सत्यं शिवं सुंदरम् — तुलसीदास और रामचरितमानस की दिव्यता की गाथा

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सत्यं शिवं सुंदरम् — तुलसीदास और रामचरितमानस की दिव्यता की गाथा  यह कथा है उस पवित्र ग्रंथ की, जिसे "मानस" कहा गया — अर्थात वह जो मन से निकला, और हृदय से रचा गया। यह कथा है उस अनन्य भक्त तुलसीदास की, जिन्होंने भगवान श्रीराम के जीवनचरित्र को आमजन की भाषा में प्रस्तुत किया, ताकि रामकथा केवल विद्वानों और ब्राह्मणों तक सीमित न रह जाए, बल्कि हर जन तक पहुँचे। और ये उस समय का एक क्रांतिकारी कदम था। गोस्वामी तुलसीदास जी ने जिस रामचरितमानस की रचना की, वह संस्कृत की जगह अवधी भाषा में लिखी गई थी — जो सामान्य जनता की बोली थी। तुलसीदास जी का उद्देश्य था कि श्रीराम की महिमा हर आम जन तक पहुँचे, ना कि केवल विद्वानों और ब्राह्मणों तक सीमित रहे। लेकिन यही बात कुछ विद्वानों और ब्राह्मणों को स्वीकार्य नहीं थी। उनका कहना था: “रामकथा जैसी पवित्र गाथा केवल देवभाषा संस्कृत में ही कही जा सकती है। अवधी जैसी लोकभाषा में इसका वर्णन करना वेदों और पुराणों का अपमान है।” इसलिए काशी के विद्वानों और ब्राह्मणों ने रामचरितमानस को स्वीकार करने से मना कर दिया। उनमें भय था कि यह लोकभाषा में लिखा गया ग्रंथ कहीं धार...

Ramayan Chaupai Hindi Mein

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Table 1
रचयिता
ग्रंथ 
पात्र
प्रकाशक
टीकाकार
भाषा
शैली
काण्ड
 गोस्वामी तुलसीदास जी  श्रीरामचरितमानस  श्रीराम लक्ष्मण सीता हनुमान, रावण इत्यादि गीता प्रेस गोरखपुर   श्री हनुमानप्रसाद पोद्दार  संस्कृत, अवधी  सोरठा, चोपाई, दोहा और छंद  बालकाण्ड

Ramayan Ki Chaupai Hindi Me | रामायण की चौपाई हिंदी में | Ramayan Chaupai Hindi Mein |  Ramayan Chaupai Hindi Me


गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज स्पष्ट करते हैं मैंने कथा क्यों लिखी? स्वान्त:सुखाय अपने अन्त: करण को सुख प्रदान करने के लिए गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस की रचना की,

और बाबा का न्याय कहता है संसार के जितने धर्म ग्रंथ हैं गोस्वामी तुलसीदास जी ने सभी ग्रन्थों के सार को निचोड़ कर श्रीरामचरितमानस जी में समाहित कर दिया है।

इसलिए केवल मानस जी का पठन-पाठन किया जाए तो हमें सभी ग्रंथों को पढ़ने का भाव, सभी ग्रंथों का रहस्य, सभी ग्रंथों को पढ़ने का पुण्य फल केवल मानस जी को पढ़ने से सहजता से प्राप्त हो सकता है।

बाबा ने सात श्लोक लिखे इसके बाद पंच देव उपासना की, वन्दना क्रम में गोस्वामी जी ने सबसे पहले अपने गुरुदेव भगवान के चरण रज को प्रणाम किया, ब्राह्मणों को प्रणाम किया, संत समाज को प्रणाम किया पुज्यपाद गोस्वामी तुलसीदास जी ने दुष्टों को भी प्रणाम किया।

अब यहां पर कई लोग सोचते हैं कि दुष्टों को क्यों प्रणाम किया? इसकी क्या आवश्यकता थी?
जब गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने कह दिया है कि-

सियाराम मय सब जग जानी करहुं प्रनाम जोरि जुग पानी

तो दुष्ट के भीतर भी गोस्वामी तुलसीदास जी को भगवान के दर्शन हो रहे हैं।

भगवान का भक्त निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं  बिरोध जो भगवान का भक्त है वो सब में भगवान का ही दर्शन करता है, इसलिए गोस्वामी जी ने दुष्टों की भी वन्दना की।


Ramayan Chaupai Hindi Mein

खल-वन्दना

बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ । जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ॥
पर हित हानि लाभ जिन्ह केरें । उजरें हरष बिषाद बसेरें ॥१॥
अर्थात
अब मैं सच्चे भाव से दुष्टों को प्रणाम करता हूँ, जो बिना ही प्रयोजन, अपना हित करने वाले के भी प्रतिकूल आचरण करते हैं। दूसरों के हित की हानि ही जिनकी दृष्टि में लाभ है, जिनको दूसरों के उजड़ने में हर्ष और बसने में विषाद होता है ॥१॥

हरि हर जस राकेस राहु से । पर अकाज भट सहसबाहु से ।।
जे पर दोष लखहिं सहसाखी । पर हित घृत जिन्ह के मन माखी ।।
अर्थात
जो हरि और हर के यश रूपी पूर्णिमा के चन्द्रमा के लिए राहु के समान हैं (अर्थात जहाँ कहीं भगवान विष्णु या शंकर के यश का वर्णन होता है, उसी में वे बाधा देते हैं) और दूसरों की बुराई करने में सहस्रबाहु के समान वीर हैं। जो दूसरों के दोषों को हजार आँखों से देखते हैं और दूसरों के हित रूपी घी के लिए जिनका मन मक्खी के समान है (अर्थात्‌ जिस प्रकार मक्खी घी में गिरकर उसे खराब कर देती है और स्वयं भी मर जाती है, उसी प्रकार दुष्ट लोग दूसरों के बने-बनाए काम को अपनी हानि करके भी बिगाड़ देते हैं) ।।२।।

तेज कृसानु रोष महिषेसा । अघ अवगुन धन धनी धनेसा ।।
उदय केत सम हित सब ही के । कुंभकरन सम सोवत नीके ।।
अर्थात
जो तेज (दूसरों को जलाने वाले ताप) में अन्गि और क्रोध में यमराज के समान हैं, पाप और अवगुण रूपी धन में कुबेर के समान धनी हैं, जिनकी बढ़ती सभी के हित का नाश करने के लिए केतु (पुच्छल तारे) के समान है, और जिनके कुम्भकर्ण की तरह सोते रहने में ही भलाई है ।।३।।

पर अकजु लगि तनु परिहरहीं । जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं ।।
बंदउॅं खल जस सेष सरोषा । सहस बदन बरनइ पर दोषा ।।
अर्थात
जैसे ओले खेती का नाश करके आप भी गल जाते हैं, वैसे ही वे दूसरों का काम बिगाड़ने के लिए अपना शरीर तक छोड़ देते हैं।
मैं दुष्टों को [ हजार मुख वाले ] शेषजी के समान समझ कर प्रणाम करता हूॅं, जो पराये दोषों का हजार मुखों से बड़े रोष के साथ वर्णन करते हैं ।।४।।

पुनि प्रनवऊॅं पृथुराज समाना । पर अघ सुनइ सहस दस काना।।
बहुरि सक्र सम बिनवऊॅं तेहि । संतत सुरानीक हित जेही ।।
अर्थात
पुनः उनको राजा पृथु (जिन्होंने भगवान् का यश सुनने के लिए दस हजार कान माॅंगे थे) के समान जानकर प्रणाम करता हूॅं, जो दस हजार कानों से दूसरों के पापों को सुनते हैं।
फिर इंद्र के समान मानकर उनकी विनय करता हूॅं, जिनको सुरा (मदिरा) नीकी और हितकारी मालूम देती हैं [ इंद्र के लिए भी सुरानीक अर्थात् देवताओं की सेना हितकारी है ] ।।५।।

बचन बज्र जेहि सदा पिआरा । सहस नयन पर दोष निहारा ।।
अर्थात
जिनको कठोर वचन रूपी वज्र सदा प्यारा लगता है और जो हजार आंखों से दूसरों के दोषों को देखते हैं ।।६।।

दो०-
उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीति ।
जानि पानि जुग जोरि जन बिनती करइ सप्रीति ।।४।‌।
अर्थात
दुष्टों की यह रीति है कि वे उदासीन, शत्रु अथवा मित्र किसी का भी हित सुन कर जलते हैं।
यह जानकर दोनों हाथ जोड़कर यह जन प्रेम पूर्वक उनसे विनय करता है ।।४।।


मैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा । तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा ।।
बायस पलिअहिं अति अनुरागा । होहिं निरामिष कबहुॅं कि कागा ।।
अर्थात
मैंने अपनी ओर से विनती की है, परंतु वे अपनी और से कभी नहीं चुकेंगे।
कौओं को बड़े प्रेम से पालिये; परंतु वे क्या कभी मांस के त्यागी हो सकते हैं? ।।१।।

संत असंत वन्दना

बंदउॅं संत असज्जन चरना । दुखप्रद उभय बीच कछु बरना ।‌‌।
बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं । मिलत एक दुख दारुन देहीं ।।
अर्थात
अब मैं संत और संत दोनों के चरणों की वंदना करता हूॅं; दोनों दुःख देने वाले हैं, परंतु उनमें कुछ अंतर कहा गया है।
वह अंतर यह है कि एक (संत) तो बिछुड़ते समय प्राण हर लेते हैं और दूसरे (असंत) मिलते हैं तब दारुण दुःख देते हैं।(अर्थात संतों का बिछुड़ना मरने के समान दुःखदायी होता है और असंतों का मिलना) ।।२।।

उपजहिं एक संग जग माहीं । जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं ।।
सुधा सुरा सम साधु असाधू । जनक एक जग जलधि अगाधू ।।
अर्थात
दोनों (संत और असंत) जगत में एक साथ पैदा होते हैं; पर [ एक साथ पैदा होने वाले ] कमल और जोंक की तरह उनके गुण अलग-अलग होते हैं।
(कमल दर्शन और स्पर्श से सुख देता है, किंतु जोंक शरीर का स्पर्श पाते ही रक्त चूसने लगती है।)
साधु अमृत के समान (मृत्यु रूपी संसार से उबारने वाला) और असाधु मदिरा के समान (मोह, प्रमाद और जड़ता उत्पन्न करने वाला) है, दोनों को उत्पन्न करने वाला जगद् रूपी अगाध समुद्र एक ही है।
[ शास्त्रों में समुद्र मंथन से ही अमृत और मदिरा दोनों की उत्पत्ति बताई गई है ] ।। ३।।

 भल अनभल निज निज करतूती । लहत सुजस आपलोक बिभुती ।।
सुधा सुधाकर सुरसरि साधू । गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू ।।
गुन अवगुन जानत सब कोई । जो जेहि भाव नीक तेहि सोई ।।
अर्थात
भले और बुरे अपनी-अपनी करनी के अनुसार सुन्दर यश और अपयश की संपत्ति पाते हैं।अमृत, चंद्रमा, गंगाजी और साधु एवं विष, अग्नि, कलयुग के पाप की नदी अर्थात् कर्मनाशा और हिंसा करने वाला व्याध, इनके गुण-अवगुण सब कोई जानते हैं; किंतु जिसे जो भाता है, उसे वही अच्छा लगता है ।।४-५।।

दो०-
भलो भलाइहि पै लहइ लहइ निचाइहि नीचु ।
सुधा सराहिअ अमरताॅं गरल सराहिअ मीचु ।।५।।
अर्थात
भला भलाई ही ग्रहण करता है और नीच नीचता को ही ग्रहण किये रहता है।
अमृत की सराहना अमर करने में होती है और विष की मारने में ।।५।।

खल अघ अगुन साधु गुन गाहा । उभय अपार उदधि अवगाहा ।।
तेहि तें कछु गुन दोष बखाने । संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने ।।
अर्थात
दुष्टों के पापों और अवगुणों की और साधुओं के गणों की कथाएँ-दोनों ही अपार और अथाह समुद्र हैं।
इसी से कुछ गुण और दोषों का वर्णन किया गया है, क्योंकि बिना पहचाने उनका ग्रहण या त्याग नहीं हो सकता ।।१।।

भलेउ पोच सब बिधि उपजाए । गनि गुन दोष बेद बिलगाए ।।
कहहिं बेद इतिहास पुराना । बिधि प्रपंचु गुन अवगुन साना ।।
अर्थात
भले, बुरे सभी ब्रह्मा के पैदा किये हुए हैं, पर गुण और दोषों को विचार कर वेदों ने उनको अलग-अलग कर दिया है।
वेद, इतिहास और पुराण कहते हैं कि ब्रह्मा की यह सृष्टि गुण-अवगुणों से सनी हुई है ।।२।।

दुख सुख पाप पुन्य दिन राती । साधु असाधु सुजाति कुजाती ।।
दानव देव ऊॅंच अरु नीचू । अमिअ सुजीवनु माहुरु मीचू ।‌।
माया ब्रह्म जीव जगदीसा । लच्छि अलच्छि रंक अवनीसा ।।
कासी मग सुरसरि क्रमनासा । मरु मारव महिदेव गवासा ।।
सरग नरक अनुराग बिरागा । निगमागम गुन दोष बिभागा ।।
अर्थात
दुःख-सुख, पाप-पुण्य, दिन-रात, साधु-असाधु, सुजाति-कुजाती, दानव-देवता, ऊॅंच-नीच, अमृत-विष, सुजीवन (सुन्दर जीवन)-मृत्यु, माया-ब्रह्म, जीव-ईश्वर, सम्पत्ति-दरिद्रता, रंक-राजा, काशी-मगध, गंगा-कर्मनाशा, मारवाड़-मालवा, ब्राह्मण-कसाई, स्वर्ग-नरक, अनुराग-वैराग्य, [ ये सभी पदार्थ ब्रह्मा की सृष्टि में हैं ] वेद शास्त्रों ने उनके गुण-दोषों का विभाग कर दिया है ।। ३-५ ।।

दो०-
जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार ।
संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार ।।६।।
अर्थात
विधाता ने इस जड-चेतन विश्व को गुण-दोषमय रचा है; किन्तु संत रूपी हंस दोष रूपी जल को छोड़कर गुण रूपी दूध को ही ग्रहण करते हैं ।।६।।

अस बिबेक जब देइ बिधाता । तब तजि दोष गुनहिं मनु राता ।।
काल सुभाउ करम बरिआईं । भलेउ प्रकृति बस चुकइ भलाईं ।।
अर्थात
विधाता जब इस प्रकार का (हंस का -सा) विवेक देते हैं, तब दोषों को छोड़कर मन गुणों में अनुरक्त होता है।
काल-स्वभाव और कर्म की प्रबलता से भले लोग (साधु) भी माया के वश में होकर कभी-कभी भलाई से चूक जाते हैं ।।१।।

सो सुधारि हरिजन जिमि लेहीं ‌। दलि दुख दोष बिमल जसु देहीं ।।
खलउ करहिं भल पाइ सुसंगू । मिटइ न मलिन सुभाउ अभंग ।।
अर्थात
भगवान् के भक्त जैसे उस चूक को सुधार लेते हैं और दुःख-दोषों को मिटाकर निर्मल यश देते हैं, वैसे ही दुष्ट भी कभी-कभी उत्तम संग पाकर भलाई करते हैं; परन्तु उनका कभी भंग न होने वाला मलिन स्वभाव नहीं मिटता ।।२।।

लखि सुबेष जग बंचक जेऊ । बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ ।।
उघरहिं अंत न होइ निबाहू । कालनेमि जिमि रावन राहू ।।
अर्थात
जो [ वेषधारी ] ठग हैं , उन्हें भी अच्छा (साधु का-सा) वेष बनाये देखकर वेष के प्रताप से जगत् पूजता है;  परन्तु एक-न-एक दिन वे चौड़े आ ही जाते हैं, अन्त तक उनका कपट नहीं निभता, जैसे कालनेमि, रावण और राहु का हाल हुआ ।।३।।

किएहुॅं कुबेषु साधु सनमानू । जिमि जग जामवंत हनुमानू ।।
हानि कुसंग सुसंगति लाहु । लोकहुॅं बेद बिदित सब काहू ।।
अर्थात
बुरा वेष बना लेने पर भी साधु का सम्मान ही होता है, जैसे जगत् में जाम्बवान् और हनुमान जी का हुआ।
बुरे संग से हानि और अच्छे संग से लाभ होता है, यह बात लोक और वेद में है और सभी लोग इसको जानते हैं ।।४।।

गगन चढ़इ रज पवन प्रसंगा । कीचहिं मिलइ नीच जल संगा ।।
साधु असाधु सदन सुक सारीं । सुमिरहिं राम देहिं गनि गारीं ।।
अर्थात
पवन के संग से धूल आकाश पर चढ़ जाती है और वही नीच (नीचे की ओर बहने वाले) जल के संग से कीचड़ में मिल जाती है।
साधु के घर के तोता-मैना राम-राम सुमिरते हैं और असाधु के घर तोता-मैना गिन-गिन कर गालियाॅं देते हैं ।‌।५।।

धूम कुसंगति कारिख होई । लिखिअ पुरान मंजु मसि सोई ।।
सोई जल अनल अनिल संघाता । होइ जलद जग जीवन दाता ।।
अर्थात
कुसंग के कारण धुआँ कालिख कहलाता है, वही धुआँ [ सुसंग से ] सुन्दर स्याही होकर पुराण लिखने के काम में आता है और वही धुआँ जल, अग्नि और पवन के संग से बादल होकर जगत् को जीवन देने वाला बन जाता है ।।६।।




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