सत्यं शिवं सुंदरम् — तुलसीदास और रामचरितमानस की दिव्यता की गाथा
Bhagwan Shiv Ne Sati Ka Tyag Kyo Kiya? | भगवान शिव ने सती का त्याग क्यों किया
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श्रीरामचरितमानस जी के अनुसार, भरद्वाज ऋषि को याज्ञवल्क्य जी भगवान भोलेनाथ द्वारा माता सती के त्याग का प्रसंग सुनाते हैं।
एक बार त्रेता जुग माहीं। संभु गए कुंभज रिषि पाहीं॥
संग सती जगजननि भवानी। पूजे रिषि अखिलेस्वर जानी॥
याज्ञवल्क्य ऋषि कहते हैं भरद्वाज जी त्रेतायुग का समय था, एक बार भगवान भोलेनाथ अपनी अर्धांगिनी देवी सती (माता पार्वती जी का पिछला जन्म जब वो प्रजापति दक्ष के यहां सती के रूप में अवतरित हुई थीं) के साथ कथा श्रवण करने के लिए कैलाश से नीचे उतरे।
भगवान शिव माता सती को लेकर दंडकारण्य यानी नासिक क्षेत्र में अगस्त ऋषि आश्रम में पहुंचे (अगस्त ऋषि का एक नाम कुंभज ऋषि भी है, कुंभज इसलिए क्योंकि उनका जन्म कुंभ यानी घड़े से हुआ था)।
अगस्त ऋषि ने भगवान भोलेनाथ को देखा तो खुशी से झूमने लगे, ऋषि ने दिव्य आसान पर भोलेनाथ और माता सती को बिठाया और बाबा का पूजन करने लगे।
अगस्त ऋषि के इस भाव को देखकर भोलेनाथ आनन्द में आ गये, और कहने लगे कितने अद्भुत महात्मा हैं, हम श्रोता बनकर इनके पास आए हैं ये वक्ता हैं नियमानुसार इनका पूजन हमें करना चाहिए लेकिन इनको लेशमात्र भी अभिमान नहीं है स्वयं वक्ता होकर श्रोता की पूजा कर रहे हैं।
भोलेनाथ ऐसा सोच रहे थे लेकिन देवी सती ने इसके विपरीत सोच लिया, माता सती सोचने लगीं इनकी पूजा तो हमें करनी चाहिए, लेकिन ये तो उल्टे हमारी पूजा कर रहे हैं।
इसका मतलब इनका ज्ञान अभी हम से कम है, हम से छोटे हैं इसीलिए हमारी पूजा कर रहे हैं, और जब इनका ज्ञान ही कम है तो ये कथा क्या सुनाएंगे।
कथा प्रारम्भ होने से पहले ही देवी सती ने ये सोच लिया कि ये क्या कथा सुनाएंगे, फलस्वरूप कथा सुनाई गई भोलेनाथ कथा सुनते गये, लेकिन बाबा के बगल में बैठे होने के बावजूद देवी सती ने कथा नहीं सुनी बस यही सोचती रह गईं कि ये क्या कथा सुनाएंगे।
कहत सुनत रघुपति गुन गाथा। कछु दिन तहाँ रहे गिरिनाथा॥
मुनि सन बिदा मागि त्रिपुरारी। चले भवन सँग दच्छकुमारी॥
तेहि अवसर भंजन महिभारा। हरि रघुबंस लीन्ह अवतारा॥
पिता बचन तजि राजु उदासी। दंडक बन बिचरत अबिनासी॥
कथा के बाद भोलेनाथ ने श्रीरामजी की भक्ति अगस्त ऋषि को दक्षिणा के रूप में दी और वहां से कैलाश के लिए प्रस्थान किया।
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Shiv Dwara Devi Sati Ka Tyag | महादेव द्वारा सती का त्याग
हृदयँ बिचारत जात हर केहि बिधि दरसनु होइ।
गुप्त रूप अवतरेउ प्रभु गएँ जान सबु कोइ॥ 48(क)॥
जाते समय भोलेनाथ अपने मन में विचार कर रहे हैं कथा सुन लिया हूॅं, कान धन्य हो गया है, त्रेतायुग का समय है भगवान श्री राम इसी दंडकारण्य में श्री सीता हरण के बाद की लीला कर रहे हैं, यदि दर्शन मिल जाए तो प्रभु को देखकर आंखें भी धन्य हो जाएं।
बाबा सोच रहे हैं भगवान ने गुप्त रूप में अवतार लिया है यदि पास जाऊंगा तो भगवान का गुप्त रूप प्रकट हो जाएगा।
भोलेनाथ की भगवान के दर्शन करने की इच्छा को श्रीरामजी समझ गये और जिस तरफ भोलेनाथ थे रामजी उसी ओर बढ़ने लगे।
जैसे ही भोलेनाथ ने श्रीरामजी को देखा आनन्द में आकर बाबा झूमने लगे और दूर से ही हाथ उठाकर बोले हे सचिदानंद भगवान आपकी जय हो।
दर्शन मिला मनोकामना पूर्ण हुई बाबा प्रसन्न हो गए और देवी सती को लेकर आगे बढ़ने लगे, अब देवी सती ने श्रीरामजी की कथा तो सुनी नहीं थी इसलिए उन्हें ये नहीं पता था कि सीताजी के हरण के बाद रामजी रोये भी थे।
अब देवी सती ने रोते हुए रामजी को देखा और बाबा के श्रीमुख से सचिदानंद सुना तो सती जी सोचने लगीं कहीं सचिदानंद भी रोते हैं जो परमानन्द में होगा वो रोयेगा, और ये भगवान हैं, अगर ये भगवान होते तो इनको ये नहीं पता होता कि मेरी पत्नी कहां है? देवी सती को रामजी के भगवान होने पर संदेह हो गया।
सती जी ने भोलेनाथ से कुछ कहा नहीं लेकिन भोलेनाथ सब जान गए, बाबा ने देवी सती को समझाया कहा देवी वो भगवान हैं, जिनकी कथा हमें अगस्त जी ने सुनाई ये वही भगवान श्री राम हैं।
लेकिन भोलेनाथ के लाख समझाने के बाद भी देवी सती को विश्वास नहीं हुआ, तब शंकरजी ने कहा जब इतना ही संदेह है तो जाइए और जाकर परिक्षण कर लिजिए।
भोलेनाथ ने देवी सती को सचेत किया और कहा-
जैसें जाइ मोह भ्रम भारी। करेहु सो जतनु बिबेक बिचारी॥
परिक्षण करने जाना तो विवेक पूर्वक विचार कर के तब परिक्षण करना।
बाबा वहीं एक वट वृक्ष के नीचे बैठ गये और देवी सती श्रीरामजी का परिक्षण करने के लिए चल पड़ीं।
रास्ते में उन्होंने माता सीता का रूप धारण किया और भगवान श्रीराम के निकट पहूंची तो रामजी तुरन्त उन्हें पहचान लिया, और प्रणाम करके बोले-
जोरि पानि प्रभु कीन्ह प्रनामू। पिता समेत लीन्ह निज नामू॥
कहेउ बहोरि कहाँ बृषकेतू। बिपिन अकेलि फिरहु केहि हेतू॥
माता बाबा कहां हैं आप अकेले जंगल में क्यों घूम रहीं हैं।
जब रामजी ने देवी सती को पहचान लिया तो देवी सती को अपने किए पर पश्चाताप होने लगा वो सोचने लगीं की मैंने महादेव की बात न मानकर बहुत बड़ी गलती की ऐसा सोचते हुए सती जी वहां से बिना कुछ बोले ही वापस चल पड़ीं।
देवी सती जब भोलेनाथ के पास पहूंची तो बाबा ने पूछा- लीन्हि परीछा कवन बिधि कहहु सत्य सब बात॥ किस बिधि से परिक्षण किया आपने वो बिधि बताओ।
देवी सती बोलीं- कछु न परीछा लीन्हि गोसाईं। कीन्ह प्रनामु तुम्हारिहि नाईं॥
प्रभु मैंने कोई परिक्षण नहीं किया, बाबा बोले परिक्षण नहीं किया तो फिर क्या किया? सती जी ने कहा प्रभु बस आपकी तरह ही प्रणाम किया और वापस आ गई।
भोलेनाथ को देवी सती के वचन पर विश्वास नहीं हुआ- तब संकर देखेउ धरि ध्याना। सतीं जो कीन्ह चरित सबु जाना॥
बाबा ने ध्यान करके सती जी ने जो किया वो सब देख लिया, सती ने माता सीता का रूप धारण किया ये जानकर भोलेनाथ को बहुत कष्ट हुआ।
बाबा सोचने लगे आज के बाद मैं जब-जब सती को देखूंगा मुझे तब-तब ये स्मरण होगा कि सती ने सीताजी का रुप धारण किया था
एहिं तन सतिहि भेंट मोहि नाहीं। सिव संकल्पु कीन्ह मन माहीं॥
अस बिचारि संकरु मतिधीरा। चले भवन सुमिरत रघुबीरा॥
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देवी सती ने माता सीता का स्वरूप धारण किया, यही कारण था कि भगवान शंकर ने देवी सती का त्याग कर दिया।
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