सत्यं शिवं सुंदरम् — तुलसीदास और रामचरितमानस की दिव्यता की गाथा
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| गोस्वामी तुलसीदास जी | श्रीरामचरितमानस | श्रीराम लक्ष्मण सीता हनुमान, रावण इत्यादि | गीता प्रेस गोरखपुर | श्री हनुमानप्रसाद पोद्दार | संस्कृत, अवधी | सोरठा, चोपाई, दोहा और छंद | बालकाण्ड |
Ramayan Ki Chaupai Hindi Me
श्रीरामचरितमानस की रचना प्रारंभ करते हैं गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज वर्ण शब्द से (वर्णानामर्थसंघानां) और श्रीरामचरितमानस को पूरा करते हैं (ते संसारपतङ्गघोरकिरणैर्दह्यन्ति नो मानवा:।।)।
ये उत्तरकांकाण्ड के अंतिम श्लोक की अंतिम पंक्ति है, गोस्वामी जी श्रीरामचरितमानस को प्रारंभ करते हैं वर्ण शब्द से और विश्राम करते हैं श्रीरामचरितमानस को मानव शब्द से।
वर्ण से प्रारंभ करके और मानव शब्द पर श्रीरामचरितमानस को पूर्ण करने का गोस्वामी तुलसीदास जी का केवल और केवल एक उद्देश्य है कि गोस्वामी जी कहना चाहते हैं,
की वर्ण कोई भी हो ब्राह्मण हो, क्षत्रिय हो, वैश्य हो, शूद्र हो, सेवक हो वर्ण कोई भी हो जब तक वो श्रीरामचरितमानस को पढ़ कर, सुनकर, समझकर और उनके तथ्यों को उनके मूल्यों को अपने जीवन में धारण नहीं करता है, तब तक वो मानव कहलाने का अधिकारी नहीं बन सकता है।
वर्ण कोई भी हो यदि श्रीरामचरितमानस, मानस में (मन में) उतर गया, बाबा कहते हैं अस मानस मानस चख चाही
ये मानस, मानस में उतरना चाहिए मानस यानी मन में गोस्वामी जी कहना चाहते हैं वर्ण कोई भी हो जाय यदि मानस को पढ़कर मानस में मानस का रहस्य न उतरा तो वो कोई भी वर्ण क्यों न हो वो मानव कहलाने योग्य नहीं है।
मानव कौन? एक श्लोक है-
येषां न विद्या न तपो न दानं, ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः ।
ते मर्त्यलोके भुविभारभूता, मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥
अर्थात
कहते हैं येषां न विद्या, न विद्या है, न तपो न दानं, न तप है न दान है, न ज्ञान है, न गुण है, न शील है, न धर्म है जिस मनुष्य के पास ये कुछ भी नहीं है वो कैसा है? वो मनुष्य इस पृथ्वी पर भार के समान है और वो मनुष्य के रूप में पशु है।
गोस्वामी जी कहते हैं मानस को पढ़कर मानस में उतारिए तब आपका वर्ण कोई भी हो तब जाकर आप मानव कहलाने के अधिकारि होंगे।
गोस्वामी जी कहते चार युगों में कलयुग जैसा कोई दूसरा युग नहीं है-
दोहा-
कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास ।
गाइ राम गुन गन बिमल भव तर बिनहिं प्रयास ॥
तुलसीदास जी महाराज कहते हैं कलिजुग सम जुग आन नहिं कब जौं नर कर बिस्वास, यदि मनुष्य विश्वास पर उतर जाए तो उसके लिए कलयुग जैसा दूसरा कोई युग नहीं।
क्योंकि गाइ राम गुन गन बिमल भव तर बिनहिं प्रयास केवल इस कलिकाल में भगवान के नाम का गुणगान करके ही हम और आप भवसागर को पार कर सकते हैं।
देवता भी सोचते हैं कि कलयुग में हमें भी मनुष्य शरीर मिल जाए तो धरती पर जाकर हम भी भगवान की कथा का रसपान करेंगे, हम भी भगवान का गुणगान करेंगे लेकिन देवताओं को शरीर नहीं मिलता।
जो शरीर देवताओं को नहीं मिला वो शरीर हमको और आपको प्राप्त हो गया है, इससे अधिक सौभाग्य और क्या हो सकता है- बड़े भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा ॥
सो०-
जो सुमिरत सिधि होइ गन नायक करिबर बदन ।
करउ अनुग्रह सोइ बुद्धि यासिर सुभ गुन सदन ।।१।।
अर्थात
जिन्हें स्मरण करने से सब कार्य सिद्ध होते हैं, जो गणों के स्वामी और सुन्दर हाथी के मुख वाले हैं, वे ही बुद्धि के राशि और शुभ गुणों के धाम (श्रीगणेश जी) मुझ पर कृपा करें ।।१।।
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मूक होइ बाचाल पंगु चढ़इ गिरिबर गहन ।
जासु कृपा सो दयाल द्रवउ सकल कलि मल दहन ।।२।।
अर्थात
जिनकी कृपा से गूॅंगा बहुत सुन्दर बोलने वाला हो जाता है और लॅंगडा़-लूला दुर्गम पहाड़ पर चढ़ जाता है, वे कलियुग के सब पापों को जला डालने वाले दयालु (भगवान्) मुझ पर द्रवित हों (दया करें) ।।२।।
नील सरोरुह स्याम तरुन अरुन बारिज नयन ।
करउ सो मम उर धाम सदा छीरसागर सयन ।।३।।
अर्थात
जो नील कमल के समान श्याम वर्ण हैं, पूर्ण खिले हुए लाल कमल के समान जिनके नेत्र हैं और जो सदा क्षीरसागर में शयन करते हैं, वे भगवान् (नारायण) मेरे हृदय में निवास करें ।।३।।
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कुंद इंदु सम देह उमा रमन करुना अयन ।
जाहि दीन पर नेह करउ कृपा मर्दन मयन ।।४।।
अर्थात
जिनका कुन्द के पुष्प और चन्द्रमा के समान (गौर) शरीर है, जो पार्वती जी के प्रियतम और दयाके धाम हैं और जिनका दीनों पर स्नेह है, वे कामदेव का मर्दन करने वाले (शंकर जी) मुझ पर कृपा करें ।।४।।
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बंदउॅं गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि ।
महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर ।।५।।
अर्थात
मैं उन गुरु महाराज के चरण कमल की वन्दना करता हूॅं, जो कृपा के समुद्र और नररूप में श्रीहरि ही हैं और जिनके वचन महामोहरूपी घने अन्धकार के नाश करने के लिए सूर्य-किरणों के समूह हैं ।।५।।
गुरु वंदना
बंदउॅं गुरु पद पदुम परागा । सुरुचि सुबास सरस अनुरागा ।।
अमिअ मूरिमय चूरन चारू । समन सकल भव रुज परिवारू ।।
अर्थात
मैं गुरु महाराज के चरण कमलों की रज की वन्दना करता हूॅं, जो सुरुचि (सुन्दर स्वाद), सुगन्ध तथा अनुराग रूपी रस से पूर्ण है।
वह अमर मूल (सञ्जीवनी जड़ी) का सुन्दर चूर्ण है, जो सम्पूर्ण भव रोगों के परिवार को नाश करने वाला है ।।१।।
सुकृति संभु तन बिमल बिभूती । मंजुल मंगल मोद प्रसूती ।।
जन मन मंज मुकुर मल हरनी । किएं तिलक गुन गन बस करनी ।।
अर्थात
वह रज सुकृती (पुण्यवान् पुरुष) रूपी शिवजी के शरीर पर सुशोभित निर्मल विभूति है और सुन्दर कल्याण और आनन्द की जननी है, भक्त के मनरूपी सुन्दर दर्पण के मैल को दूर करने वाली और तिलक करने से गुणों के समूह को वश में करने वाली है ।।२।।
श्रीगुर पद नख मनि गन जोती । सुमिरत दिब्य दृष्टि हियॅं होती ।।
दलन मोह तम सो सप्रकासू । बड़े भाग उर आवइ जासू ।।
अर्थात
श्रीगुरु महराज के चरण-नंखों की ज्योति मणियों के प्रकाश के समान है, जिसके स्मरण करते ही हृदय में दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है।
वह प्रकाश अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश करने वाला है; वह जिसके हृदय में आ जाता है, उसके बड़े भाग्य हैं ।।३।।
उघरहिं बिमल बिलोचन ही के । मिटहिं दोष दुख भव रजनी के ।।
सूझहिं राम चरित मनि मानिक । गुपुत प्रगट जहॅं जो जेहि खानिक ।।
अर्थात
उसके हृदय में आते ही हृदय के निर्मल नेत्र खुल जाते हैं और संसार रूपी रात्रि के दोष-दुःख मिट जाते हैं एवं श्रीराम चरित्र रूपी मणि और माणिक्य, गुप्त और प्रकट जहाॅं जो जिस खान में है, सब दिखायी पड़ने लगते हैं ।।४।।
ब्राह्मण और संत वन्दना
दो०-
जथा सुअंजन अंजि दृग साधक सिद्ध सुजान ।
कौतुक देखत सैल बन भूतल भूरि निधान ।।१।।
अर्थात
जैसे सिद्धाञ्जन को नेत्रों में लगाकर साधक, सिद्ध और सुजान पर्वतों, वनों और पृथ्वी के अंदर कौतुक से ही बहुत-सी खानें देखते हैं ।।१।।
गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन । नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन ।।
तेहि करि बिमल बिबेक बिलोचन । बरनउॅं राम चरित भव मोचन ।।
अर्थात
श्रीगुरु महराज के चरणों की रज कोमल और सुन्दर नयनामृत-अञ्जन है, जो नेत्रों के दोषों का नाश करने वाला है।
उस अञ्जन से विवेक रूपी नेत्रों को निर्मल करके मैं संसार रूपी बन्धन से छुड़ाने वाले श्रीरामचरित्र का वर्णन करता हूॅं ।।१।।
बंदउॅं प्रथम महीसुर चरना । मोह जनित संसय सब हरना ।।
सुजन समाज सकल गुन खानी । करउॅं प्रनाम सप्रेम सुबानी ।।
अर्थात
पहले पृथ्वी के देवता ब्राह्मणों के चरणों की वन्दना करता हूॅं, जो अज्ञान से उत्पन्न सब संदेहों को हरने वाले हैं।
फिर सब गुणों की खान संत-समाज को प्रेम सहित सुन्दर वाणी से प्रणाम करता हूॅं ।।२।।
साधु चरित सुभ चरित कपासू । निरस बिसद गुनमय फल जासू ।।
जो सहि दुख परछिद्र दुरावा । बंदनीय जेहि जग जस पावा ।।
अर्थात
संतों का चरित्र कपास के चरित्र (जीवन)-के समान शुभ है, जिसका फल नीरस, विशद और गुणमय होता है।
(कपास की डोडी नीरस होती है, संत-चरित्र में भी विषयासक्ति नहीं है, इससे वह भी नीरस है; कपास उज्ज्वल होता है, संत का हृदय भी अज्ञान और पाप रूपी अन्धकार से रहित होता है, इसलिए वह विशद है, और कपास में गुण (तन्तु) होते हैं, इसी प्रकार संत का चरित्र भी सद्गुणों का भण्डार होता है, इसलिए वह गुणमय है।) [ जैसे कपास का धागा सूई के किये हुए छेद को अपना तन देकर ढक देता है, अथवा कपास जैसे लोढे़ जाने, काते जाने और बुने जाने का कष्ट सहकर भी वस्त्र के रूप में परिणत होकर दूसरों के गोपनीय स्थानों को ढकता है उसी प्रकार ] संत स्वयं दुःख सहकर दूसरों के छिद्रों (दोषों)-को ढकता है, जिसके कारण उसने जगत् में वन्दनीय यश प्राप्त किया है ।।३।।
मुद मंगलमय संत समाजू । जो जग जंगम तीरथराजू ।।राम भक्ति जहॅं सुरसरि धारा । सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा ।।
अर्थात
संतों का समाज आनन्द और कल्याणमय है, जो जगत् में चलता-फिरता तीर्थराज (प्रयाग) है।
जहाॅं (उस संत समाज रूपी प्रयागराज में) राम भक्ति रुपी गंगा जी की धारा है और ब्रह्म विचार का प्रचार सरस्वती जी हैं ।।४।।
बिधि निषेधमय कलिमल हरनी । करम कथा रबिनंदनि बरनी ।।
हरि हर कथा बिराजति बेनी । सुनत सकल मुद मंगल देनी ।।
अर्थात
विधि और निषेध (यह करो और यह न करो) रूपी कर्मों की कथा कलियुग के पापों को हरने वाली सूर्यतनया यमुना जी हैं और भगवान विष्णु और शंकर जी की कथाएं त्रिवेणी रूप से सुशोभित हैं, जो सुनते ही सब आनन्द और कल्याणों की देने वाली हैं ।।५।।
बटु बिस्वास अचल निज धरमा । तीरथराज समाज सुकरमा ।।
सबहि सुलभ सब दिन सब देसा । सेवत सादर समन कलेसा ।।
अर्थात
[उस संत समाज रूपी प्रयाग में] अपने धर्म में जो अटल विश्वास है वह अक्षय वट है, और शुभ कर्म ही उस तीर्थराज का समाज (परिकर) है।
वह (संत समाज रूपी प्रयागराज) सब देशों में सब समय सभी को सहज ही में प्राप्त हो सकता है और आदर पूर्वक सेवन करने से क्लेशों को नष्ट करने वाला है ।।६।।
अकथ अलौकिक तीरथराऊ । देइ सद्य फल प्रगट प्रभाऊ ।।
अर्थात
वह तीर्थराज अलौकिक और अकथनीय है, एवं तत्काल फल देने वाला है; उसका प्रभाव प्रत्यक्ष है ।।७।।
दो०-
सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग ।
लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग ।।२।।
अर्थात
जो मनुष्य इस संत-समाज रूपी तीर्थराज का प्रभाव मनसे सुनते और समझते हैं और फिर अत्यंत प्रेम पूर्वक इसमें गोते लगाते हैं, वे इस शरीर के रहते ही धर्म, काम, मोक्ष चारों फल पा जाते हैं ।।२।।
मज्जन फल पेखिअ ततकाला । काक होहिं पिक बकउ मराला ।।
सुनि आचरज करै जनि कोई । सतसंगति महिमा नहिं गोई ।।
अर्थात
इस तीर्थराज में स्नान का फल तत्काल ऐसा देखने में आता है कि कौए कोयल बन जाते हैं और बगुले हंस।
यह सुनकर कोई आश्चर्य न करे, क्योंकि सत्संग की महिमा छिपी नहीं है ।।१।।
बालमीक नारद घटजोनी । निज निज मुखनि कही निज होनी ।।
जलचर थलचर नभचर नाना । जे जड़ चेतन जीव जहाना ।।
अर्थात
वाल्मीकि जी, नारद जी और अगस्त्य जी ने अपने-अपने मुखों से अपनी होनी (जीवन का वृत्तान्त) कही है।
जल में रहने वाले, जमीन पर चलने वाले और आकाश में विचरने वाले नाना प्रकार के जड़ चेतन जितने जीव इस जगत् में हैं, ।।२।।
मति कीरति गति भूति भलाई । जब जेहिं जतन जहां जेहिं पाई ।।
सो जानब सतसंग प्रभाऊ । लोकहुॅं बेद न आन उपाऊ ।।
अर्थात
उनमें से जिसने जिस समय जहां कहीं भी जिस किसी यत्न से बुद्धि, कीर्ति, सद्गति, विभूति (ऐश्वर्य) और भलाई पायी है, सो सब सत्संग का प्रभाव समझना चाहिए।
वेदों में और लोक में इनकी प्राप्ति का दूसरा कोई उपाय नहीं है ।।३।।
बिनु सतसंग बिबेक न होई । राम कृपा बिनु सुलभ न सोई ।।
सतसंगत मुद मंगल मूला । सोइ फल सिधि सब साधन फूला ।।
अर्थात
सत्संग के बिना विवेक नहीं होता और श्रीरामजी की कृपा बिना सत्संग सहज में मिलता नहीं।
सत्संगति आनन्द और कल्याण की जड़ है।
सत्संग सिद्धि (प्राप्ति) ही फल है और सब साधन तो फूल हैं ।।४।।
सठ सुधरहिं सतसंगति पाई । पारस परस कुधात सुहाई ।।
बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं । फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं ।।
अर्थात
दुष्ट भी सत्संगति पाकर सुधर जाते हैं, जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सुहावना हो जाता है (सुन्दर सोना बन जाता है)।
किन्तु दैव योग से यदि कभी सज्जन कुसंगति में पड़ जाते हैं, तो वे वहाॅं भी साॅंप की मणि के समान अपने गुणों का ही अनुसरण करते हैं (अर्थात् जिस प्रकार साॅंप का संसर्ग पाकर भी मणि उसके विष को ग्रहण नहीं करती तथा अपने सहज गुण प्रकाश को नहीं छोड़ती, उसी प्रकार साधु पुरुष दुष्टों के संग में रहकर भी दूसरों को प्रकाश ही देते हैं, दुष्टों का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता) ।।५।।
बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी । कहत साधु महिमा सकुचानी ।।
सो मो सन कहि जात न कैसें । साक बनिक मनि गुन गन जैसें ।।
अर्थात
ब्रह्मा, विष्णु, शिव कवि और पण्डितों की वाणी भी संत-महिमा का वर्णन करने में सकुचाती हैं; वह मुझसे किस प्रकार नहीं कही जाती, जैसे साग-तरकारी बेचने वाले से मणियों के गुण समूह नहीं कहे जा सकते ।।६
दो०-
बंदउॅं संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ ।
अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध कर दोइ ।। ३ (क) ।।
अर्थात
मैं संतों को प्रणाम करता हूॅं, जिनके चित्त में समता है, जिनका न कोई मित्र है और न शत्रु!
जैसे अञ्जली में रखे हुए सुन्दर फूल [ जिस हाथ ने फूलों को तोड़ा और जिसने उनको रखा ] दोनों ही हाथों को समान रूप से सुगन्धित करते हैं [ वैसे ही संत शत्रु और मित्र दोनों का ही समान रूप से कल्याण करते हैं ] ।।३ (क)।।
संत सरल चित जगत हित जानि सुभाउ सनेहु ।
बालबिनय सुनि करि कृपा राम चरन रति देहु ।।३ (ख)।।
अर्थात
संत सरल हृदय और जगत् के हितकारी होते हैं, उनके ऐसे स्वभाव और स्नेह को जानकर मैं विनय करता हूॅं, मेरी इस बाल-विनय को सुनकर कृपा करके श्रीरामजी के चरणों में मुझे प्रीति दें ।।३ (ख)।।
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