयश दे दिया ।।७ (ख)।।

जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि ।
बंदउॅं सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि ।।७ (ग)।।
अर्थात
जगत् में जितने जड़ चेतन जीव हैं, सबको राम मय जानकर मैं उन सबके चरण कमलों की सदा दोनों हाथ जोड़कर वन्दना करता हूॅं ।।७ (ग)।।

देव दनुज नर नाग खग प्रेत पितर गंधर्ब ।
बंदउॅं किंनर रजनिचर कृपा करहु अब सर्ब ।।७ (घ)।।
अर्थात
देवता, दैत्य, मनुष्य, नाग, पक्षी, प्रेत, पितर, गंधर्ब, किन्नर और निशाचर सबको मैं प्रणाम करता हूॅं।
अब सब मुझपर कृपा कीजिये ।।७ (घ)।।


तुलसीदास जी की दीनता और राम भक्तिमयी कविता की महिमा


आकर चारि लाख चौरासी । जाति जीव जल थल नभ बासी ।।
सीय राममय सब जग जानी ‌। करउॅं प्रनाम जोरि जुग पानी ।।
अर्थात
चौरासी लाख योनियों में चार प्रकार के (स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, जरायुज) जीव जल, पृथ्वी और आकाश में रहते हैं, उन सबसे भरे हुए इस सारे जगत् को श्रीसीताराम मय जानकर मैं दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूॅं ।।१।।

जानि कृपाकर किंकर मोहू । सब मिलि करहु छाड़ि छल छोहू ।।
निज बुधि बल भरोस मोहि नाहीं । तातें बिनय करउॅं सब पाहीं ।।
अर्थात
मुझको अपना दास जानकर कृपा की खान आप सब लोग मिलकर छल छोड़ कर कृपा कीजिये।
मुझे अपने बुद्धि-बल का भरोसा नहीं है, इसीलिए मैं सबसे विनती करता हूॅं ।।२।।

करन चहउॅं रघुपति गुन गाहा । लघु मति मोरि चरित अवगाहा ।।
सूझ न एकउ अंग उपाऊ । मन मति रंक मनोरथ राऊ ।।
अर्थात
मैं श्रीरघुनाथजी के गुणों का वर्णन करना चाहता हूॅं, परन्तु मेरी बुद्धि छोटी है और श्रीरामजी का चरित्र अथाह है।
इसके लिये मुझे उपाय का एक भी अंग अर्थात् कुछ (लेशमात्र) भी उपाय नहीं सूझता।
मेरे मन और बुद्धि कंगाल हैं, किन्तु मनोरथ राजा है ।।३।।

मति अति नीच ऊॅंचि रुचि आछी । चहिअ अमिअ जग जुरइ न छाछी ।।
छमिहहिं सज्जन मोरि ढिठाई । सुनिहहिं बालबचन मन लाई ।।
अर्थात
मेरी बुद्धि तो अत्यन्त नीची है और चाह बड़ी ऊॅंची है; चाह तो अमृत पाने की है, पर जगत् में जुड़ती छाछ भी नहीं।
सज्जन मेरी ढिठाई क्षमा करेंगे और मेरे बाल वचनों को मन लगाकर (प्रेम पूर्वक) सुनेंगे ।।४।।

जौं बालक कह तोतरि बाता । सुनहिं मुदित मन पितु अरु माता ।।
हॅंसिहहिं कूर कुटिल कुबिचारी । जे पर दूषन भूषनधारी ।।
अर्थात
जैसे बालक जब तोतले वचन बोलता है तो उसके माता-पिता उन्हें प्रसन्न मनसे सुनते हैं।
किन्तु क्रूर, कुटिल और बुरे विचार वाले लोग जो दूसरों के दोषों को ही भूषण रूप से धारण किये रहते हैं (अर्थात् जिन्हें पराये दोष ही प्यारे लगते हैं), हॅंसेंगे ।।५।।

निज कबित्त केहि लाग न नीका । सरस होउ अथवा अति फीका ।।
जे पर भनिति सुनत हरषाहीं । ते बर पुरुष बहुत जग नाहीं ।‌।
अर्थात
रसीली हो या अत्यंत फीकी, अपनी कविता किसे अच्छी नहीं लगती? किन्तु जो दूसरे की रचना को सुनकर हर्षित होते हैं, ऐसे उत्तम पुरुष जगत् में बहुत नहीं हैं, ।।६।।

जग बहु नर सर सरि सम भाई । जे निज बाढ़ि बढ़हिं जल पाई ।।
सज्जन सकृत सिंधु सम कोई । देखि पूर बिधु बाढ़इ जोई ।।
अर्थात
हे भाई ! जगत् में तालाबों और नदियों के समान मनुष्य ही अधिक हैं, जो जल पाकर अपनी ही बाढ़ से बढ़ते हैं (अर्थात् अपनी ही उन्नति से प्रसन्न होते हैं)।
समुद्र-सा तो कोई एक विरला ही सज्जन होता है जो चन्द्रमा को पूर्ण देखकर (दूसरों का उत्कर्ष देखकर) उमड़ पड़ता है ।।७।।

दो०-
भाग छोट अभिलाषु बड़ करउॅं एक बिस्वास ।
पैहहिं सुख सुनि सुजन सब खल करिहहिं उपहास ।।८।।
अर्थात
मेरा भाग्य छोटा है और इच्छा बहुत बड़ी है, परन्तु मुझे एक विश्वास है कि इसे सुनकर सज्जन सभी सुख पालेंगे और दुष्ट हॅंसी उड़ावेंगे ।।८।।

खल परिहास होइ हित मोरा । काक कहहिं कलकंठ कठोरा ।।
हंसहि बक दादुर चातकही । हॅंसहिं मलिन खल बिमल बतकही ।।
अर्थात
किन्तु दुष्टों के हॅंसने से मेरा हित ही होगा। मधुर कण्ठ वाली कोयल को कौए तो कठोर ही कहा करते हैं।
जैसे बगुले हंसको और मेढक पपीहे को हॅंसते हैं, वैसे ही मलिन मन वाले दुष्ट निर्मल वाणी को हॅंसते हैं ।।१।।

कबित रसिक न राम पद नेहू । तिन्ह कहॅं सुखद हास रस एहू ।।
भाषा भनिति भोरि मति मोरी । हॅंसिबे जोग हॅंसें नहिं खोरी ।।
अर्थात
जो न तो कविता के रसिक हैं और न जिनका श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में प्रेम है, उनके लिये भी यह कविता सुखद हास्य रस का काम देगी। प्रथम तो यह भाषा की रचना है, दूसरे मेरी बुद्धि भोली है; इससे यह हॅंसने योग्य ही है, हॅंसने में उन्हें कोई दोष नहीं ।।२।।

प्रभु पद प्रीति न सामुझि नीकी । तिन्हहि कथा सुनि लागिहि फीकी ।।
हरि हर पद रति मति न कुतरकी । तिन्ह कहुॅं मधुर कथा रघुबर की ।।
अर्थात
जिन्हें न तो प्रभु के चरणों में प्रेम है और न अच्छी समझ ही है, उनको यह कथा सुनने में फीकी लगेगी।
जिनकी श्रीहरि (भगवान विष्णु) और श्रीहर (भगवान शिव) के चरणों में प्रीति है और जिनकी बुद्धि कुतर्क करने वाली नहीं है [ जो श्रीहरि-हर में भेद की या ऊॅंच-नीच की कल्पना नहीं करते ], उन्हें श्रीरघुनाथजी की यह कथा मीठी लगेगी ।।३।।

राम भगति भूषित जियॅं जानी । सुनिहहिं सुजन सराहि सुबानी ।।
कबि न होउॅं नहिं बचन प्रबीनू । सकल कला सब बिद्या हीनू ।।
अर्थात
सज्जनगण इस कथा को अपने जी में श्रीरामजी की भक्ति से भूषित जानकर सुन्दर वाणी से सराहना करते हुए सुनेंगे।
मैं न तो कवि हूॅं, न वाक्य रचना में ही कुशल हूॅं, मैं तो सब कलाओं तथा सब विद्याओं से रहित हूॅं ।।४।।

आखर अरथ अलंकृति नाना । छंद प्रबंध अनेक बिधाना ।।
भाव भेद रस भेद अपारा । कबित दोष गुन बिबिध प्रकारा ।।
अर्थात
नाना प्रकार के अक्षर, अर्थ और अलंकार, अनेक प्रकार की छन्द रचना, भावों और रसों के अपार भेद और कविता के भाॅंति-भाॅंति के गुण दोष होते हैं ।।५।।

कबित बिबेक एक नहिं मोरें । सत्य कहउॅं लिखि कागद कोरें ‌‌।।

अर्थात इनमें से काव्य सम्बंधि एक भी बात का ज्ञान मुझमें नहीं है, यह मैं कोरे कागज पर लिखकर [ शपथ पूर्वक ] सत्य-सत्य कहता हूॅं ।।६।।

दो०-
भनिति मोर सब गुन रहित बिस्व बिदित गुन एक ।
सो बिचारि सुनिहहिं सुमित जिन्ह कें बिमल बिबेक ।।९।।
अर्थात

मेरी रचना सब गुणों से रहित है; इसमें बस जगत्प्रसिद्ध एक गुण है।
उसे विचार कर अच्छी बुद्धि वाले पुरुष, जिनके निर्मल ज्ञान है, इसको सुनेंगे ।।९।।

एहि महॅं रघुपति नाम उदारा । अति पावन पुरान श्रुति सारा ।।
मंगल भवन अमंगल हारी । उमा सहित जेहि जपत पुरारी ।।
अर्थात
इसमें श्रीरघुनाथजी का उदार नाम है, जो अत्यंत पवित्र है, वेद-पुराणों का सार है, कल्याण का भवन है और अमंगलों को हरने वाला है, जिसे पार्वती जी सहित भगवान शिवजी सदा जपा करते हैं ।।१।।

भनिति बिचित्र सुकबि कृत जोऊ । राम नाम बिनु सोह न सोऊ ।।
बिधुबदनी सब भाॅंति सॅंवारी । सोह न बसन बिना बर नारी ।।
अर्थात
जो अच्छे कवि के द्वारा रची हुई बड़ी अनूठी कविता है, वह भी राम नाम के बिना शोभा नहीं पाती।
जैसे चन्द्रमा के समान मुख वाली सुन्दर स्त्री सब प्रकार से सुसज्जित होने पर भी वस्त्र के बिना शोभा नहीं देती ।।२।।

सब गुन रहित कुकबि कृत बानी । राम नाम जस अंकित जानी ‌‌।।
सादर कहहिं सुनहिं बुध ताही । मधुकर सरिस संत गुनग्राही ।।
अर्थात
इसके विपरित, कुकवि की रची हुई सब गुणों से रहित कविता को भी, राम के नाम एवं यश से अंकित जानकर, बुद्धिमान् लोग आदर पूर्वक कहते और सुनते हैं; क्योंकि संतजन भौंरे की भाॅंति गुण ही को ग्रहण करने वाले होते हैं ।।३।।

जदपि कबित रस एकउ नाहीं । राम प्रताप प्रगट एहि माहीं ।।
सोइ भरोस मोरें मन आवा । केहिं न सुसंग बड़प्पन पावा ।।
अर्थात
यद्यपि मेरी इस रचना में कविता का एक भी रस नहीं है, तथापि इसमें श्रीरामजी का प्रताप प्रकट है।
मेरे मन में यही भरोसा है। भले संग से भला, किसने बड़प्पन नहीं पाया? ।।४।।

धूमउ तजइ सहज करुआई । अगरु प्रसंग सुगंध बसाई।।
भनिति भदेस बस्तु भलि बरनी । राम कथा जग मंगल करनी ।।

अर्थात
धुआँ भी अगर के संग से सुगन्धित होकर अपने स्वाभाविक कड़ुवेपन को छोड़ देता है।
मेरी कविता अवश्य भद्दी है, परन्तु इसमें जगत् का कल्याण करने वाली राम कथा रूपी उत्तम वस्तु का वर्णन किया गया है [ इससे यह भी अच्छी ही समझी जायेगी ] ।।५।।

छं०-
मंगल करनि कलिमलहरनि तुलसी कथा रघुनाथ की ।
गति कूर कबिता सरित की ज्यों सरित पावन पाथ की ।।
प्रभु सुजस संगति भनिति भलि होइहि सुजन मन भावनी ।
भव अंग भूति मसान की सुमिरत सुहावनि पावनी ।।
अर्थात
तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीरघुनाथजी की कथा कल्याण करने वाली और कलियुग के पापों को हरने वाली है।
मेरी इस भद्दी कविता रूपी नदी की चाल पवित्र जल वाली (गंगा जी) की चाल की भाॅंति टेढ़ी है।
प्रभु श्रीरघुनाथजी के सुन्दर यश के संग से यह कविता सुन्दर तथा सज्जनों के मन को भाने वाली हो जायेगी।
श्मशान की अपवित्र राख भी श्रीमहादेवजी के अंग के संग से सुहावनी लगती है और स्मरण करते ही पवित्र करने वाली होती है।

दो०-
प्रिय लागिहि अति सबहि मम भनिति राम जस संग।
दारु बिचारु कि करइ कोउ बंदिअ मलय प्रसंग ।।१० (क)।।

श्रीरामजी के यश के संग से मेरी कविता सभी को अत्यन्त प्रिय लगेगी, जैसे मलय पर्वत के संग से काष्ठ मात्र [ चन्दन बनकर ] वन्दनीय हो जाता है, फिर क्या कोई काठ [ की तुच्छता ] का विचार करता है? ।।१० (क)।।

स्याम सुरभि पय बिसद अति गुनद करहिं सब पान ।
गिरा ग्राम्य सिय राम जस गावहिं सुनहिं सुजान ।।१० (ख)।।
अर्थात
श्यामा गौ काली होने पर भी उसका दूध उज्ज्वल और बहुत गुणकारी होता है। यही समझकर सब लोग उसे पीते हैं।
इसी तरह गॅंवारू भाषा में होने पर भी श्रीसीता-रामजी के यश को बुद्धिमान् लोग बड़े चाव से गाते और सुनते हैं ।।१० (ख)।।

मनि मानिक मुकुता छबि जैसी । अहि गिरि गज सिर सोह न तैसी ।।
नृप किरीट तरुनी तनु पाई । लहहिं सकल सोभा अधिकाई ।।
अर्थात
मणि, माणिक और मोती की जैसी सुन्दर छबि है, वह साॅंप, पर्वत और हाथी के मस्तक पर वैसी शोभा नहीं पाती।
राजा के मुकुट और नवयुवती स्त्री के शरीर को पाकर ही ये सब अधिक शोभा को प्राप्त होते हैं ।।१।।

तैसेहिं सुकबि कबित बुध कहहिं । उपजहिं अनत अनत छबि लहहिं ।।
भगति हेतु बिधि भवन बिहाई । सुमिरत सारद आवति धाई ।।
अर्थात
इसी तरह, बुद्धिमान् लोग कहते हैं कि सुकवि की कविता भी उत्पन्न और कहीं होती है और शोभा अन्यत्र कहीं पाती है (अर्थात् कवि की वाणी से उत्पन्न हुई कविता वहाॅं शोभा पाती है जहाॅं उसका विचार, प्रचार तथा उसमें कथित आदर्श का ग्रहण और अनुसरण होता है)।
कवि के स्मरण करते ही उसकी भक्ति के कारण सरस्वती जी ब्रह्मलोक को छोड़कर दौड़ी आती हैं ।।२।।

राम चरित सर बिनु अन्हवाएँ । सो श्रम जाइ न कोटि उपाएँ ।।
कबि कोबिद अस हृदय बिचारी । गावहिं हरि जस कलि मल हारी ।।
अर्थात
सरस्वतीजी की दौड़ी आने की वह थकावट रामचरित रूपी सरोवर में उन्हें नहलाये बिना दूसरे करोड़ों उपायों से भी दूर नहीं होती।
कवि और पण्डित अपने हृदय में ऐसा विचार कर कलियुग के पापों को हरने वाले श्रीहरि के यश का ही गान करते हैं ।।३।।

कीन्हें प्राकृत जन गुन गाना । सिर धुनि गिरा लगत पछिताना ।।
हृदय सिंधु मति सीप समाना । स्वाति सारदा कहहिं सुजाना ।।
अर्थात
संसारी मनुष्यों का गुणगान करने से सरस्वतीजी सिर धुनकर पछताने लगती हैं [ कि मैं क्यों इसके बुलाने पर आयी ] बुद्धिमान् लोग हृदय को समुद्र, बुद्धि को सीप और सरस्वती को स्वाति नक्षत्र के समान कहते हैं ।।४।।

जौं बरषइ बर बारि बिचारू । होहिं कबित मुकुतामनि चारू ।।
अर्थात
इसमें यदि श्रेष्ठ विचार रूपी जल बरसाता है तो मुक्तामणि के समान सुन्दर कविता होती है ।।५।।

दो०-
जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग ।
पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग।।
अर्थात
उन कविता रूपी मुक्ता मणियों को युक्ति से बेधकर फिर रामचरित्र रूपी सुंदर तागे में पिरो कर सज्जन लोग अपने निर्मल हृदय में धारण करते हैं, जिससे अत्यंत अनुराग रूपी शोभा होती है (वे आत्यन्तिक प्रेम को प्राप्त होते हैं) ।।११।।

जे जनमे कलिकाल कराला । करतब बायस बेष मराला ।।
चलत कुपंथ बेद मग छाॅंड़े । कपट कलेवर कलि मल भाॅंड़े ।।
अर्थात
जो कराल कलयुग में जन्में हैं, जिनकी करनी कौए के समान है और वेष हंस का-सा है, जो वेद मार्ग को छोड़कर कुमार्ग पर चलते हैं, जो कपट की मूर्ति और कलयुग के पापों के भाॅंड़े हैं ।।१।।

बंचक भगत कहाइ राम के । किंकर कंचन कोह काम के ।।
तिन्ह महॅं प्रथम रेख जग मोरी । धींग धरमध्वज धधंक धोरी ।।
अर्थात
जो श्रीरामजी के भक्त कहलाकर लोगों को ठगते हैं, जो धन (लोभ), क्रोध और काम के गुलाम हैं और जो धींगाधींगी करने वाले, धर्मध्वजी (धर्म की झूठी ध्वजा फहराने वाले-दम्भी) और कपट के धन्धों का बोझ ढोने वाले हैं, संसार के ऐसे लोगों में सबसे पहले मेरी गिनती है ।।२।।

जौं अपने अवगुन सब कहऊॅं । बाढ़इ कथा पार नहिं लहऊॅं ।।
ताते मैं अति अलप बखाने । थोरे महुॅं जानिहहिं सयाने।।
अर्थात
यदि मैं अपने सब अवगुणों को कहने लगूॅं तो कथा बहुत बढ़ जाएगी और मैं पार नहीं पाऊॅंगा।
इससे मैंने बहुत कम अवगुणों का वर्णन किया है। बुद्धिमान् लोग थोड़े ही में समझ लेंगे ।।३।।

समुझि बिबिधि बिधि बिनती मोरी । कोउ न कथा सुनि देइहि खोरी ।।
एतेहु पर करिहहिं जे असंका । मोहि ते अधिक ते जड़ मति रंका ।।
अर्थात
मेरी अनेकों प्रकार की विनती को समझकर, कोई भी इस कथा को सुनकर दोष नहीं देगा।
इतने पर भी जो शंका करेंगे, वे तो मुझसे भी अधिक मूर्ख और बुद्धि के कंगाल हैं ।।४।।

कबि न होउॅं नहिं चतुर कहावउॅं । मति अनुरूप राम गुन गावउॅं ।।
कहॅं रघुपति के चरित अपारा । कहॅं मति मोरी निरत संसारा ।।
अर्थात
मैं न तो कवि हूॅं, न चतुर कहलाता हूॅं; अपनी बुद्धि के अनुसार श्रीरामजी के गुण गाता हूॅं।
कहाॅं तो श्रीरघुनाथजी के अपार चरित्र, कहाॅं संसार में आसक्त मेरी बुद्धि! ।।५।।

जेहिं मारुत गिरि मेरु उड़ाहीं । कहहु तूल केहि लेखे माहीं ।।
समुझत अमित राम प्रभुताई । करत कथा मन अति कदराई ।।
अर्थात
जिस हवा से सुमेरु-जैसे पहाड़ उड़ जाते हैं, कहिये तो, उसके सामने रूई किस गिनती में है।
श्रीरामजी की असीम प्रभुता को समझकर कथा रचने में मेरा मन बहुत हिचकता है- ।।६।।

दो०-
सारद सेस महेस बिधि आगम निगम पुरान ।
नेति नेति कहि जासु गुन करहिं निरंतर गान ।।१२।।
अर्थात
सरस्वतीजी, शेषजी, शिवजी, ब्रह्माजी, शास्त्र, वेद और पुराण-ये सब 'नेति-नेति' कहकर (पार नहीं पाकर 'ऐसा नहीं', 'ऐसा नहीं' कहते हुए) सदा जिनका गुणगान किया करते हैं ।।१२।।

सब जानत प्रभु प्रभुता सोई । तदपि कहें बिनु रहा न कोई ।।
तहाॅं बेद अस कारन राखा । भजन प्रभाउ भाॅंति बहु भाषा ।।
अर्थात
यद्यपि प्रभु श्रीरामचन्द्रजी की प्रभुता को सब ऐसी (अकथनीय) ही जानते हैं तथापि कहे बिना कोई नहीं रहा।
इसमें वेद ने ऐसा कारण बताया है कि भजन का प्रभाव बहुत तरह से कहा गया है।
(अर्थात भगवान् की महिमा का पूरा वर्णन तो कोई कर नहीं सकता; परंतु जिससे जितना बन पड़े उतना भगवान् का गुणगान करना चाहिए।
क्योंकि भगवान् के गुणगान रूपी भजन का प्रभाव बहुत ही अनोखा है, उसका नाना प्रकार से शास्त्रों में वर्णन है।
थोड़ा-सा भी भगवान् का भजन मनुष्य को सहज ही भवसागर से तार देता है) ।।१।।

एक अनीह अरूप अनामा । अज सच्चिदाननंद पर धामा ।।
ब्यापक बिस्वरूप भगवाना । तेहिं धरि देह चरित कृत नाना ।।
अर्थात
जो परमेश्वर एक हैं, जिनके कोई इच्छा नहीं है, जिनका कोई रूप और नाम नहीं है, जो अजन्मा, सच्चिदानन्द और परमधाम हैं और जो सबमें व्यापक एवं विश्वरूप हैं, उन्हीं भगवान् ने दिव्य शरीर धारण करके नाना प्रकार की लीला की है ।।२।।

सो केवल भगतन हित लागी । परम कृपाल प्रनत अनुरागी ।।
जेहि जन पर ममता अति छोहू । जेहिं करुना करि कीन्ह न कोहू ।।
अर्थात
वह लीला केवल भक्तों के हित के लिए ही है; क्योंकि भगवान् परम कृपालु हैं और शरणागत के बड़े प्रेमी हैं।
जिनकी भक्तों पर बड़ी ममता और कृपा है, जिन्होंने एक बार जिसपर कृपा कर दी, उसपर फिर कभी क्रोध नहीं किया ।।३।।

गई बहोर गरीब नेवाजू । सरल सबल साहिब रघुराजू ।।
बुध बरनहिं हरि जस अस जानी । करहिं पुनीत सुफल निज बानी ।।
अर्थात
वे प्रभु श्रीरघुनाथजी गयी हुई वस्तु को फिर प्राप्त कराने वाले, गरीब निवाज (दीनबन्धु), सरल स्वभाव, सर्वशक्तिमान् और सबके स्वामी हैं।
यही समझकर बुद्धिमान् लोग उन श्रीहरि का यश वर्णन करके अपनी वाणी को पवित्र और उत्तम फलि (मोक्ष और दुर्लभ भगवत्प्रेम) देने वाली बनाते हैं ।।४।।

तेहिं बल मैं रघुपति गुन गाथा । कहिहउॅं नाइ राम पद माथा ।।
मुनिन्ह प्रथम हरि कीरति गाई । तेहिं मग चलत सुगम मोहि भाई ।।
अर्थात
उसी बल से (महिमा का यथार्थ वर्णन नहीं, परन्तु महान् फल देने वाला भजन समझकर भगवत्कृपा के बल पर ही) मैं श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में सिर नवाकर श्रीरघुनाथजी के गुणों की कथा कहूॅंगा।
इसी विचार से [ वाल्मीकि, व्यास आदि ] मुनियों ने पहले हरि की कीर्ति गायी है, भाई! उसी मार्ग पर चलना मेरे लिये सुगम होगा ।।५।।

दो०-
अति अपार जे सरित बर जौं नृप सेतु कराहिं ।
चढ़ि पिपीलिकउ परम लघु बिनु श्रम पारहि जाहिं ।।१३।।
अर्थात
जो अत्यंत बड़ी श्रेष्ठ नदियाॅं हैं, यदि राजा उन पर पुल बाॅंध देता है तो अत्यन्त छोटी चीटियाॅं भी उन पर चढ़कर बिना ही परिश्रम के पार चली जाती हैं [ इसी प्रकार मुनियों के वर्णन के सहारे मैं भी श्रीराम चरित्र का वर्णन सहज ही कर सकूंगा ] ।।१३।।




पोस्ट आपको कैसी लगी कमेंट के माध्यम से हमें जरूर बताएं।


आगे पढ़ें 




ये भी पढ़ें

Sant Ki Mahima | Sant Ka Swaroop  

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Ramcharitmanas Ki Chaupai Bal Kand

Vidhi Ka Vidhan Kya Hota Hai | Vidhi Ka Vidhan

Shiv Ki Krodhagni Se Kamdev Huye Bhasham